खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत चंद्रयान के जरिए चांद और मंगलयान के जरिए मंगल तक पहुंच चुका है। गगनयान की तैयारी हो रही है और देश की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा लगातार आगे बढ़ रही है। लेकिन इसी दौर में भारतीय सिनेमा की स्पेस उड़ान उतनी तेज क्यों नहीं? जानिए इसकी वजह ऐसे फिल्मकार के नजरिए से जो इस तरह की फिल्मों पर काम कर चुके हैं।
लेखक विज्ञान आधारित कहानियों से बचते हैं: जगन शक्ति ‘मिशन मंगल’ के निर्देशक जगन शक्ति ने फिल्म बनाने से पहले करीब छह महीने रिसर्च की थी। वैज्ञानिकों से बातचीत के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि असली चुनौती अंतरिक्ष की तकनीकी भाषा को समझना नहीं, बल्कि उसे दर्शकों के लिए कहानी में बदलना है। वह बताते हैं, ‘वैज्ञानिक मुझे डायोड, ट्रायोड और बहुत सारी तकनीकी बातें समझा रहे थे। लगा कि यह सब फिल्म में डाल दिया तो कहानी कम और विज्ञान की किताब ज्यादा लगेगी। फिर मैंने एक ऑटो वाले को दूसरे ऑटो वाले की मदद करते देखा। वहीं लगा कि रॉकेट की कहानी भी इतनी ही आसान होनी चाहिए। विज्ञान को आसानी से बताना मुश्किल है और शायद इसी वजह से लेखक साइंस-बेस्ड कहानियों को छूने से बचते हैं।’
‘कार्गो’ के बाद तीन साल तक कोशिश करती रहीं: आरती कड़व विक्रांत मैसी स्टारर ‘कार्गो’ से स्पेस को एक बिल्कुल अलग, इंडिपेंडेंट और दार्शनिक नजरिए से देखने वाली आरती कड़व ने एक फिल्म के बाद भी इस जॉनर को नहीं छोड़ा। वह बताती हैं, ‘कार्गो’ एक इंडिपेंडेंट फिल्म थी और पूरी फिल्म बनाना ही अपने आप में एक चुनौती था। इस फिल्म के बाद मैंने करीब तीन साल तक एक और स्पेस फिल्म बनाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं बन पाई।’
यह डर छोड़ना होगा कि दर्शक नहीं समझेगा: संजय पूरन फिल्ममेकर संजय पूरन सिंह चौहान ने ‘चंदा मामा दूर के’ के जरिए भारत की बड़ी स्पेस फिल्म बनाने का सपना देखा था। फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत अंतरिक्ष यात्री बनने वाले थे और इसके लिए उन्होंने अमेरिका में ट्रेनिंग भी ली थी। फिल्म आगे नहीं बन सकी, लेकिन संजय कहते हैं, ‘हम मान लेते हैं कि दर्शक फिजिक्स और विज्ञान की जटिल बातें नहीं समझ सकेगा। लेकिन लोग क्रिस्टोफर नोलन की फिल्में देखते हैं और असली विज्ञान समझने की कोशिश करते हैं। अब समय आ गया है कि हम भारतीय दर्शकों को कम आंकना बंद करें।’
भारतीय सिनेमा की स्पेस उड़ान धीमी क्यों है? कुल मिलाकर शायद जवाब सिर्फ बजट, वीएफएक्स या दर्शक नहीं है। भारत के पास स्पेस की कहानियां और उपलब्धियां हैं, वहीं हमारा दर्शक भी दुनिया भर का सिनेमा देख रहा है। कमी शायद उस जोखिम को लेने की है, जो विज्ञान, मजबूत कहानी और दर्शक पर भरोसे के साथ जरूरी है। ‘मिशन मंगल’, ‘रॉकेट्री’, ‘रॉकेट बॉयज’ और ‘कार्गो’ ने अलग-अलग रास्ते दिखाए हैं। इनसे साफ है कि स्पेस सिनेमा के लिए हमेशा बड़ा बजट नहीं, बल्कि अच्छी रिसर्च, वैज्ञानिकों का साथ, मजबूत लेखन और दर्शकों पर भरोसा जरूरी है। भारत की अंतरिक्ष यात्रा जारी है। शायद अब भारतीय स्पेस सिनेमा की असली उड़ान की बारी है।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!