मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के खपरिया गांव के रहने वाले मनोज पाल की कहानी संघर्ष और हिम्मत की मिसाल है। उन्होंने करीब 12 साल तक सरकारी नौकरी की तैयारी की, कई बार असफल हुए, लेकिन आखिरकार MPPSC स्टेट सर्विस एग्जाम 2024 पास कर ही लिया। अब वे मध्य प्रदेश में असिस्टेंट डायरेक्टर (फाइनेंस) बन गए हैं।
उनका सफर आर्थिक तंगी, परिवार के दबाव और कई असफलताओं से भरा रहा। फिर भी, वे हर बार उठकर फिर से किताबों में जुट गए।
12वीं में 50% से लेकर कंपटीशन एग्जाम तक
मनोज पाल ने अपनी स्कूली पढ़ाई गांव से की और 12वीं में करीब 50 प्रतिशत अंक हासिल किए। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए आगे की पढ़ाई करना मुश्किल था। वे कॉलेज के लिए नर्मदापुरम चले गए और सरकारी नौकरी की तैयारी के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाते थे।
कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी आर्थिक परेशानी और बढ़ गई। काम और कमाई दोनों ठप हो गए। वे गांव लौट आए और पढ़ाई के लिए पैसे जुटाने के लिए मजदूरी करने लगे। बाद में वे इंदौर चले गए, जहां उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और कोचिंग सेंटर में पढ़ाने के साथ-साथ स्टूडेंट्स को ट्यूशन भी पढ़ाया।
करीब 40 एग्जाम, लेकिन फाइनल सेलेक्शन नहीं
इन वर्षों में मनोज पाल ने करीब 40 प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, जिनमें पुलिस कांस्टेबल, वन रक्षक, पटवारी, ऑडिटर और अधिकारी पदों की भर्ती परीक्षाएं शामिल थीं। उन्होंने SSC की MTS, CHSL और CGL परीक्षाएं भी दीं, साथ ही कई MPPSC भर्ती परीक्षाएं भी दीं।
कई परीक्षाओं में वे आखिरी चरण तक पहुंचे, लेकिन फाइनल सेलेक्शन नहीं हो पाया।
MPPSC का सफर उनके लिए सबसे कठिन रहा। उन्होंने यह परीक्षा नौ बार दी, हर बार प्रीलिम्स पास किया और आठ बार मेंस तक पहुंचे। सात इंटरव्यू दिए, लेकिन फाइनल लिस्ट में नाम नहीं आया।
अनुशासन से भरी दिनचर्या
बार-बार असफल होने के बावजूद मनोज पाल ने अपनी पढ़ाई का शेड्यूल नहीं छोड़ा। वे सुबह 6 बजे लाइब्रेरी पहुंचते थे और घंटों पढ़ाई करते थे। दिन में घर आकर खाना बनाते और फिर वापस लाइब्रेरी चले जाते।
वे अक्सर रात 12 बजे या 1 बजे तक पढ़ाई करते थे और कोचिंग सेंटर में बच्चों को पढ़ाते भी थे। उनकी तैयारी में रोजाना 6 से 8 घंटे की पढ़ाई, नियमित मॉक टेस्ट और गलतियों का विश्लेषण शामिल था।
वे दोस्तों के साथ मुश्किल टॉपिक्स पर चर्चा करते थे और पिछले सालों के प्रश्न पत्रों से एग्जाम स्ट्रैटजी बनाते थे।
घर का दबाव, खुद पर भरोसा
मनोज पाल एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान परिवार से आते हैं। परिवार ने उनकी तैयारी में साथ दिया, लेकिन लंबे समय तक नौकरी न मिलने से चिंता बढ़ती गई। परिवार को उनकी उम्र और जिम्मेदारियों की भी चिंता थी, जिसमें बहनों की शादी भी शामिल थी।
वे कहते हैं कि गड़रिया (भेड़ चराने वाली) समुदाय से होने के कारण लोगों को उनसे ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं। फिर भी, उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।
12 साल का इंतजार खत्म करने वाला सेलेक्शन
स्टेट सर्विस एग्जाम 2024 में उनका सेलेक्शन होते ही सालों की अनिश्चितता खत्म हो गई। परिवार के लिए यह पल बेहद भावुक करने वाला था।
मनोज पाल ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता के आशीर्वाद, परिवार के सहयोग और मां नर्मदा की कृपा को दिया। परिवार की प्रतिक्रिया ने उनके विश्वास को दर्शाया: “भगवान की न्याय में देरी होती है, लेकिन इनकार नहीं होता।”
बार-बार असफल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए मनोज पाल का संदेश सीधा है: जो लोग अपनी परिस्थितियां बदलना चाहते हैं, उन्हें कड़ी मेहनत करनी होगी, अपनी ताकत और कमजोरी समझनी होगी, और खुद पर भरोसा नहीं खोना होगा।
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