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कुछ दिन पहले फ़्लाईदुबई एयरलाइन के विमान में हुई एक घटना के बाद गुजरात मूल के कैप्टन स्मित मच्छर काफ़ी चर्चा में आए.
उनकी 'बहादुरी' के साथ-साथ सोशल मीडिया पर उनके सरनेम 'मच्छर' की भी चर्चा हुई.
वैसे गुजरात में ऐसे कई सरनेम मिलते हैं, जो जानवरों या कीड़े-मकोड़ों के नाम पर हैं. राज्य में घोड़ा, मच्छर, हाथी, वाघ, मांकड़, पोपट, बिच्छू और शियाल जैसे सरनेम काफ़ी आम हैं.
इनके अलावा कीड़ी, चकली, तितोड़ी, बकरी, मकोड़ी और तीतर जैसे सरनेम भी मिलते हैं. लेकिन सवाल यह है कि जानवरों और कीड़े-मकोड़ों के नाम वाले ये सरनेम कहां से आए और समाज में कैसे प्रचलित हुए?
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समाजशास्त्र में एक मान्यता है, जिसे 'टोटेमिज़्म' कहा जाता है. पुराने समय में लोग अलग-अलग समूहों और क़बीलों में रहते थे. उस समय हर समूह अपनी पहचान के लिए किसी पक्षी या जानवर का निशान रखता था. अंग्रेज़ी में इसे 'टोटेम' कहते हैं.
अमेरिका, अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई समुदायों में यह परंपरा थी.
इसी आधार पर एक अनुमान लगाया जाता है कि जानवरों, कीड़ों या पक्षियों के नाम पर पड़े ये सरनेम बहुत पुराने समय से चले आ रहे होंगे.
प्रोफ़ेसर विनोदिनी नीलकंठ ने 'गुजराती अटकों का इतिहास' नाम की एक किताब लिखी है. इसे गुजरात वर्नाक्युलर सोसाइटी ने प्रकाशित किया है.
इस किताब में वह लिखती हैं, "अगर ये सरनेम टोटेम से आए हैं तो घोड़ा, हाथी या वाघ जैसे सरनेम के मामले में ऐसा हो सकता है. लेकिन कीड़ी, मकोड़ी, मांकड़ या मच्छर जैसे सरनेम के मामले में ऐसा नहीं हो सकता. इसकी वजह ये है कि इन्हें मिट्टी, पत्थर या लकड़ी पर आसानी से नहीं बनाया जा सकता."
वह आगे बताती हैं, "गुजराती सरनेम इसी परंपरा से आए हैं, यह बात सही नहीं लगती. गुजराती सरनेम के इतिहास की जांच करने पर पता चलता है कि वे पांच, सात या दस पीढ़ियों से ज़्यादा पुराने नहीं हैं."
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जाने-माने समाजशास्त्री विद्युत जोशी कहते हैं, "इस तरह के सरनेम ज़्यादातर गुजरात के वडनगर नागर समुदाय में मिलते हैं. ये लोग वडनगर और जूनागढ़ में रहते हैं. हालांकि, ऐसे सरनेम ज़्यादातर जूनागढ़ के नागर समुदाय में दिखाई देते हैं."
वह कहते हैं, "माना जाता है कि ये सरनेम एक-दूसरे का मज़ाक उड़ाने से बने. वडनगर के नागर लोग जूनागढ़ के नवाबों के राजकाज में किसी न किसी तरह का काम करते थे. उनके बीच काफ़ी खींचतान और मज़ाक होता था. माना जाता है कि ये सरनेम भी आपसी मज़ाक से ही पड़े."
विद्युत जोशी आगे बताते हैं, "वे राजकाज से जुड़े थे, इसलिए अपने काम में बुद्धि का ज़्यादा इस्तेमाल करते थे. पुराने समय में नागर समुदाय के लोगों के बारे में माना जाता था कि वे हंसी-मज़ाक करने वाले होते हैं. मिसाल के लिए, कोई उनसे पूछता कि आज खाने में क्या बना है तो वे कहते, कृष्णवली और चंद्रकला. जबकि असल में खिचड़ी और प्याज़ बने होते थे."
"वे ज़िंदगी को हल्के-फुल्के अंदाज़ में लेने के लिए जाने जाते थे. इसलिए ऐसे सरनेम आपसी मज़ाक से बने हो सकते हैं."
प्रोफ़ेसर नीलकंठ लिखती हैं, "ऐसा भी संभव है कि ये अनोखे सरनेम रिश्तेदारों और समधियों ने मज़ाक में रखे हों. हमने ऐसे सरनेम वाले लोगों से ख़ुद बात की है. लेकिन ज़्यादातर परिवारों को भी अपने सरनेम के बारे में बहुत कम जानकारी है. उनके पास जो जानकारी है, वह भी केवल अनुमान है. उसका कोई सबूत नहीं है."
प्रोफ़ेसर विनोदिनी नीलकंठ अपने शोध के आधार पर कहती हैं, "ये सभी सरनेम एक-दूसरे से अलग-अलग बने हैं और इनके बनने की वजहें भी अलग हैं. हाथी और वाघ सरनेम गुजराती हिंदुओं में मिलते हैं, लेकिन दोनों सरनेम बनने की वजहें बिल्कुल अलग हैं."
समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं, "साहित्यकार रणजीतराम वावाभाई ने एक बार कहा था कि गुजरात में जितनी जातियां और समुदाय हैं, उतने शायद कहीं और नहीं होंगे. हमारे यहां समुदायों और सरनेम में बहुत विविधता है."
वह कहते हैं, "कारोबारी संस्कृति की वजह से हमारे यहां कई सरनेम व्यापार से जुड़े हैं. जैसे, दलाल, ब्रोकर और लाडवावाला. उस समय बातचीत और संपर्क के साधन बहुत कम थे. इसलिए समुदाय और पेशे की पहचान बताने के लिए ऐसे सरनेम रखे जाते थे. गुजरात में गांवों के नाम पर भी सरनेम रखे गए हैं. जैसे सोजित्रा. हालांकि, इस तरह के सरनेम ज़्यादातर सौराष्ट्र में ही मिलते हैं."
प्रोफ़ेसर नीलकंठ लिखती हैं, "घोड़ा सरनेम काठियावाड़ के नागर समुदाय में मिलता है. हालांकि, इसकी शुरुआत को लेकर कई अनुमान हैं. काठियावाड़ में घोड़ाद्रा नाम का एक गांव है और घोड़ासर नाम के कई तालाब हैं. हो सकता है कि इसी वजह से यह सरनेम पड़ा हो."
"कहा भी यही जाता है कि उस समय नागर समुदाय के लोगों का शरीर इतना मज़बूत होता था कि वे घोड़ासर तालाब के गहरे पानी में भी घोड़े की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंच जाते थे. इसलिए उन नागरों को घोड़ा कहा जाने लगा."
इसी तरह पोपट सरनेम पारसी और हिंदू, दोनों समुदायों में मिलता है.
प्रोफ़ेसर नीलकंठ इसके पीछे पोपट जैसी नाक या पोपट की तरह रटा हुआ ज्ञान हासिल करने जैसी वजहें बताती हैं.
मच्छर सरनेम के बारे में वह लिखती हैं, "माना जाता है कि यह सरनेम काठियावाड़ का है. हो सकता है कि किसी परिवार में कोई व्यक्ति बहुत ईर्ष्या करने वाला रहा हो और ऊपर से ग़ुस्से से भरा रहता हो. इसलिए लोगों ने उसे 'मत्सर' नाम दे दिया हो. यह भी हो सकता है कि परिवार जिस गली में रहता था, वहां बहुत मच्छर होते हों. इसलिए उन्हें मच्छरवाला कहा जाने लगा हो."
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मांकड़ भी एक काफ़ी प्रचलित सरनेम है. यह सरनेम काठियावाड़ के नागर समुदाय और मुसलमानों में भी मिलता है. गुजराती शब्द मांकड़ का अर्थ होता है - खटमल.
इसके बारे में वह लिखती हैं, "इस सरनेम वाले लोगों ने इसकी जड़ें ऋषि मार्कंडेय से जोड़ी हैं. यह भी हो सकता है कि मच्छर की तरह मांकड़ वाले इलाक़े में रहने वाले लोगों को मांकड़ कहा जाने लगा हो. किसी व्यक्ति का स्वभाव मांकड़ की तरह परेशान करने वाला हो और वह दूसरों को चैन से न बैठने देता हो तो उसे भी मांकड़ नाम दिया गया हो."
इसी तरह वाघ सरनेम के पीछे वह वाघेश्वर मेहता नाम के एक प्रमुख व्यक्ति को वजह मानती हैं. उनके प्रभाव के कारण पूरा परिवार वाघ के नाम से पहचाना जाने लगा.
समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं, "मच्छर, हाथी और घोड़ा जैसे सरनेम मुख्य रूप से तीन समुदायों में मिलते हैं. ये समुदाय नागर, लोहाणा और ब्रह्मक्षत्रिय हैं. अब इस तरह के सरनेम बहुत कम देखने को मिलते हैं. ये सभी सरनेम सौराष्ट्र के इलाक़ों में ही मिलते हैं. दूसरे समुदायों के मुक़ाबले नागर समुदाय के लोगों ने अपने ये सरनेम बदले भी नहीं हैं."
वह कहते हैं, "सौराष्ट्र में 200 से ज़्यादा रियासतें थीं. हर रियासत की अपनी पहचान थी. इन रियासतों में काम करने वाले लोगों के सरनेम भी उनकी अलग-अलग पहचान बताते थे. नागर समुदाय के लोग मुग़ल शासन के दौरान राजकाज में बहुत ज़्यादा शामिल थे. वे दीवान भी रहे. हो सकता है कि इसी वजह से उन्होंने ऐसे सरनेम रखे हों."
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मांकड़ सरनेम वाले मशहूर लोगों की बात करें तो इनमें सबसे पहले वीनू मांकड़ का नाम आता है.
वीनू मांकड़ को भारतीय क्रिकेट के शुरुआती स्थापित ऑलराउंडरों में गिना जाता है.
साल 1947-48 में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान वीनू मांकड़ ने सिडनी टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज़ बिल ब्राउन को नॉन-स्ट्राइकर छोर पर रन आउट किया था. उनके सरनेम के आधार पर ही क्रिकेट में इस तरह से आउट करने को 'मांकडिंग' कहा जाने लगा.
भारत की पूर्व टेनिस खिलाड़ी निरुपमा मांकड़ का भी यही सरनेम है. वह 1965 से 1978 के बीच भारत की शीर्ष टेनिस खिलाड़ी रही थीं.
मांकड़ सरनेम वाले मशहूर लोगों में गुजराती साहित्यकार और उपन्यासकार मोहम्मद मांकड़ भी शामिल हैं. उन्हें साहित्य गौरव पुरस्कार और रणजीतराम सुवर्ण चंद्रक से सम्मानित किया जा चुका है.
हाथी सरनेम वाले जाने-माने लोगों में कांग्रेस के सौराष्ट्र के नेता जयसुखलाल हाथी शामिल हैं. वह लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं. इसके अलावा वह पंजाब और हरियाणा के राज्यपाल भी रहे थे.
घोड़ा सरनेम भी काफ़ी जाना-पहचाना है. महाराष्ट्र में शिवसेना के नेता और पूर्व विधायक अमित घोड़ा, कृष्णा घोड़ा और गुजरात के फ़िल्म निर्माता अभिलाष घोड़ा भी यही सरनेम रखते हैं.
पोपट सरनेम वाले लोगों में मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी और अर्जुन पुरस्कार विजेता अपर्णा पोपट और गुजराती मूल के ब्रिटिश राजनेता डोलर पोपट शामिल हैं.
गुजरात की भावनगर लोकसभा सीट से पूर्व सांसद भारतीबेन शियाल भी इसी तरह का सरनेम रखती हैं.
पारसी सरनेम: दारूवाला, पीठावाला, बूमला, गोटला, पापड़खाऊं, भाजीखाऊं, मसालावाला, पाववाला, नारियलवाला, बेकरीवाला और अंडावाला.
पेशे से जुड़े सरनेम: इंजीनियर, घड़ियाली, ज़वेरी, कापड़िया, गांधी, मर्चेंट, दलाल, वकील, सुतरिया, सुथार और लुहार.
जगह या गांव के नाम पर रखे गए सरनेम: खंभाता, सोजित्रा, घोघावाला, पारडीवाला, भरूचा, संजाणा, सूरती और अहमदाबादी.
गुजराती हिंदुओं में इस्तेमाल होने वाले मुसलमानों से जुड़े सरनेम: बख़्शी, मुंशी, बादशाह, नवाब, इनामदार, क़ाज़ी और सूबेदार.
समुदायों के नाम से बने सरनेम: कड़िया, कंसारा, काछिया, खमार, घांची, दर्जी, प्रजापति, भरवाड़, रबारी, मोची और सोनी.
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