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सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान और तेज बनाया है। लेकिन इस तकनीक की दुनिया के बड़े नाम अपने बच्चों के मामले में इसके इस्तेमाल को सीमित रखने की कोशिश करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जिन लोगों ने डिजिटल दुनिया को इतना बड़ा बनाया, वे अपने बच्चों को इससे क्यों दूर रखना चाहते हैं? क्या सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है? विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े क्या कहते हैं? दुनिया के कई देश बच्चों के लिए सोशल मीडिया की उम्र सीमा तय करने की ओर क्यों बढ़ रहे हैं? इन प्लेटफॉर्मस पर कब-कब ऐसे मामले देखने को मिले हैं? भारत इस दिशा में क्या कर रहा है?
मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने कहा था कि वह नहीं चाहते कि उनके बच्चे लंबे समय तक टीवी या कंप्यूटर के सामने बैठे रहें। उनके अनुसार लोगों के साथ बातचीत करना अच्छी बात है, लेकिन लगातार एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर जाना उतना सकारात्मक नहीं है।
बच्चों के लिए चिंता केवल इस बात की नहीं है कि वे कितने घंटे स्क्रीन देखते हैं, बल्कि यह भी है कि वे स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं और उसका उनके व्यवहार पर क्या असर पड़ रहा है। यूट्यूब के सह-संस्थापक स्टीव चेन ने छोटे वीडियो को लेकर चिंता जताई थी। उनका डर था कि लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने से बच्चों की लंबी सामग्री पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं की मई में जारी रिपोर्ट में भी छोटे बच्चों के लिए डिजिटल स्क्रीन को लेकर चिंता जताई गई। रिपोर्ट के अनुसार शिशुओं के लिए डिजिटल स्क्रीन के लाभ सीमित हैं, जबकि शारीरिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर संभावित जोखिम ज्यादा हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोप क्षेत्रीय कार्यालय के अध्ययन में 2022 में 44 देशों और क्षेत्रों के करीब 2 लाख 80 हजार बच्चों को शामिल किया गया। इनमें 11, 13 और 15 साल के बच्चे थे। अध्ययन के मुताबिक किशोरों में समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल की दर 2018 के 7 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 11 प्रतिशत हो गई।
यानी लड़कियों में समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल की दर लड़कों से चार प्रतिशत अंक अधिक रही।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, समस्या केवल ज्यादा समय तक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की नहीं है। समस्या तब मानी जाती है जब बच्चे का अपने इस्तेमाल पर नियंत्रण कम होने लगे। इसके संकेत हैं:
राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय में प्रकाशित समीक्षा के मुताबिक ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल को बच्चों में चिंता, अवसाद और खराब नींद जैसी समस्याओं से जोड़ा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 8 से 12 साल के करीब 70 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। वहीं 9 से 12 साल के बच्चे रोज औसतन 1.5 घंटे सोशल प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं। एक अन्य विश्लेषण में पाया गया कि सोशल मीडिया पर रोज दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में कम इस्तेमाल करने वाले बच्चों की तुलना में चिंता और अवसाद के लक्षणों का जोखिम अधिक पाया गया। सोने से पहले सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से नींद में परेशानी हो सकती है और नींद की गड़बड़ी आगे चलकर चिंता के लक्षणों से जुड़ सकती है। हालांकि शोधों में सोशल मीडिया इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध पाया गया है, लेकिन हर मामले में सोशल मीडिया को सीधे कारण के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर कई देशों ने उम्र आधारित प्रतिबंध लागू किए हैं या कानून बनाने की प्रक्रिया में हैं।
यूरोप में भी कई देश इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। ग्रीस ने 1 जनवरी 2027 से 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की योजना बनाई है। ऑस्ट्रिया 14 साल से कम और स्लोवेनिया 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध पर काम कर रहे हैं। ब्रिटेन 2027 की शुरुआत तक 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की दिशा में काम कर रहा है। कनाडा भी न्यूनतम उम्र 16 साल करने पर विचार कर रहा है। फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने का प्रस्ताव संसद में है। पुर्तगाल 16 साल की उम्र तक सोशल मीडिया मंचों तक स्वतंत्र पहुंच रोकने पर विचार कर रहा है। स्पेन ने सोशल मीडिया पर पंजीकरण की न्यूनतम उम्र 14 से बढ़ाकर 16 साल करने का प्रस्ताव रखा है। इटली में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक संबंधी कानून पर विचार चल रहा है।
भारत में अभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया की कोई अलग राष्ट्रीय उम्र सीमा लागू नहीं है। हालांकि, सरकार ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं।
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