राजधानी पटना की सड़कों पर एक तरफ जहां छात्र लगातार अपनी मांगों और बिहार लोक सेवा आयोग यानी बीपीएससी की कार्यप्रणाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं अब बीपीएससी ने भी आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। छात्रों के तीखे सवालों और उत्तर पुस्तिकाओं की जांच पर उठ रहे गंभीर आरोपों के बीच बीपीएससी के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार ने दो टूक लहजे में कहा- हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार। उनका ऐसा बेबाक, कड़क और ठेठ अंदाज वाला बयान सामने आया है जिसने पूरे महकमे से लेकर सियासी गलियारों तक में हलचल मचा दी है। छात्रों के तमाम आरोपों को सिरे से बिना किसी लाग-लपेट के खारिज करते हुए परीक्षा नियंत्रक ने आयोग का पक्ष साफ कर दिया है।
दरअसल, यह पूरा मामला तब गरमा गया जब बीपीएससी की परीक्षा में तीसरा रैंक हासिल करने वाले एक छात्र की उत्तर पुस्तिका को लेकर सोशल मीडिया और छात्र संगठनों में सवाल उठने लगे। छात्रों के एक गुट का आरोप था कि कॉपियों की चेकिंग में भारी धांधली हुई है और मनमाने तरीके से नंबर बांटे गए हैं। इसी विवाद की आग पर पानी डालने के मकसद से स्थिति स्पष्ट करते हुए बीपीएससी के परीक्षा नियंत्रक ने पूरी बात तफ्सील से सबके सामने रखी। उन्होंने मीडिया को खुलकर बताया कि जिस उत्तर पुस्तिका को लेकर इतना भारी हो-हल्ला मचाया जा रहा है, उसके पीछे की असली कहानी क्या है।
परीक्षा नियंत्रक ने बहुत ही सीधे शब्दों में स्पष्ट किया कि तीसरे रैंक वाले उम्मीदवार ने परीक्षा में 7वें प्रश्न का उत्तर तो अपनी कॉपी में लिखा था, लेकिन उस प्रश्न के दो हिस्से (सब-पार्ट्स) भी थे। उम्मीदवार ने जल्दबाजी में या जानकारी न होने के कारण उन दोनों हिस्सों का जवाब अपनी कॉपी में लिखा ही नहीं था। अब ऐसे में नियम एकदम सीधे और पारदर्शी हैं, जब किसी परीक्षार्थी ने सवाल का एक बड़ा और अहम हिस्सा छोड़ ही दिया है तो उस हिस्से के लिए उसे आसमान से लाकर अंक कैसे दिए जा सकते हैं? जाहिर सी बात है 7वें प्रश्न के छोड़े गए उन हिस्सों के लिए उस छात्र को कोई अंक नहीं दिया गया है। आयोग का दृढ़ता से कहना है कि यह किसी भी तरह से पक्षपात, धांधली या भेदभाव का मामला नहीं है, बल्कि यह तो एक निष्पक्ष मूल्यांकन प्रक्रिया का सबसे बुनियादी नियम है।
अक्सर छात्रों के बीच यह गलत धारणा घर कर जाती है कि मुख्य परीक्षा (मेंस) की कॉपियां बस भर देने से या बेवजह लंबे-लंबे पैराग्राफ उकेर देने से अच्छे नंबर मिल जाएंगे। इस सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए आयोग की तरफ से यह बिल्कुल साफ कर दिया गया है कि बीपीएससी जैसी अति-प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा में उत्तर की लंबाई या पन्नों की गिनती नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता (क्वालिटी) और गहराई देखी जाती है। कॉपी जांचने वाले विशेषज्ञ सिर्फ यह देखते हैं कि आपने पूछे गए सवाल का कितना सटीक, तार्किक और विश्लेषणात्मक जवाब दिया है। अगर आपके जवाब में दम है और आपने विषय को छुआ है, तो आपको जरूर नंबर मिलेंगे। लेकिन अगर सिर्फ पन्ने रंगे गए हैं और मुख्य बातें ही गायब हैं, तो अंक कटने तय हैं। रैंक 3 वाले मामले में भी ठीक इसी उच्च कोटि के पैमाने को अपनाया गया है।
लगातार हो रहे प्रदर्शनों, धरना-प्रदर्शन और मीडिया में चल रही अनर्गल बयानबाजी से आजिज आकर परीक्षा नियंत्रक ने एक तरह से आंदोलनरत छात्रों को मंच से खुली चुनौती दे डाली है। उनका कहना है कि अगर इन छात्रों को सचमुच लगता है कि उनके द्वारा लगाए जा रहे आरोपों में वाकई कोई सच्चाई या वजन है, तो वे सड़कों पर हंगामा करके वक्त क्यों बर्बाद कर रहे हैं? वे सीधे कोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाते? न्यायपालिका सबके लिए खुली है और सबूतों पर बात करती है। अगर आयोग ने वाकई कुछ गलत किया है, तो वे पक्के सबूतों के साथ अदालत में जाएं, वहां दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!