गोरखपुर जिले की चिल्लूपार विधानसभा सीट पूर्वांचल की सियासत का वह केंद्र है, जहां राजनीति दशकों से सत्ता के गलियारों से ज्यादा 'जातीय वर्चस्व' और 'प्रतिष्ठा' के इर्द-गिर्द घूमती रही है. पूर्वांचल के बाहुबली नेता रहे स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी की यह पारंपरिक सीट हमेशा से 'गोरखनाथ मठ' (ठाकुर वर्चस्व) बनाम 'तिवारी हाता' (ब्राह्मण वर्चस्व) के सियासी शक्ति-परीक्षण का मैदान रही है. ऐसे में एक बार फिर से ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी लड़ाई बनती दिख रही है.
चिल्लूपार विधानसभा सीट पर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार की लड़ाई अधिक दिलचस्प नजर आ रही है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सबसे पहले अपने पत्ते खोल दिए हैं. भाजपा छोड़कर बसपा में आईं अस्मिता चंद को मायावती के निर्देश पर चिल्लूपार से आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया गया है.
मौजूदा समय में भाजपा से राजेश त्रिपाठी विधायक हैं, लेकिन 2027 में भाजपा से अष्टभुजा शुक्ला भी किस्मत आजमाने की जुगत में हैं. अष्टभुजा शुक्ला तेलंगाना के राज्यपाल और भाजपा के दिग्गज नेता रहे शिव प्रताप शुक्ला के भतीजे हैं. वहीं, सपा से हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी का चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा है. ऐसे में देखना होगा कि चिल्लूपार सीट पर किसका दबदबा कायम रहता है.
पूर्वांचल की सियासत में एक दौर में हरिशंकर तिवारी की तूती बोला करती थी.चिल्लूपार विधानसभा सीट 1976 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर इतिहास रचने वाले हरिशंकर तिवारी बाद में कांग्रेस समेत अन्य दलों के सहयोग से साल 1985 से 2007 तक लगातार छह बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने.
हालांकि, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में हरिशंकर तिवारी को बसपा प्रत्याशी राजेश त्रिपाठी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. 2017 में हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी बसपा के टिकट पर विधायक बने. इसके बाद वे सपा में शामिल हो गए, लेकिन 2022 में भाजपा के टिकट पर लड़े राजेश त्रिपाठी ने उन्हें शिकस्त दे दी.
2027 में हरिशंकर तिवारी की सियासी विरासत को बचाने के लिए विनय तिवारी एक बार फिर सपा से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. सपा से उनका टिकट पक्का माना जा रहा है और वे क्षेत्र में सक्रिय भी हैं, लेकिन उनकी राह में भाजपा से लेकर बसपा तक बड़ी सियासी चुनौतियां खड़ी कर रही हैं.
सपा और भाजपा ने अभी अपने पत्ते पूरी तरह से नहीं खोले हैं, लेकिन बसपा ने अस्मिता चंद को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है. अस्मिता चंद भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुकी हैं. टिकट न मिलने की आशंका के चलते उन्होंने 22 साल पुराना भाजपा का साथ छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया.
अस्मिता चंद राजपूत (ठाकुर) समुदाय से आती हैं और एक मजबूत राजनीतिक परिवार से जुड़ी हैं. उनके ससुर राजनारायण चंद ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं और ससुर के बड़े भाई मारकंडे चंद तत्कालीन धुरियापार सीट से चार बार विधायक और मंत्री रहे हैं. इसके अलावा अस्मिता चंद के जेठ (पति देवेंद्र प्रताप चंद के बड़े भाई) सीपी चंद भाजपा से एमएलसी हैं.
दूसरी ओर, भाजपा से राजेश त्रिपाठी तीसरी बार चिल्लूपार से विधायक हैं और 2027 के लिए भी दावेदारी पेश कर रहे हैं. हालांकि, तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला के भतीजे अष्टभुजा शुक्ला भी टिकट की रेस में मजबूती से उभरे हैं. अष्टभुजा शुक्ला क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं और हाल ही में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी की थी, जिसके बाद उनकी दावेदारी की चर्चा तेज हो गई है.
चिल्लूपार विधानसभा सीट पारंपरिक रूप से ब्राह्मण बहुल मानी जाती है. इसी वोट बैंक के सहारे हरिशंकर तिवारी लंबे समय तक काबिज रहे और बाद में राजेश त्रिपाठी व विनय शंकर तिवारी ने भी इसी समीकरण से जीत दर्ज की. चिल्लूपार में लगभग 1 लाख ब्राह्मण, 90 हजार दलित और परिसीमन के बाद धुरियापार का क्षेत्र शामिल होने से करीब 20-25 हजार ठाकुर मतदाता निर्णायक भूमिका में आ चुके हैं.
दलित और ब्राह्मण वोट बैंक इस सीट का मुख्य समीकरण रहे हैं. यही वजह है कि बसपा ने अस्मिता चंद के रूप में ठाकुर चेहरा उतारकर 'ठाकुर-दलित' के नए समीकरण के दम पर बाजी पलटने की रणनीति बनाई है.
भाजपा और सपा से ब्राह्मण प्रत्याशी का उतरना लगभग तय माना जा रहा है, जबकि बसपा के ठाकुर उम्मीदवार उतारने से मुकाबला त्रिकोणीय और पेचीदा हो गया है. दो प्रमुख ब्राह्मण प्रत्याशियों के आमने-सामने होने की स्थिति में ब्राह्मण मतों में बिखराव का खतरा रहेगा, जिसका फायदा बसपा उठाने की कोशिश करेगी.
1980 के दशक में गोरखपुर में जब हरिशंकर तिवारी (ब्राह्मण गुट) और वीरेंद्र प्रताप शाही (ठाकुर गुट) के बीच वर्चस्व की अदावत शुरू हुई, तो उसने पूरे पूर्वांचल में जातीय ध्रुवीकरण की नींव रखी. 'तिवारी हाता' पूर्वी यूपी के ब्राह्मणों का शक्ति-पीठ बन गया, जबकि 'गोरखनाथ पीठ' को ठाकुर वर्चस्व का केंद्र माना जाता रहा.
वर्तमान में प्रदेश की कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास है. हरिशंकर तिवारी परिवार से पीठ की पुरानी सियासी अदावत किसी से छिपी नहीं है. विपक्षी दल सपा इस माहौल में 'ठाकुर बनाम ब्राह्मण' के नैरेटिव को धार देकर भाजपा को घेरने में जुटी है और चिल्लूपार इस सियासी रणनीति का मुख्य केंद्र बिंदु बना हुआ है.
हरिशंकर तिवारी के जीवनकाल और उनके निधन के बाद 'तिवारी हाता' तथा उनके बेटों पर हुई प्रशासनिक व जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों को सपा ने "प्रतिशोध की राजनीति" से जोड़ा है. यही कारण है कि चिल्लूपार का आगामी चुनाव महज एक विधानसभा सीट जीतने का मुकाबला नहीं है, बल्कि गोरखपुर में मठ प्रभाव की राजनीति और हाता के परंपरारिक किले को बचाए रखने का सीधा संघर्ष है.
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