आज भी हमारे समाज में पर्दे पर इंटीमेट सीन आते ही बहुत से लोग असहज हो जाते हैं. टीवी पर परिवार के साथ कोई ऐसा सीन आ जाए तो नजरें झुक जाती हैं, चैनल बदल दिया जाता है और अगर फिल्म में ऐसे कई सीन हों तो कई परिवार थिएटर जाने से पहले ही पूछ लेते हैं- ‘फिल्म में वो वाला सीन तो नहीं है?’
लेकिन जरा सोचिए, जिस सीन को हम दो-तीन मिनट में देखकर आगे बढ़ जाते हैं, उसे शूट करने के दौरान उस सीन का हिस्सा बनने वाले कलाकारों के लिए माहौल कैसा होता होगा? क्या वाकई हीरो-हीरोइन कैमरे के सामने एक-दूसरे के साथ वैसे ही इंटीमेट होते हैं, जैसा हमें पर्दे पर दिखाई देता है? जवाब है- नहीं.
पर्दे पर जो चीज सहज, रोमांटिक या बेहद वास्तविक नजर आती है, उसके पीछे काफी तैयारी होती है. कैमरा कहां होगा, कलाकार का हाथ कहां जाएगा, किस दूरी तक शारीरिक संपर्क होगा, क्या दिखेगा और क्या नहीं दिखेगा, कलाकार किस चीज के लिए सहज हैं और किस चीज के लिए नहीं- इन सबका पहले से ध्यान रखा जाता है.
और यहीं एंट्री होती है इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की.
भारत में यह प्रोफेशन अभी नया है, लेकिन धीरे-धीरे फिल्म और ओटीटी इंडस्ट्री में इसकी जरूरत समझी जाने लगी है. इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर का काम सिर्फ यह देखना नहीं होता कि इंटीमेट सीन अच्छा दिख रहा है या नहीं. उनका सबसे अहम काम होता है- कलाकारों की सहमति, सीमाओं और सुरक्षा का ध्यान रखना.
भारत की पहली सर्टिफाइड इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर आस्था खन्ना ने 16 हफ्तों की ट्रेनिंग इंटीमेसी प्रोफेशनल्स एसोसिएशन से की है. असल में एक असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि सेट पर एक्शन सीन्स के लिए स्टंट को-ऑर्डिनेटर हैं, गानों के लिए कोरियोग्राफर हैं, लेकिन इंटीमेट सीन्स के लिए ऐसा कोई खास प्रोफेशनल नहीं है.
आस्था के मुताबिक, उनका काम निर्देशक की सोच को पर्दे पर उतारने में मदद करना है, लेकिन इस दौरान कलाकारों की सीमाओं और सहमति से कोई समझौता नहीं होना चाहिए. ''मेरी भूमिका सबसे पहले कलाकारों से सहमति और उनकी सीमाओं के बारे में बात करने की है. मुझे सीन को समझना होता है और फिर निर्देशक की सोच के हिसाब से उसे कोरियोग्राफ करना होता है. मैं यह भी सुनिश्चित करती हूं कि शूटिंग के बाद या पोस्ट-प्रोडक्शन में अचानक कोई नया बदलाव न कर दिया जाए.''
यानी पर्दे पर भले ही सीन अचानक और सहज लगता हो, लेकिन कैमरे के पीछे उसकी तैयारी काफी तकनीकी हो सकती है.
भारत में शुरुआत ‘मस्तराम’ से हुई
भारत में इंटीमेसी को-ऑर्डिनेशन की चर्चा ‘मस्तराम’ जैसी वेब सीरीज से शुरू हुई. साल 2020 आई MX Player की इस सीरीज में इरॉटिका लेखक की जिंदगी से प्रेरित कहानी दिखाई गई थी और इसमें कई इंटीमेट सीन्स थे.
सीरीज के निर्माताओं ने कनाडा की इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर अमांडा कटिंग की मदद ली थी. उनका काम यह सुनिश्चित करना था कि ऐसे सीन शूट करते वक्त कलाकारों के लिए प्रक्रिया सुरक्षित और व्यवस्थित रहे. इसके बाद ‘गहराइयां’ जैसी फिल्मों में भी इंटीमेसी सीन्स की शूटिंग को लेकर चर्चा बढ़ी. दीपिका पादुकोण और सिद्धांत चतुर्वेदी की इस फिल्म में इंटीमेसी को पर्दे पर काफी वास्तविक अंदाज में दिखाया गया था. इसके बाद भारत में भी इस काम को एक अलग प्रोफेशन के तौर पर पहचान मिलने लगी.
पहले पत्ते और पेड़ों के पीछे छिप जाता था रोमांस
एक वक्त था जब भारतीय फिल्मों में सेक्स या इंटीमेसी को सीधे दिखाने के बजाय फूलों, पेड़ों, पर्दों और कैमरे के इशारों से काम चला लिया जाता था. दो किरदार करीब आए नहीं कि कैमरा कहीं और चला जाता था और दर्शक समझ जाते थे कि आगे क्या हुआ होगा.
लेकिन वक्त बदला. ओटीटी के आने के बाद ‘मेड इन हेवन’, ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसे शोज में इंटीमेट रिलेशनशिप और सेक्स को कहीं ज्यादा खुलकर दिखाया गया. इसके साथ ही एक जरूरी सवाल भी सामने आया- जब पर्दे पर इतना कुछ वास्तविक दिखाया जा रहा है तो उसे शूट करने का सुरक्षित तरीका क्या है?
यहीं से इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई.
आस्था खन्ना का कहना है कि इंटीमेट सीन को किसी अचानक पैदा हुई भावना के भरोसे नहीं छोड़ा जाता. इसे भी बाकी सीन्स की तरह तैयार और कोरियोग्राफ किया जाता है. “केमिस्ट्री ऐसी चीज है जिसे कलाकार एक-दूसरे पर भरोसा होने के बाद लेकर आते हैं.”
इसलिए शूट से पहले कलाकारों के साथ वर्कशॉप की जाती है. उन्हें बताया जाता है कि सीन किस तरह शूट होगा, कौन-सी सीमाएं होंगी और क्या चीजें नहीं की जाएंगी. कलाकारों की सहजता को समझा जाता है और जरूरत के मुताबिक सुरक्षात्मक चीजों का इंतजाम भी किया जाता है.
कई बार सीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर शूट किया जाता है. कैमरे का एंगल, क्लोज-अप और शरीर की पोजिशन पहले से तय हो सकती है. अगर कोई कलाकार किसी खास चीज के लिए सहज नहीं है तो दूसरे तरीके तलाशे जाते हैं- क्लोज-अप, अलग कैमरा एंगल या जरूरत पड़ने पर बॉडी डबल तक का इस्तेमाल किया जा सकता है.
एक 14 साल की बच्ची और 45 साल के एक्टर वाला सीन
इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की जरूरत समझने के पीछे कुछ ऐसे अनुभव भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है. फिल्म मेकर साक्षी भाटिया कुछ साल पहले एक बॉलीवुड मर्डर मिस्ट्री की असिस्टेंट डायरेक्टर थीं. फिल्म में एक आरोपी और पीड़ित के बीच इंटीमेट सीन फिल्माया जाना था. समस्या यह थी कि पीड़ित का किरदार निभाने वाली लड़की सिर्फ 14 साल की थी, जबकि आरोपी का किरदार 45 साल के एक पुरुष कलाकार ने निभाया था.
साक्षी ने बताया कि इस स्थिति ने उन्हें असहज कर दिया था. उन्हें यह चिंता हुई कि क्या उस नाबालिग कलाकार को ठीक से समझाया गया था कि सीन किस तरह शूट होगा और उसके दौरान उसकी सीमाओं का किस तरह ख्याल रखा जाएगा.
‘पायलट’ नहीं, बल्कि सुरक्षा की पूरी किट होती है
आस्था खन्ना अपने साथ एक खास किट भी रखती हैं, जिसमें इंटीमेट सीन्स की शूटिंग के दौरान काम आने वाली चीजें होती हैं. इसमें मॉडेस्टी गारमेंट्स और बैरियर्स शामिल हैं. शरीर के संवेदनशील हिस्सों के बीच संपर्क रोकने के लिए अलग-अलग तरह के प्रोटेक्टिव उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं. कुछ मामलों में क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाले एल-गार्ड, सिलिकॉन फिलर वाले प्रोटेक्टिव वियर, फोम बैरियर और बॉडी टेप जैसी चीजें भी काम आती हैं.
यहां तक कि आधी फुली हुई पिलाटे्स बॉल्स का इस्तेमाल भी दो कलाकारों के शरीर के बीच एक तरह का एयर पॉकेट बनाने के लिए किया जा सकता है. मकसद साफ है- सीन पर्दे पर जितना वास्तविक लगे, शूटिंग के दौरान कलाकारों के शरीर के बीच वास्तविक शारीरिक संपर्क उतना ही नियंत्रित रहे.
उनकी किट में नेल फाइल, टैम्पोन, रेजर, माउथ फ्रेशनर, पैंटी लाइनर, अल्कोहल प्रेप पैड और बॉडी टेप जैसी चीजें भी होती हैं. सुनने में ये छोटी-छोटी चीजें लग सकती हैं, लेकिन सेट पर कलाकार की सुरक्षा और सहजता के लिए इनका महत्व काफी बड़ा हो सकता है.
हर कलाकार की अपनी सीमा होती है. कोई कलाकार किसी सीन के लिए निर्देशक की उम्मीद से ज्यादा सहज हो सकता है, तो कोई उतना सहज नहीं होता. ऐसे में सीन को बदलना जरूरी नहीं कि फिल्म की कहानी या निर्देशक की सोच को खत्म कर दे. क्लोज-अप, कैमरा एंगल, बॉडी डबल या शूटिंग की तकनीक के जरिए वही भावना दिखाई जा सकती है.
यहां एक अहम बात समझने वाली है- अच्छी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री का मतलब यह नहीं कि कलाकारों ने अपनी निजी सीमाएं भुला दी हैं. कई बार बेहतरीन केमिस्ट्री का आधार ही भरोसा और सुरक्षित माहौल होता है.
दुनियाभर में इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर्स की जरूरत की चर्चा #MeToo आंदोलन के बाद तेज हुई. ऐसे कई चर्चित मामले सामने आए हैं जहां निर्देशक के ‘कट’ बोलने के बाद भी किसी एक्टर ने हीरोइन को किस करना या अनुचित तरीके से छूना जारी रखा. उनके मुताबिक, यह सिर्फ एक असहज स्थिति नहीं बल्कि वर्कप्लेस हैरेसमेंट का मामला हो सकता है और ऐसे समय में इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की भूमिका बेहद अहम हो जाती है.
लेकिन सवाल अभी भी बाकी है- क्या हर सेट पर ये संभव है?
इंटीमेसी को-ऑर्डिनेशन भारत में अभी शुरुआती दौर में है. इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि इससे फिल्म का बजट बढ़ता है और इंडस्ट्री के बहुत बड़े हिस्से में अभी यह सामान्य प्रक्रिया नहीं बनी है. एक दशक तक भारतीय फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर चुकीं अमित कौर का कहना है कि भारत में इंटीमेसी को-ऑर्डिनेशन अभी भी काफी हद तक विदेशी कॉन्सेप्ट माना जाता है और कलाकारों से उम्मीद की जाती है कि वे खुद ही इन परिस्थितियों से निपटना सीखें.
आस्था खन्ना भी मानती हैं कि इस दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है. वह इंटीमेसी प्रोफेशनल्स का एक कलेक्टिव बनाने और फिल्म निर्माताओं के लिए गाइडलाइंस तैयार करने पर काम कर रही हैं. लेकिन यहां एक और पेचीदा सवाल है. अगर इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की सैलरी प्रोडक्शन हाउस दे रहा है तो क्या वह निर्देशक के फैसले के खिलाफ उतनी मजबूती से आवाज उठा पाएगा? क्या हर प्रोडक्शन हाउस कलाकार की सहमति को उतनी ही गंभीरता से लेगा?
यही वजह है कि सिर्फ किसी सेट पर एक इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर की मौजूदगी काफी नहीं है. जरूरी है कि उनकी भूमिका, अधिकार और जिम्मेदारियां भी साफ हों.
आखिर में बात सिर्फ ‘वो वाला सीन’ की नहीं है
हम दर्शक पर्दे पर दो लोगों को करीब आते देखते हैं और कई बार उसे उनकी असली जिंदगी से जोड़ देते हैं. लेकिन कैमरे के पीछे कहानी बिल्कुल अलग होती है. वहां कैमरा होता है, दर्जनों लोग मौजूद होते हैं, रोशनी होती है, निर्देशक होता है, तकनीकी टीम होती है और कलाकारों को अपने बेहद निजी स्पेस को कैमरे के सामने निभाना होता है. ऐसे में उस सीन को ‘रियल’ दिखाने से ज्यादा जरूरी है कि उसे सम्मानजनक, सुरक्षित और सहमति के साथ शूट किया जाए.
इंटीमेसी को-ऑर्डिनेटर का असल काम शायद यही है- दर्शक को पर्दे पर कहानी की सच्चाई महसूस हो, लेकिन उस सच्चाई को पैदा करने के लिए कलाकारों की वास्तविक सीमाओं की कीमत न चुकानी पड़े. क्योंकि आखिर में इंटीमेट सीन भी अभिनय का हिस्सा है. असली चीज वह सीन नहीं, बल्कि कलाकार की सहमति और उसका सुरक्षित रहना है.
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