भारतीय शेयर बाजार की चाल चाहे जैसी भी हो, आईपीओ की रफ्तार कम नहीं हो रही है। 26 अगस्त 2026 तक कंपनियों ने लगभग 22,400 करोड़ रुपये जुटाए हैं। उम्मीद है कि 30 सितंबर से पहले और भी कई आईपीओ बाजार में आ सकते हैं, क्योंकि कई कंपनियों को सेबी (SEBI) से मिली मंजूरी की एक साल की वैलिडीटी इसी दिन एक्सपायर हो रही है।
चूंकि आईपीओ लाने वाली कंपनियों का शेयर बाजार में कोई पुराना रिकॉर्ड या ट्रेडिंग इतिहास नहीं होता, इसलिए निवेशकों को लिस्टिंग से पहले दी गई जानकारी पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में 'रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस' (RHP) सबसे अहम डॉक्यूमेंट्स में से एक है। इसके कुछ खास हिस्सों को गौर से देखकर निवेशक कंपनी की कमजोरियां, उसकी वित्तीय सेहत और उसके मांगे जा रहे मूल्यांकन की सही-गलत का पता लगा सकते हैं।
इस साल लिस्टिंग के दिन गिरने वाले शेयरों की संख्या अधिक रही। 2026 में (26 अगस्त तक) लिस्टिंग वाले दिन अपने इश्यू प्राइस से कम बंद होने वाले आईपीओ का अनुपात बढ़कर 37% हो गया है, जबकि 2025 में यह 33% था। इसके अलावा, 2022 के बाद से लिस्ट हुई करीब लगभग 40% कंपनियां 26 अगस्त 2026 तक अपने आईपीओ प्राइस से नीचे चल रही थीं।
निवेशकों को शुरुआत में तीन मुख्य पैरामीटर, ग्रोथ, प्रॉफिटेबिलिटी और वैल्युएशन पर ध्यान देना चाहिए। हो सकता है कि कोई कंपनी तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन अगर उसकी प्रॉफिटेबिलिटी कमजोर है या आईपीओ का वैल्युएशन बहुत अधिक यानी महंगा है, तो वह निवेश के लिए आकर्षक नहीं होगी।
फाइनेंशियल स्टेटमेंट में कई अहम संकेत छिपे होते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर कंपनी बही-खाते मुनाफा तो दिखा रही है, लेकिन लगातार उसका कैश फ्लो निगेटिव है, तो ऐसी कंपनी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह इस बात का संकेत है कि दिखाया गया मुनाफा असल में कैश में नहीं बदल रहा है।
आरएचपी (RHP) का 'निर्गम के उद्देश्य' वाला भाग बताता है कि आईपीओ से जुटाया गया पैसा किस काम आएगा। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि क्या यह पैसा कंपनी के विस्तार, कर्ज घटाने या कारोबारी जरूरतों जैसे उत्पादक कार्यों में लगेगा।
अगर यह पैसा अधिकतर मौजूदा शेयरधारकों (प्रमोटरों) को अपनी हिस्सेदारी बेचने के काम आ रहा है, तो निवेशकों को इसकी वजह को ध्यान से समझना चाहिए। चिंता की बात यह है कि अगर बहुत कम नई पूंजी कंपनी के कारोबार में पहुंचती है, तो इसका फायदा सीमित हो सकता है।
आईपीओ में पैसा लगाने से पहले के महीनों में कंपनी के शेयरों की खरीद-बिक्री किस कीमत पर हुई है। उदाहरण के लिए, अगर किसी निवेशक ने आईपीओ से छह महीने पहले एक निश्चित दाम पर शेयर खरीदे थे और अब आईपीओ उस दाम का दोगुना है, तो निवेशकों को सवाल करना चाहिए कि क्या कंपनी की स्थिति में इतना बड़ा सुधार हुआ है कि यह तेज बढ़ोतरी जायज है। साथ ही, आईपीओ से ठीक पहले हुई किसी भी फंडिंग को भी देखना चाहिए जैसे कि उसका मूल्यांकन, निवेशक कौन थे, और उस लेन-देन के पीछे क्या परिस्थितियां थीं।
प्रमोटरों और वरिष्ठ प्रबंधन के सैलरी या Compensation की तुलना उद्योग के औसत मानकों से करनी चाहिए। अत्यधिक ज्यादा कंपनेशेसन चिंता का विषय हो सकता है, खासकर अगर यह कंपनी के आकार या उसके वित्तीय प्रदर्शन के हिसाब से बहुत कम लगता है। निवेशकों को सिर्फ कर्ज का स्पष्ट आंकड़ा ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि आकस्मिक देनदारियों को भी परखना चाहिए।
ये संभावित देनदारियां बैलेंस शीट पर आम कर्ज की तरह नजर नहीं आतीं, लेकिन बाद में इनसे बड़ा भुगतान करना पड़ सकता है। आरएचपी (RHP) का रिस्क फैक्टर वाला हिस्सा ऐसी जानकारियां देता है, जैसे दूसरों के लिए दी गई गारंटी, विवादित टैक्स मांग, चल रहे कानूनी मामले और बिल डिस्काउंट, जिनका भुगतान भविष्य में होना है।
निवेशकों को कंपनी द्वारा बार-बार नए शेयर जारी करने और वर्किंग कैपिटल पर दबाव के संकेतों पर नजर रखनी चाहिए। बार-बार हिस्सेदारी का कमजोर पड़ना या कारोबारी पूंजी पर लगातार दबाव वित्तीय कमजोरियों की ओर इशारा कर सकता है, जो सिर्फ रेवेन्यू और मुनाफे के बड़े आंकड़ों को देखकर तुरंत समझ में नहीं आती हैं।
इनपुट: लाइव मिंट
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