Ram Mandir: राम मंदिर के 500 सौ साल के इतिहास का पहला अवसर था जब विराजमान रामलला अपने महल से निकलकर कुबेर टीला पर झूला विहार के लिए पहुंचे। इस ऐतिहासिक क्षण के साथ बने संत-श्रद्धालुओं ने अनुजों संग झूले पर विराजित रामलला को झूला झुलाकर भाव विभोर हो गए और उनके नेत्र स्थल हो गये। इस झूलनोत्सव के दौरान शास्त्रीय संगीतज्ञों ने स्वर लहरियों व अलाप से ऐसा समां बांधा की श्रोता भक्तजन झूम उठे। इस झूलनोत्सव की खास बात यह भी रही कि मधुर उपासना के आचार्यों ने जिन पदों की रचना की, उनमें अधिकांश युगल सरकार अर्थात भगवान श्रीसीताराम को केंद्र में रखकर की।
श्रीराम जन्मभूमि में तीनों अनुजों के संग झूलन में विराजित रामलीला के मुखोल्लास के लिए गाए जाने पदों को खोज-खोज कर छांटा गया। इन पदों में भी हनुमत निवास महंत आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने संशोधन कराकर गायन कराया। इस उत्सव के दौरान संगीतज्ञ सुमधुर शास्त्री के निर्देशन में आचार्य राधेश्याम दास, पंडित राम विनोद शरण व्यास के साथ विवेकानंद पाण्डेय, मृदंग वादक पंडित अभयराम दास व वैभव राम दास व तबला वादक राम प्रिया शरण ने संगत कर सांस्कृतिक कार्यक्रम को ऊंचाई प्रदान की।
इस पल के साक्षी बने राम मंदिर के ट्रस्टी व निर्मोही अखाड़ा महंत दिनेंद्र, अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन, आमंत्रित सदस्य व मणिराम छावनी महंत कमलनयन दास व राम कथा कुंज महंत सत्यनारायण दास, श्रीराम वल्लभा कुंज के अधिकारी स्वामी राजकुमार दास के अलावा व्यवस्थापक आचार्य इंद्रदेव मिश्र, आशीष अग्निहोत्री व अन्य भी भगवान को झुला झुलाने के लिए लालायित रहे। इस दौरान आली थी, राघव जी के रुचिर हिंडोला, कौशलपुरी सुहावनी सरि सरयू तीर, झूलत नवल दशरथ लाल-सरयू तीर प्रमोद बन में लिए संग सखा बाल, झूलत नवल हिंडोरे व प्रिय प्यारे संग बनी ठनी रामा..। इत्यादि पदों का गायन हुआ।
राम मंदिर में शुरू हुए झूलनोत्सव के उपलक्ष्य में सभी द्वारों सहित कुबेर टीला को वंदन वारो व तोरण द्वारों से सुसज्जित किया गया। इसके साथ ही राम मंदिर के शिखर के साथ सभी मंडपों को फसाड लाइटों व कुबेर टीला को रंग-बिरंगी विद्युत झालरों से सजाया गया था। पुनः सायंकाल करीब चार बजे भगवान रामलला की पालकी यात्रा बाजे-गाजे के साथ धूमधाम से निकाली गयी। यह पालकी यात्रा राम मंदिर की परिधि में परिक्रमा करते हुए कुबेर टीला पर पहुंची। यहां पहुंचकर रामलला व उनके अनुजों को कुबेरेश्वर महादेव के सामने बेल व पाकड़ की संयुक्त डाल पर सुसज्जित झूले पर उन्हें प्रतिष्ठित कर आरती उतारी गयी। फिर शास्त्रीय संगीत के साथ झूलन का कार्यक्रम शुरू हुआ । जो सायं सात बजे तक चलता रहा। पुनः भगवान की आरती उतारी गयी और फिर रामलला को पालकी में लेकर सभी पुजारीगण एवं परिकर मंदिर में पहुंचे और यथास्थान विराजित किया गया। यह पालकी यात्रा 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद 43 दिनों तक चले मंडल पूजन के बाद अब निकाली गयी।
अयोध्या। अयोध्या के प्रतिनिधि उत्सव के रूप में राम मंदिर में शनिवार से शुरू हुआ झूलनोत्सव सावन पूर्णिमा तक चलेगा। पहले दिन उत्सव की शुरुआत अयोध्या की परम्परा में मणि पर्वत के बजाय कुबेर टीला से हुई। वहीं रविवार से रामलला का झूलन उत्सव मंदिर के जगमोहन में ही होगा। सुबह भगवान के उत्सव विग्रहों को रजत झूले पर प्रतिष्ठित कर उनकी श्रृंगार आरती उतारी गयी। वहीं सायंकाल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे। इस उत्सव में भाग लेने वाले सभी कलाकारों व आगंतुकों को भारतीय परिवेश धोती-कुर्ता व धोती-चौबंदी में आने का निर्देश दिया गया है। कुबेर टीला पर भगवान को झूला झुलाते का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त हो सका जो भारतीय परिवेश में उत्सव में भाग लेने पहुंचे। फिलहाल दर्शन का सौभाग्य आम श्रद्धालुओं को भी मिलता रहा।
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