इमेज स्रोत, Getty Images
इराक़ में मौजूद बचे हुए अमेरिकी सैनिक 30 सितंबर तक वापस लौट रहे हैं. इसके साथ ही वहां अमेरिका की दो दशक से ज़्यादा पुरानी सैन्य मौजूदगी ख़त्म हो जाएगी. इस मौजूदगी ने लंबे समय तक इराक़ पर गहरा असर डाला है.
इसकी शुरुआत 2003 में इराक़ पर अमेरिका के हमले से हुई थी, जिसमें सद्दाम हुसैन की सरकार गिरा दी गई थी. इसके बाद देश ने कई साल तक विद्रोह और अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच हिंसा का सामना किया.
अमेरिकी सैनिक 2011 में इराक़ से चले गए थे, लेकिन इस्लामिक स्टेट समूह यानी आईएस को हराने में मदद करने के लिए 2014 में लौट आए.
अमेरिकी सैनिकों की यह वापसी ऐसे समय हो रही है, जब ईरान के साथ जारी तनाव ने इराक़ में मौजूद अमेरिकी कर्मचारियों और सैनिकों को एक बार फिर हमलों के ख़तरे में डाल दिया है.
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सैनिकों के जाने के साथ इराक़ में अमेरिका का प्रभाव ख़त्म नहीं होगा.
इमेज स्रोत, AFP
आधिकारिक तौर पर अमेरिकी सैनिकों की यह वापसी 2024 में वॉशिंगटन और बग़दाद के बीच हुए समझौते के तहत हो रही है.
इस समझौते में 'ऑपरेशन इनहेरेंट रिज़ॉल्व' को ख़त्म करने पर सहमति बनी थी. यह आईएस के ख़िलाफ़ अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन का अभियान था. अमेरिका में आईएस को आईएसआईएस भी कहा जाता है.
2007 में इराक़ युद्ध जब अपने चरम पर था, तब देश में 1 लाख 70 हज़ार से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे.
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक़, सैनिकों की वापसी का समझौता होने से पहले दिसंबर 2023 तक यह संख्या घटकर क़रीब 2,400 रह गई थी.
इसके बाद से अमेरिकी सेना ने इराक़ में अपनी मौजूदगी लगातार कम की है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, अब कुर्दिस्तान क्षेत्र में केवल थोड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक बचे हैं.
वॉशिंगटन के अटलांटिक काउंसिल में इराक़ इनिशिएटिव के नॉन-रेज़िडेंट सीनियर फ़ेलो सफ़वान अल-अमीन कहते हैं, "अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर इराक़ की पिछली सरकार के समय सहमति बनी थी, क्योंकि इराक़ में आईएसआईएस को हराने का अभियान अपना लक्ष्य हासिल कर चुका था."
इस फ़ैसले के पीछे इराक़ में लंबे समय से बना राजनीतिक दबाव भी है.
डगलस सिलिमन 2016 से 2019 तक इराक़ में अमेरिका के राजदूत रहे थे. उनका कहना है कि इराक़ की एक के बाद एक सरकार पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी ख़त्म करने का दबाव रहा है. बहुत से लोग इसे इराक़ की संप्रभुता में दख़ल मानते हैं.
अब वॉशिंगटन के अरब गल्फ़ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष सिलिमन ने बीबीसी से कहा, "ईरान समर्थक गुटों और शिया समुदाय के कुछ हिस्सों के दबाव में इराक़ की कुछ सरकारें यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती रही हैं कि अमेरिकी सैनिक देश से चले जाएं."
राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिकी सैनिक 2011 में इराक़ से चले गए थे. लेकिन तीन साल बाद बग़दाद के अनुरोध पर वे वापस लौट आए, क्योंकि आईएस ने देश के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
इसके बाद अमेरिकी सैनिकों की भूमिका भी बदल गई. सीधे लड़ाई में हिस्सा लेने के बजाय वे इराक़ी सैनिकों को ट्रेनिंग और सलाह देने तथा ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने लगे.
इमेज स्रोत, AFP via Getty Images
हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि इस महीने हो रही वापसी की वजह केवल आईएस विरोधी अभियान का आधिकारिक रूप से ख़त्म होना नहीं है. इसके पीछे सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी उतनी ही अहम हैं.
ब्रिटेन के थिंक टैंक आरयूएसआई के सीनियर एसोसिएट फ़ेलो एचए हेलियर कहते हैं, "यह आईएसआईएस का नहीं, बल्कि ख़तरे का मामला है. आईएसआईएस वाला तर्क कई साल पहले ही ख़त्म हो चुका था."
हेलियर ने ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव के बीच उत्तरी इराक़ में अमेरिकी ठिकानों पर हाल में हुए हमलों का ज़िक्र किया.
उनका कहना है कि अमेरिका को लगने लगा था कि वहां बचे उसके सैनिक और कर्मचारी आसानी से हमलों का निशाना बन सकते हैं.
अल-अमीन भी इससे सहमत हैं. उनके मुताबिक़, अमेरिका और इराक़ के अधिकारी पहले इस बात पर चर्चा कर चुके थे कि गठबंधन का अभियान ख़त्म होने के बाद भी थोड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिकों को इराक़ में रखा जाए.
वे कहते हैं, "सैनिकों की कम संख्या और ताक़त दिखाने की उनकी सीमित क्षमता को देखते हुए ईरान युद्ध ने यह साफ़ कर दिया कि उनकी मौजूदगी फ़ायदे से ज़्यादा कमज़ोरी बन गई थी."
इमेज स्रोत, Universal History Archive/Universal Images Group via Getty Images
इराक़ पर अमेरिकी हमले के दो दशक से ज़्यादा समय बाद भी वहां अमेरिका की सैन्य विरासत को लेकर राय बंटी हुई है.
अल-अमीन इसे "अच्छे और बुरे नतीजों का मिला-जुला रूप" बताते हैं.
वे कहते हैं, "अमेरिकी हमला अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया. सत्ता परिवर्तन से भी इराक़ के लोगों की एक स्थिर और ख़ुशहाल देश की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं."
उनका कहना है कि इससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हुआ और ईरान को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिला.
सिलिमन भी मानते हैं कि सत्ता परिवर्तन का यह दौर उथल-पुथल भरा रहा है. लेकिन उनका कहना है कि बीते वर्षों में कई इराक़ी लोगों ने उनसे कहा कि वे सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाए जाने के बाद आए राजनीतिक बदलाव को अहम मानते हैं.
सिलिमन के मुताबिक़, यह विचार अब जड़ें जमा चुका है कि "इराक़ में प्रतिनिधि लोकतंत्र के ज़रिए शासन होना चाहिए."
हालांकि, वे कहते हैं, "जिस आबादी को पहले वास्तव में लोकतंत्र का अनुभव नहीं रहा हो, उसमें लोकतांत्रिक परंपराओं को मज़बूती से स्थापित करने में समय लगेगा."
वॉशिंगटन की अमेरिकन यूनिवर्सिटी में ग्लोबल कुर्दिश इनिशिएटिव फ़ॉर पीस के निदेशक येरेवान सईद भी इस बदलाव को सकारात्मक मानते हैं.
वे कहते हैं, "पिछली सरकार को हटाया जाना वास्तव में बहुत बड़ी बात थी."
उनका तर्क है कि आलोचना करने वाले लोग उस सरकार की क्रूरता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिसे सत्ता से हटाया गया था.
उनका मानना है कि भ्रष्टाचार अब भी जारी है, लेकिन 2003 से पहले के मुक़ाबले इराक़ में अब ज़्यादा राजनीतिक आज़ादी और अलग-अलग राजनीतिक विचारों के लिए जगह है. वे ख़ास तौर पर इराक़ी कुर्दिस्तान का उदाहरण देते हैं.
हेलियर इस विरासत को लोकतंत्र के आधार पर देखने से ही इनकार करते हैं.
वे कहते हैं, "लोगों को यह सवाल पूछना बंद कर देना चाहिए कि क्या अमेरिका ने लोकतंत्र बनाया. जवाब है नहीं और यह बात तय हो चुकी है."
उनके मुताबिक़, अमेरिका की विरासत का ज़्यादा बड़ा असर पूरे क्षेत्र पर पड़ा है.
वे कहते हैं, "सद्दाम को सत्ता से हटाने के बाद आख़िरकार ईरान से जुड़े नेटवर्क इराक़ी सरकार के भीतर अपनी जगह बनाने में सफल रहे. अमेरिका ने जिस ताक़त को हटाया था, वह ईरान के असर को संतुलित करती थी."
हालांकि, चारों विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि इराक़ अब भी उस स्थिर लोकतंत्र से काफ़ी दूर है, जिसकी कल्पना अमेरिकी नीति निर्माताओं ने 2003 में की थी.
उनका कहना है कि भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर फैला हुआ है और हथियारबंद गुट अब भी सरकार के साथ-साथ अपनी ताक़त का इस्तेमाल करते हैं.
इनमें ख़ास तौर पर इराक़ की पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन फ़ोर्सेज़ यानी पीएमएफ़ में शामिल कट्टरपंथी गुट हैं. पीएमएफ़ ज़्यादातर शिया लड़ाकों का नेटवर्क है, जिसे बग़दाद पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रहा है.
इमेज स्रोत, Gamma-Rapho via Getty Images
अल-अमीन सैनिकों की वापसी को इराक़ में अमेरिकी प्रभाव का अंत नहीं मानते.
वे कहते हैं, "अमेरिका के पास अब भी इराक़ पर काफ़ी प्रभाव है, क्योंकि इराक़ तेल की बिक्री के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर है. हथियार ख़रीदने के लिए भी वह अमेरिका पर निर्भर है. अपने पड़ोसी देशों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए इराक़ को अमेरिका के कूटनीतिक समर्थन की भी ज़रूरत है."
सईद का कहना है कि इस प्रभाव का एक हिस्सा इराक़ में अमेरिका की कूटनीतिक मौजूदगी से आता है.
वे कहते हैं, "बग़दाद में दुनिया का सबसे बड़ा अमेरिकी दूतावास है. अरबील में दुनिया का सबसे बड़ा अमेरिकी वाणिज्य दूतावास है."
उनका कहना है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद भी इन दोनों इमारतों की सुरक्षा जारी रखनी होगी.
सिलिमन का अनुमान है कि अमेरिका और इराक़ के बीच वह संबंध बना रहेगा, जिसे वे "बहुत गहरा सैन्य रिश्ता" कहते हैं.
इसके तहत इराक़ी सेना, आतंकवाद विरोधी सेवा और पेशमर्गा को ट्रेनिंग तथा योजनाएं बनाने में मदद मिलती रहेगी. पेशमर्गा इराक़ के अर्ध-स्वायत्त कुर्दिस्तान क्षेत्र की सैन्य शक्ति है.
हालांकि, सबसे बड़ी अनिश्चितता इराक़ में ईरान समर्थित लड़ाकू गुटों को लेकर है.
इराक़ के प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैदी शुरुआत में चाहते थे कि इन गुटों को भी 30 सितंबर तक पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में लाया जाए. लेकिन ख़बरों के मुताबिक़, इन गुटों ने 2027 के आख़िर तक का समय मांगा है.
विशेषज्ञों की राय इस पर बंटी हुई है कि यह समयसीमा भी कितनी व्यावहारिक है.
सईद कहते हैं, "यह होने वाला नहीं है."
वे इसकी वजह इराक़ की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में इन गुटों की गहरी पकड़, संसद में उनकी मौजूदगी और तेहरान से उनके संबंधों को बताते हैं.
लेकिन सिलिमन को इसमें एक सकारात्मक संभावना भी दिखाई देती है.
उनका कहना है कि जब अमेरिकी सैनिक मौजूद नहीं होंगे, तो ये गुट लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए एक अहम राजनीतिक मुद्दा खो सकते हैं. इससे बग़दाद को उन गुटों पर दबाव बनाने के लिए ज़्यादा जगह मिल सकती है, जो सरकारी नियंत्रण में आने से इनकार कर रहे हैं.
हालांकि, सिलिमन इससे जुड़े एक ज़्यादा गंभीर ख़तरे की चेतावनी भी देते हैं.
वे कहते हैं, "मैंने इराक़ के कई प्रधानमंत्रियों से बात की है. इनमें वे प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, जो मेरे राजदूत बनने से पहले पद पर थे. उन्हें चिंता है कि इससे इराक़ के भीतर संघर्ष या संभावित रूप से गृहयुद्ध भी हो सकता है."
इमेज स्रोत, Gamma-Rapho via Getty Images
सईद को आईएस के दोबारा उभरने का भी डर है. वे इसकी तुलना 2011 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बने हालात से करते हैं.
उनके मुताबिक़, अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद बग़दाद की शिया नेतृत्व वाली सरकार ने सुन्नी नेताओं को गिरफ़्तार करना और उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करना शुरू कर दिया था.
उनका कहना है कि इस कार्रवाई ने कई सुन्नियों को कट्टरपंथ की ओर धकेला और आईएस के उभार में मदद की.
सईद चेतावनी देते हैं कि सुन्नी समुदायों को एक बार फिर इस बात की चिंता है कि उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा. इसलिए कट्टरपंथ बढ़ने का ख़तरा काफ़ी गंभीर है.
सिलिमन इस मामले में ज़्यादा आशावादी हैं. उनका कहना है कि इराक़ के सुरक्षा बल एक दशक पहले के मुक़ाबले अब काफ़ी मज़बूत हैं और ऐसे किसी भी ख़तरे को रोकने के लिए बेहतर स्थिति में हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से पूरे क्षेत्र में इराक़ के भीतर अमेरिका और ईरान के बीच ताक़त के संतुलन को लेकर भी नए सवाल खड़े होते हैं.
चित्र: रईस हुसैन
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
शॉर्ट वीडियो का अंत
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!