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तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके फिल्मकार मनीष सैनी ने जैकी श्रॉफ अभिनीत 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो' से हिंदी सिनेमा में कदम रखा है। फिल्म ओटीटी पर रिलीज हो चुकी है। हाल ही में अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में मनीष ने बच्चों के लिए सिनेमा बनाने के अनुभव, बड़े कलाकारों की सोच, थिएटर की मुश्किल और फिल्मों की पहुंच को लेकर खुलकर बात की।
‘बच्चों की फिल्म में बड़े कलाकार को साइड कास्ट होने का डर रहता है’ मनीष कहते हैं, 'बहुत सारे एक्टर हैं जो बच्चों के साथ काम नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि सेट पर बच्चों को संभालना पड़ेगा। उनसे काम कैसे निकलवाएंगे? टाइम वेस्ट होगा। बहुत कम ऐसे एक्टर हैं, जिन्हें लगता है कि ये मेरी फिल्म है। ये बच्चों की फिल्म है। इसमें मैं हूं तो कहीं मैं साइड कास्ट न हो जाऊं। फिल्म तो बच्चों की ही रहेगी।' अपने अनुभव का उदाहरण देते हुए मनीष बताते हैं, 'मेरी एक फिल्म Dhh थी, जो गुजराती फैमिली ड्रामा थी। उसमें नसीरुद्दीन शाह साहब ने काम किया था। उनका सिर्फ दो दिन का शूट था, लेकिन फिल्म का कॉन्सेप्ट उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने तुरंत हां कह दी। हालांकि, यकीन मानिए, ऐसा बहुत कम होता है कि कोई बड़ा एक्टर इतनी जल्दी किसी फिल्म के लिए तैयार हो जाए। मेरी दूसरी फिल्म Gandhi & Co. के लिए मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।'
'जैकी श्रॉफ को पहले दिन ही क्लियर था कि फिल्म बच्चों के पास जाएगी' जैकी श्रॉफ के साथ काम करने को लेकर मनीष कहते हैं, 'मैंने उन्हें पहली बार फोन पर कहा कि मैं बच्चों के लिए कुछ करना चाहता हूं, बच्चों की कहानी। तो उन्होंने बोला- तुम आ जाओ। मुझे अच्छा लगा कि तुम बच्चों के लिए कुछ कर रहे हो। वो हमेशा पॉजिटिव रहते हैं। आप कोई प्रॉब्लम लेकर जाओगे तो बोलेंगे- हां ठीक है, प्रॉब्लम समझ में आ गई, इसका सॉल्यूशन क्या है। प्रॉब्लम तो आती है, सॉल्यूशन पर काम करता हूं। बच्चों के साथ भी यही था। उनको पहले दिन ही क्लियर था कि ये फिल्म बच्चों के पास जाएगी और मुझे करना है।'
'तारे जमीन पर को आमिर खान का सपोर्ट मिला, इसलिए लोगों तक पहुंची' बच्चों की फिल्मों को बड़े सितारों के सपोर्ट की जरूरत पर मनीष कहते हैं, 'ऐसी फिल्मों को सपोर्ट सिस्टम चाहिए। तारे जमीन पर का रिलीज अच्छा था। वो लोगों तक इसलिए पहुंच पाई, क्योंकि आमिर खान जी उससे जुड़े हुए थे। मैंने खुद तीन फिल्में बनाई हैं। मेरी पहली दो फिल्मों को नेशनल अवॉर्ड मिला है। वो भी बच्चों पर आधारित थीं। लेकिन हर बार मुझे वही स्ट्रगल फेस करना पड़ता है।'
'बच्चों की फिल्म है? बच्चे कैसे आएंगे थिएटर में?' मनीष के मुताबिक बच्चों की फिल्म बनाना ही चुनौती नहीं है, उसे थिएटर तक पहुंचाना भी मुश्किल है। वह कहते हैं, 'ऐसी फिल्में और ऐसा जॉनर बहुत पॉपुलर नहीं माना जाता। आजकल एक बड़ी फिल्म आती है। उसमें बड़े स्टार्स होते हैं, बड़ा वीएफएक्स, बड़ा सेटअप और बड़ा बजट होता है। फिर उसकी रिलीज भी उतनी ही बड़ी होती है। बच्चों की फिल्म इंडिपेंडेंट फिल्म की कैटेगरी में आती है। ऊपर से बच्चों का जॉनर वैसे ही कम काउंट किया जाता है। आप देखिए, बच्चों पर केंद्रित कितनी फिल्में बनती हैं? बहुत कम। साल में दो-तीन या चार-पांच फिल्में याद रह जाएं तो बहुत बड़ी बात है।' थिएटर की मुश्किल पर वह कहते हैं, 'जब आप एग्जीबिटर या डिस्ट्रीब्यूटर से बात करते हैं तो वो पूछते हैं- अच्छा बच्चों की फिल्म है, बच्चे कैसे आएंगे थिएटर में? हमारी धारणा हो गई है कि बच्चे अपने आप थिएटर नहीं आएंगे। वो पैरेंट्स या स्कूल पर डिपेंडेंट हैं। स्कूल उनको क्या लेकर आएगा? हमें स्कूल को मोटिवेट करना है। इसके लिए सपोर्ट सिस्टम चाहिए।'
'ओटीटी पर आने की खुशी है, कम से कम फिल्म ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी' मनीष अपनी फिल्म के ओटीटी रिलीज को लेकर खुश हैं। वह कहते हैं, 'इस फिल्म को ओटीटी पर रिलीज करने की मुझे खुशी है। कम से कम फिल्म ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। थिएटर में अगर फिल्म को ज्यादा शोज नहीं मिलते तो उसका पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ओटीटी पर बच्चे और उनके पैरेंट्स अपनी सुविधा से इसे देख सकते हैं।'
'नंबर नहीं, ऐसी फिल्म चाहिए जो लंबे समय तक याद रहे' फिल्मों की सफलता को सिर्फ कमाई से देखने के तरीके पर मनीष कहते हैं, 'हिंसा का दौर है। अभी सब खून-खराबा चल रहा है। ये फिल्म बच्चों को परोस दी जाती है। आजकल ज्यादातर लोग नंबर में भरोसा करते हैं। इतना पहले दिन का, इतना करोड़ का, इतना वीकेंड का। इसमें हम एक चीज भूल रहे हैं कि फिल्म लंबे समय तक चले।' वह आगे कहते हैं, 'एक फिल्म ज्यादा शोज में चली और एक फिल्म ज्यादा समय तक चली, दोनों अलग चीजें हैं। मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जो हमेशा के लिए रहें, जिन्हें लोग बार-बार देखें। आप मिस्टर इंडिया और तारे जमीन पर को देखिए। ये फिल्में आज भी याद हैं। कई बार कोई फिल्म दो हफ्ते में 300 करोड़ कर लेती है, लेकिन उसके बाद हमें याद भी नहीं रहता कि वो फिल्म देखी थी। फिल्म आई और चली गई। मेरे लिए सिर्फ नंबर मायने नहीं रखते, फिल्म का लंबे समय तक लोगों के साथ रहना ज्यादा जरूरी है।'
'बच्चों के नाम पर चॉकलेट और चिप्स बेच रहे, लेकिन उनके लिए सिनेमा नहीं' बच्चों के लिए सिनेमा की कमी पर मनीष कहते हैं, 'ये तो सच है कि बच्चों का कंटेंट नहीं बनता। ये इतना बड़ा गैप है कि इंडस्ट्री को मिलकर कुछ करना चाहिए। बच्चों के नाम पर चॉकलेट और चिप्स बेच रहे हैं, लेकिन उनके लिए सिनेमा नहीं है।'
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