एक तरफ सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) यानी हमारा सेंसर बोर्ड हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म स्पाइडर-मैन में महज आठ सेकेंड के किसिंग सीन पर कैंची चला देता है. दूसरी तरफ कन्नड़ सुपरस्टार यश की फिल्म टॉक्सिक के इंटीमेट सीन्स को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि फिल्म के ट्रेलर से लगभग सारे बोल्ड सीन हटा दिए गए, जबकि थिएटर में फिल्म रिलीज होने के बाद दर्शकों को वो सीन देखने को मिले. अब इसी बीच मिर्जापुर द मूवी के ट्रेलर में खुलेआम दिखाई गई हिंसा और इंटीमेट सीन्स को लेकर सेंसर बोर्ड का रुख भी सामने आ गया है.
पिछले कुछ दिनों से एक सवाल लगातार उठ रहा था कि जब सामान्य रोमांस या कुछ सेकेंड का किसिंग सीन भी सेंसर बोर्ड की नजर में आपत्तिजनक हो सकता है, तो फिर मिर्जापुर द मूवी जैसे प्रोजेक्ट में दिखाए गए बेहद बोल्ड और असहज करने वाले दृश्यों को लेकर बोर्ड का क्या रुख होगा? खासकर तब, जब मिर्जापुर फ्रेंचाइजी के पिछले सीजन्स में भी कई ऐसे इंटीमेट और बोल्ड सीन देखने को मिले हैं, जिन्हें लेकर दर्शकों के बीच सवाल उठते रहे हैं.
फर्क सिर्फ इतना है कि अब तक मिर्जापुर की कहानी ओटीटी पर दिखाई जाती रही थी, जहां दर्शक अपनी निजी स्क्रीन पर इसे देखते थे लेकिन मिर्जापुर द मूवी के साथ यही दुनिया अब सिनेमाघरों के बड़े पर्दे पर पहुंच रही है. ऐसे में सेंसर बोर्ड की भूमिका और उसकी कसौटी पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेंसर बोर्ड ने मेकर्स से इंटीमेट सीन्स में विजुअल और साउंड के स्तर पर बदलाव करने को कहा है. जानकारी के अनुसार, दो दृश्यों में कट और बदलाव किए गए हैं. एक फिल्म के पहले हाफ में और दूसरा दूसरे हाफ में. बताया जा रहा है कि करीब 35 सेकेंड के इंटीमेट कंटेंट को हटाया गया है और संबंधित दृश्यों की अवधि को लगभग 50 फीसदी तक कम किया गया है.
यानी बोर्ड ने इन दृश्यों को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उनमें कटौती और बदलाव का रास्ता चुना है. यही बात इस पूरे विवाद को और दिलचस्प बनाती है.
महिला को ऑब्जेक्टिफाई करने वाला सीन बना चर्चा का केंद्र
दरअसल, मिर्जापुर द मूवी के ट्रेलर में एक ऐसा सीन सामने आया था, जिसने सोशल मीडिया पर काफी ध्यान खींचा. एक तरफ बैकग्राउंड में गोलियां चल रही हैं, मारपीट और एक्शन का माहौल है, तो दूसरी तरफ उसी फ्रेमिंग में एक इंटीमेट दृश्य दिखाई देता है. सीन में मुन्ना त्रिपाठी का किरदार निभाने वाले दिव्येंदु एक महिला के साथ इंटीमेट स्थिति में नजर आते हैं.
Teacher - Counting Ke 98, 99, 100 Apne Style Main Sunao. Le Munna Bhai ☠️☠️☠️☠️☠️#MirzapurTheMovie pic.twitter.com/PsLTUVvqRb
इस दृश्य को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उस बैकग्राउंड साउंड की हुई, जिसमें '98, 99...' जैसी गिनती सुनाई देती है. सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर एक महिला को इस तरह गिनती के साथ दिखाने की जरूरत क्या थी? आलोचकों के मुताबिक, यह सिर्फ बोल्डनेस का मामला नहीं है, बल्कि महिला के चरित्र को एक इंसानी किरदार के बजाय महज एक वस्तु की तरह पेश करने का सवाल भी खड़ा करता है.
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर बोल्ड कंटेंट को लेकर दर्शकों के पास कम से कम अपनी पसंद का विकल्प होता है. वे तय कर सकते हैं कि क्या देखना है, कब देखना है और किस स्क्रीन पर देखना है लेकिन सिनेमाघर का अनुभव अलग है। वहां एक ही स्क्रीन पर अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि के लोग फिल्म देखते हैं.
यही वजह है कि सवाल सिर्फ मिर्जापुर द मूवी के किसी एक सीन का नहीं है.। सवाल यह है कि बड़े पर्दे के लिए कंटेंट तय करते समय फिल्मकारों और सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या किसी दृश्य का सिर्फ 'एडल्ट' होना उसे सिनेमाघर में दिखाए जाने के लिए पर्याप्त बना देता है, या फिर यह भी देखा जाना चाहिए कि वह दृश्य कहानी में कितना जरूरी है और उसे किस तरह फिल्माया गया है?
सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर यह बहस नई नहीं है. कई बार फिल्मों में सामान्य रोमांस, किसिंग या अंतरंगता के बेहद छोटे दृश्यों पर भी कट लगाने को लेकर सवाल उठे हैं. ऐसे मामलों में भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और दर्शकों की संवेदनशीलता का तर्क सामने आता रहा है.
लेकिन दूसरी तरफ जब किसी बड़े प्रोजेक्ट में हिंसा और बोल्डनेस का स्तर काफी ज्यादा हो, तो दर्शकों के बीच यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर अलग-अलग फिल्मों के लिए कसौटी एक जैसी है या नहीं. मिर्जापुर द मूवी के मामले में भी अब यही सवाल सामने है कि क्या सेंसर बोर्ड ने सिर्फ दृश्यों की अवधि कम की है या उनकी प्रस्तुति को लेकर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की है?
फिलहाल इतना साफ है कि फिल्म को पूरी तरह बिना बदलाव के पास नहीं किया गया है. इंटीमेट कंटेंट में कट और बदलाव किए गए हैं. हालांकि यह भी देखना दिलचस्प होगा कि थिएटर में दर्शकों को आखिर फिल्म का कितना बदला हुआ वर्जन देखने को मिलता है.
वहीं, फिल्म के निर्देशक गुरमीत सिंह पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे शुरुआत से ही फिल्म को Adults Only यानी वयस्क दर्शकों के लिए प्रमाणपत्र मिलने की उम्मीद के साथ बना रहे थे. ऐसे में अब असली सवाल यह है कि एडल्ट सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद बोल्डनेस की सीमा आखिर कौन तय करेगा कि फिल्मकार, सेंसर बोर्ड या दर्शक?
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