रूस और भारत के बीच एनर्जी बिजनेस में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है। यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस की ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित होने के बीच अगस्त 2026 में रूस के ऑयल प्रोडक्ट आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 70% तक पहुंच गई। यूरोपीय थिंक टैंक CREA (Centre for Research on Energy and Clean Air) के अनुसार, भारत ने अगस्त में रूस को करीब 1.20 लाख टन पेट्रोल सप्लाई किया, जिसकी कीमत लगभग 7.8 करोड़ यूरो रही। इस तरह जहां लंबे समय से भारत रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता रहा है, वहीं अब रूस को भारत से रिफाइंड फ्यूल भी बड़ी मात्रा में लेना पड़ रहा है।
CREA के मुताबिक अगस्त में रूस ने कुल करीब 1.72 लाख टन ऑयल प्रोडक्ट आयात किए, जिनकी कीमत लगभग 11.4 करोड़ यूरो रही। इसमें भारत की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा थी। रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने घरेलू स्तर पर ईंधन उत्पादन में आई परेशानी के कारण विदेशों में रिफाइन किए गए पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बढ़ाया। खास बात यह है कि भारत से भेजे गए पूरे कार्गो को गुजरात के वाडिनार रिफाइनरी से लोड किया गया था। इस रिफाइनरी का संचालन नायरा एनर्जी करती है, जिसमें रूस की सरकारी तेल कंपनी Rosneft की करीब 49% हिस्सेदारी है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वाडिनार रिफाइनरी ने 2026 के पहले 8 महीनों में अपनी जरूरत का पूरा कच्चा तेल रूस से हासिल किया। ऐसे में एक दिलचस्प स्थिति बनती है, जहां रूस का कच्चा तेल भारत पहुंचता है, यहां रिफाइन होकर ईंधन बनता है और फिर वही ईंधन रूस वापस भेजा जाता है। रूस की घरेलू रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव बढ़ने के कारण इस तरह के कारोबार को बढ़ावा मिला है।
दूसरी ओर अगस्त में भारत की ओर से रूस से कच्चे तेल की खरीद में भी कमी आई। भारत का रूसी तेल आयात जुलाई के रिकॉर्ड स्तर से करीब 25% घटकर 4.1 अरब यूरो रह गया। इसके बावजूद भारत रूस के जीवाश्म ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा। चीन करीब 8.4 अरब यूरो के आयात के साथ पहले स्थान पर रहा। अगस्त में भारत की रूस से कुल हाइड्रोकार्बन खरीद करीब 4.8 अरब यूरो रही, जिसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा थी।
रूसी Urals क्रूड की औसत कीमत भी अगस्त में बढ़कर करीब 69.9 डॉलर प्रति बैरल हो गई, जो जुलाई के मुकाबले लगभग 23% ज्यादा थी। वहीं, ब्रेंट (Brent) के मुकाबले यूराल (Urals) क्रूड का डिस्काउंट करीब 22 डॉलर प्रति बैरल बना रहा। CREA का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं ने रूस के तेल और गैस निर्यात से होने वाली कमाई को भी बढ़ाया है। ऐसे में भारत-रूस ऊर्जा कारोबार अब सिर्फ कच्चे तेल की खरीद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि रिफाइंड ईंधन की सप्लाई भी दोनों देशों के बीच व्यापार का अहम हिस्सा बनती जा रही है।
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