अगर आप त्योहारी सीजन में सोने के सस्ता होने की उम्मीद कर रहे हैं तो यह खबर आपको मायूस करेगी। खबर यह है कि दुनिया की तमाम बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों ने एक बार फिर सोने में अपना पैसा लगाना शुरू कर दिया है। अमुंडी, पिक्टेट, रोबेको और फिडेलिटी जैसे दिग्गजों ने हाल के हफ्तों में सोने की खरीदारी बढ़ाई है। इन कंपनियों के मैनेजरों का कहना है कि भले ही फेडरल रिजर्व महंगाई पर सख्त रुख अपना रहा है, लेकिन सोने की बुनियादी ताकतें अब भी मजबूत हैं। ऐसे में आने वाले समय में सोने के भाव में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
ब्लूमबर्ग की इस ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अमुंडी को उम्मीद है कि साल के अंत तक सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को छू लेगा। यानी भारत में सोन का भाव दो लाख रुपये के आसपास पहुंचेगा।
दिलचस्प बात यह है कि ब्लूमबर्ग की जिन 12 से ज्यादा मैनेजरों से बातचीत हुई, वे सभी या तो खरीदारी कर चुके हैं या फिर सोने के प्रति अपना सकारात्मक रुख बनाए हुए हैं। ये सभी कंपनियां करीब 27 खरब डॉलर की संपत्ति संभालती हैं, जो इस रुझान को और भी अहम बनाता है।
हालांकि, मैनेजरों का यह भी मानना है कि सोने के लिए रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होगा। 28 अगस्त को जैक्सन होल में फेड चीफ केविन वॉर्श ने साफ कहा कि अमेरिकी महंगाई 2% के लक्ष्य की ओर धीमी नहीं हो रही है। इसके बाद ब्याज दर बढ़ने की संभावनाएं और पक्की हो गईं। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी बढ़ रही है, जो आम तौर पर सोने के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जाता, क्योंकि यह ब्याज नहीं देता।
फिर भी इन चुनौतियों का लंबी अवधि के निवेशकों के भरोसे पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। उन्हें लगता है कि सोना एक पोर्टफोलियो में बचाव की तरह काम करता है, जिसकी जरूरत हर हाल में बनी रहेगी। रोबेको के अर्नाउट वैन रिजन तो यहां तक कहते हैं कि सोना अब हर आम पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बन गया है।
पर्मानेंट पोर्टफोलियो फंड्स के माइकल कुगिनो ने जून में 4,000 डॉलर तक की गिरावट को खरीदारी का बेहतरीन मौका बताया। उनके मुताबिक, लंबी अवधि की कहानी अब भी बरकरार है और आने वाले समय में सोना 'हाई लेवल और हाई लो लेवल' बना सकता है।
बीएनपी पारिबा की सोफी ह्यून का कहना है कि सोने से सट्टेबाजी वाली उछाल पूरी तरह खत्म हो गई है। अब इसकी कीमत बुनियादी चीजों से चल रही है, जैसे केंद्रीय बैंकों की बड़ी खरीदारी और मल्टी-एसेट मैनेजरों द्वारा बचाव की तलाश।
सीएफटीसी के ताजा आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि फंड्स का नेट-लॉन्ग पोजीशन इस साल के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है, यानी संस्थागत निवेशकों का सोने पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।
सोने की ताजा खरीदारी की सबसे बड़ी वजह दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों की खरीदारी में तेजी है। अप्रैल-जून के बीच 289 टन सोने की शुद्ध खरीदारी हुई, जो किसी भी दूसरी तिमाही के लिए सबसे ज्यादा है। वहीं, ब्रिजवाटर एसोसिएट्स के बिलियनेयर संस्थापक रे डालियो ने सबसे सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिकी कर्ज संकट से बचने के लिए निवेशकों को अपनी 15% संपत्ति सोने में लगानी चाहिए।
अमेरिप्राइज फाइनेंशियल के एंथनी सैग्लिम्बिन का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय विश्वसनीयता को लेकर भरोसा कम होने के कारण पैसा डॉलर से निकलकर सोने और बिटकॉइन जैसी ठोस संपत्तियों की ओर बढ़ रहा है। सोने की हालिया रिकवरी इसी चिंता को दर्शाती है कि लोग डॉलर को वैल्यू कलेक्टर के रूप में देखने से घबरा रहे हैं। हालांकि, इन्वेस्को के क्रिस्टोफर हैमिल्टन का कहना है कि डॉलर का कोई स्पष्ट विकल्प अभी नहीं है।
एक और अहम पहलू यह है कि पश्चिमी निवेशकों के पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी काफी कम है, खासकर अमेरिकी शेयरों में पिछले सालों की शानदार तेजी के बाद। इसका मतलब है कि अगर वे अपनी संपत्ति का एक छोटा सा हिस्सा भी सोने में लगाते हैं, तो उससे इसकी कीमतों में काफी उछाल आ सकता है।
(डिस्क्लेमर: एक्सपर्ट्स की सिफारिशें, सुझाव, विचार और राय उनके अपने हैं, लाइव हिन्दुस्तान के नहीं। मार्केट में निवेश जोखिमों के अधीन है और निवेश से पहले अपने एडवाइजर से परामर्श कर लें।)
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