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राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा इन दिनों चर्चा में हैं। उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत को तीन पत्र लिखे हैं। इनमें जस्टिस शर्मा के कामकाज पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जस्टिस मेहता ने उन्हें हटाने और राजस्थान हाईकोर्ट में किसी दूसरे हाईकोर्ट से नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की मांग की है।
जस्टिस संदीप मेहता राजस्थान हाईकोर्ट के जज रह चुके हैं। उन्हें 30 मई 2011 को अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया गया था। 6 फरवरी 2013 को वे स्थायी जज बने। फरवरी 2023 में उन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली। नवंबर 2023 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया।
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा नवंबर 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट के जज बने। जनवरी 2022 में उनका तबादला पटना हाईकोर्ट किया गया। बाद में वे पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट भी भेजे गए। मई 2025 में कॉलेजियम ने उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट वापस भेजने की सिफारिश की। सितंबर 2025 से वे राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश हैं। न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, वे 26 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
एक प्रमुख विधि पोर्टल 'लाइव लॉ' की रिपोर्ट के अनुसार, 17 अगस्त के पत्र में जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा के कथित कुप्रबंधन और संदिग्ध गतिविधियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी शिकायतों के बावजूद उन्हें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर क्यों बने रहने दिया जा रहा है। इस पत्र में एक मौजूदा राजस्थान हाईकोर्ट जज की ओर से मिली जानकारी का भी जिक्र था। इसमें जस्टिस शर्मा पर उस जज की पत्नी के खिलाफ कथित रूप से बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया गया। वे जिला न्यायपालिका में वरिष्ठ अधिकारी हैं। जस्टिस मेहता ने जोधपुर जिला न्यायालय की नई इमारत का मुद्दा भी उठाया। उनके अनुसार, इमारत करीब एक साल से तैयार थी, लेकिन उसका उद्घाटन रोक दिया गया था और उसमें बड़े बदलाव के निर्देश दिए गए थे। बाद में 15 अगस्त को सीजेआई सूर्यकांत ने 40 कोर्ट कक्ष वाली इमारत का उद्घाटन किया।
10 अगस्त के पत्र में जस्टिस मेहता ने कुछ वकीलों और पक्षकारों के प्रति कथित पक्षपात का आरोप लगाया। उन्होंने मामलों की सूची यानी केस लिस्टिंग और प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। उन्होंने एक आपराधिक मामले का भी जिक्र किया। आरोप लगाया गया कि जिस तरह मामला निपटाया गया, उससे कुछ पक्षों को फायदा पहुंचाने का संकेत मिलता है। उन्होंने कुछ मामलों को दूसरी बेंचों से हटाकर जस्टिस शर्मा की बेंच में भेजे जाने का भी आरोप लगाया। जस्टिस मेहता ने हाईकोर्ट में कथित भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पक्षपात का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ अमीर और प्रभावशाली पक्षकारों को फायदा पहुंचाया गया। रोस्टर तय करने की शक्ति के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए।
2 अगस्त के पत्र में जस्टिस मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के अपने दौरों का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि कई जजों ने जस्टिस शर्मा के व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा सहयोग नहीं करने वाले जजों को तबादले जैसी कार्रवाई की धमकी देते थे। जस्टिस मेहता ने उनके न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज पर भी सवाल उठाए।
जस्टिस मेहता ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से जल्द कदम उठाने की मांग की। उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने और जस्टिस शर्मा का राजस्थान से बाहर तबादला करने का आग्रह किया। उनके मुताबिक, ऐसा करना न्यायपालिका के संस्थागत हित में जरूरी है।
इन तीन पत्रों से पहला पत्र 25 जुलाई को लिखा गया था। इसमें वकील पूजा त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ को अलग शिकायत दी थी। इसकी प्रति जस्टिस मेहता और अन्य लोगों को भी भेजी गई थी। शिकायत में जयपुर और अजमेर की स्थायी लोक अदालतों में नियुक्तियों के दौरान पद के कथित दुरुपयोग का आरोप था। कुछ नियुक्त लोगों के साथ कथित पारिवारिक या करीबी निजी संबंधों का भी जिक्र किया गया। शिकायत में कुछ नियुक्तियों में जस्टिस शर्मा से जुड़े लोगों के रिश्तेदारों या सहयोगियों को लाभ देने का आरोप लगाया गया। चार महिला वकीलों के नाम हाईकोर्ट में पदोन्नति के लिए आगे बढ़ाने पर भी सवाल उठाए गए।
जस्टिस शर्मा के खिलाफ सामने आए आरोपों पर राजस्थान के तीन प्रमुख वकील संगठनों ने गंभीर चिंता जताई है। इनमें राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर, राजस्थान हाईकोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन, जोधपुर और राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन, जोधपुर शामिल हैं। तीनों संगठनों ने गुरुवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आपात बैठक की। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए सामने आए घटनाक्रम को लेकर वे गंभीर रूप से चिंतित हैं। संगठनों ने पद के कथित दुरुपयोग की कड़ी निंदा की और मामले को गंभीरता से लेने की बात कही। संगठनों ने यह भी कहा कि सीजेआई ने संस्थागत जांच का अनुरोध किया है। उनके मुताबिक मामला न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़ा है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी मौजूदा जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों को स्थापित संस्थागत प्रक्रिया के जरिए ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा को पद पर बनाए रखने, उनका तबादला करने या कोई दूसरी प्रशासनिक कार्रवाई करने का फैसला सक्षम संस्थागत प्राधिकरण करेगा। इसके लिए उपलब्ध सामग्री पर विचार किया जाएगा। सीजेआई ने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतों का फैसला मीडिया में एक-दूसरे के दावों के आधार पर नहीं किया जा सकता। पत्रों की सामग्री का फैसला सार्वजनिक मंच पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि केवल आरोप लगाए जाने से उसे जज के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले की उचित स्तर पर जांच की जा रही है। इसमें जस्टिस मेहता की ओर से दी गई सामग्री के साथ जस्टिस शर्मा का जवाब भी देखा जाएगा।
इसका जवाब है नहीं, हाईकोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 217 और 218 से जुड़ी है। इसके लिए सिद्ध कदाचार या अक्षमता आधार होना जरूरी है। हाईकोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी ही है। सबसे पहले संसद में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है यह प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में शुरू हो सकता है। लोकसभा में इसके लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। लोकसभा में नोटिस स्पीकर और राज्यसभा में सभापति को दिया जाता है। वे उपलब्ध सामग्री देखने के बाद प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज कर सकते हैं। प्रस्ताव स्वीकार होने पर क्या होता है?
जज को हटाने की प्रक्रिया का ताजा उदहारण जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले से समझा जा सकता है। मार्च 2025 में जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने का मामला सामने आया। इसके बाद तत्कालीन सीजेआई ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। समिति ने जांच के बाद 3 मई 2025 को रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ने हटाने का मोशन स्वीकार किया, लेकिन संसद में प्रक्रिया पूरी होने से पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा दे दिया। इसलिए उन्हें संसद की महाभियोग प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया। इसके बाद भी उनके खिलाफ संसदीय जांच समिति ने अपनी जांच जारी रखी। समिति ने बाद में तीनों आरोपों को साबित माना। इनमें सरकारी आवास में बेहिसाब नकदी की मौजूदगी, घटनास्थल और सबूतों से जुड़े मामले और जांच के दौरान दिए गए उनके जवाब से जुड़े आरोप शामिल थे।
भारत में अब तक किसी भी सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज को संसद की महाभियोग प्रक्रिया पूरी करके पद से नहीं हटाया गया है। यानी आंकड़ा शून्य है। हालांकि, कई जजों के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। कुछ मामलों में संसद में प्रस्ताव आगे बढ़ा, लेकिन जरूरी बहुमत नहीं मिल सका, जबकि कुछ जजों ने संसद की प्रक्रिया पूरी होने से पहले इस्तीफा दे दिया। कुछ प्रमुख मामले:
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