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माओत्से तुंग की मौत के 50 साल: फिर भी जेन ज़ी में क्यों है उनका आकर्षण?

Ajay Tiwari
11 September 2026 0 25
माओत्से तुंग की मौत के 50 साल: फिर भी जेन ज़ी में क्यों है उनका आकर्षण?

इमेज स्रोत, Getty Images/BBC

"कई महान व्यक्ति हुए हैं, लेकिन शिक्षक केवल एक ही हैं."

चीन के कई युवा ऑनलाइन दिवंगत चीनी नेता माओत्से तुंग का ज़िक्र इसी तरह करते हैं. वे उन्हें "टीचर" यानी "शिक्षक" कहते हैं.

वीडियो प्लेटफ़ॉर्म बिलिबिली पर "माओत्से तुंग" या "टीचर" खोजने पर दर्जनों वीडियो मिल जाते हैं. इनमें फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों से ली गई माओ की झलकियों का संकलन होता है.

ये वीडियो माओ के जीवन के अलग-अलग दौर को दिखाते हैं.

इनमें उनका युवावस्था का समय, सैन्य कमांडर के रूप में उनकी भूमिका और शीत युद्ध के दौरान चीन, अमेरिका और सोवियत संघ के संबंधों का प्रबंधन करने वाले नेता के रूप में उनके दौर की घटनाएं शामिल हैं.

इनमें से कई वीडियो को लाखों बार देखा जा चुका है. इन पर हज़ारों टिप्पणियां भी आई हैं, जिनमें "महान व्यक्ति अमर रहें" जैसी प्रशंसा देखने को मिलती है.

बिलिबिली के ज़्यादातर यूजर्स युवा हैं. इसके लगभग 60 प्रतिशत यूजर्स की उम्र 18 से 24 वर्ष के बीच है.

माओ का निधन 9 सितंबर 1976 को हुआ, तो उनकी मृत्यु के 50 साल बाद माओ चीन की युवा संस्कृति में इतने प्रमुख रूप से फिर से क्यों उभर आए हैं?

20वीं सदी के चीन के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में माओत्से तुंग ने कम्युनिस्ट पार्टी और देश, दोनों का नेतृत्व किया.

उन्होंने 1949 में जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना से लेकर 1976 में अपनी मृत्यु तक शासन किया. उन्होंने चीन का नेतृत्व ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड और सांस्कृतिक क्रांति जैसे अभियानों के दौरान किया.

इन अभियानों ने देश की अर्थव्यवस्था और समाज को बदल दिया, लेकिन इसकी क़ीमत लाखों लोगों की मौत के रूप में चुकानी पड़ी.

आज उनके प्रति आकर्षण महसूस करने वालों में नानजिंग शहर के छात्र डोंग भी शामिल हैं. वे जल्द ही विश्वविद्यालय की पढ़ाई शुरू करने वाले हैं.

हाल ही में वे एक वीडियो देखकर भावुक हो गए.

उस वीडियो में दो युवा महिलाएं चांग्शा के ऑरेंज आइल में युवा माओ की विशाल प्रतिमा के सामने एक देशभक्ति गीत गा रही थीं.

इमेज स्रोत, Mytruestory Photography via Getty Images

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

डोंग ने बीबीसी से कहा, "उन्होंने इतना भावपूर्ण ढंग से गाया, और वह प्रतिमा इतनी ऊंची और युवावस्था की छवि वाली है कि उसे देखकर मैं अचानक काफ़ी भावुक हो गया,"

उनके कई सहपाठी ऐसे ऑनलाइन यूथ कम्युनिटी में भाग लेते हैं जो करेंट अफ़ेयर्स पर चर्चा करने से जुड़े हैं. इन्हें आम तौर पर "कीबोर्ड पॉलिटिक्स सर्कल" कहा जाता है.

इस ट्रेंड का एक और संकेत यह है कि साल 2019 में माओत्से का एक किताब संग्रह त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में सबसे ज़्यादा बार इश्यू कराई हुई किताब बन गया.

यह किताब "सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ माओ त्से तुंग" साल 2025 तक यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में सबसे ज़्यादा बार उधार ली गई किताब बनी रही.

ग़ौरतलब है कि आज के युवाओं की माओ में रुचि, उनके माता-पिता की पीढ़ी में प्रचलित सार्वजनिक धारणा से अलग है.

1981 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में तैयार एक प्रस्ताव को अपनाया था.

इस प्रस्ताव में माओ का ऐसा आधिकारिक आकलन पेश किया गया था, जिसमें उनकी उपलब्धियों और ग़लतियों, दोनों को संतुलित रूप से रखा गया था.

इसे अक्सर संक्षेप में "70 प्रतिशत उपलब्धियां और 30 प्रतिशत ग़लतियां" कहकर बताया जाता है.

चीन के कम्युनिस्ट नेता देंग शियाओपिंग और बाद में जियांग ज़ेमिन के दौर में रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक चौराहों और कक्षाओं से माओ के चित्र धीरे-धीरे ग़ायब होने लगे.

लोग माओ को एक देवता की बजाय एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में देखने लगे. उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में समझा जाने लगा, जिनकी अपनी सीमाएं थीं.

वहीं, देंग एक नए आर्थिक युग के प्रतीक बन गए. यह ऐसा कार्यक्रम था जिसका उद्देश्य देश में बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण करना और उसे दुनिया के लिए खोलना था.

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हालांकि आज माओ फिर से चीन के युवाओं के लिए प्रासंगिक हो गए हैं.

डोंग समेत कई युवा माओ को उनके नाम से कम ही पुकारते हैं और उन्हें "टीचर" कहकर संबोधित करते हैं.

इस संबोधन की एक विशेष पृष्ठभूमि है.

बताया जाता है कि 1970 में अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो के साथ एक मुलाक़ात के दौरान माओ ने कहा था कि उन्हें "चार महान" जैसे ख़िताब पसंद नहीं हैं.

सांस्कृतिक क्रांति के दौरान यह एक राजनीतिक नारा था, जिसमें उन्हें महान शिक्षक, नेता, कमांडर और पथप्रदर्शक के रूप में सराहा जाता था.

माओ ने कहा था. "अब केवल एक ही बचा है... शिक्षक. क्योंकि मैं हमेशा से एक शिक्षक रहा हूं."

डोंग और उसके सहपाठी माओ पर खुलकर और विस्तार से चर्चा करते हैं.

लेकिन जब बात चीन के मौजूदा नेता शी जिनपिंग की आती है, तो डोंग को लगता है कि "यह वास्तव में ऐसा विषय नहीं है जिस पर खुलकर चर्चा की जा सके."

मर्केटर इंस्टीट्यूट फ़ॉर चाइना स्टडीज़ के एक अध्ययन में पाया गया कि चीन के ऑनलाइन क्षेत्र में अब भी कुछ हद तक सार्वजनिक चर्चा की गुंज़ाइश है.

लेकिन जो विषय वास्तव में शीर्ष नेतृत्व से जुड़े होते हैं, उनसे अक्सर जानबूझकर बचा जाता है.

रिपोर्ट का तर्क है कि "चर्चा के लिए यह सीमित और नाज़ुक जगह" सेंसरशिप और आत्म-सेंसरशिप, दोनों का परिणाम है.

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, आज कुछ युवाओं के बीच माओ के प्रति बढ़ती दिलचस्पी सिर्फ़ अतीत के प्रति लगाव का परिणाम नहीं है.

यह धन असमानता और सामाजिक उन्नति के घटते अवसरों जैसी समस्याओं को लेकर उनकी सोच से भी जुड़ी हुई है.

लीडेन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर फ़्लोरियन श्नाइडर ने लंबे समय से चीनी युवाओं की राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन किया है. वह कहते हैं कि आज के युवा पहले की पीढ़ियों से बिल्कुल अलग परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं.

उनके माता-पिता ऐसे दौर में रहे, जब आर्थिक विकास से लगभग सभी लोगों के जीवन स्तर में सुधार होता दिखाई देता था.

जबकि आज कई युवाओं को लगता है कि देंग शियाओपिंग के सुधारों से जिस प्रगति का वादा किया गया था, उसमें वे पीछे छूट गए हैं.

चीन के के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में 16 से 24 वर्ष आयु वर्ग के ग़ैर-विद्यार्थी शहरी युवाओं में बेरोज़गारी दर 17.9 प्रतिशत तक पहुंच गई. यह तीन साल पहले सांख्यिकीय पद्धति में बदलाव के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है.

युवाओं की रोज़मर्रा की भाषा में कुछ नए शब्द भी शामिल हो गए हैं.

"996" का मतलब है सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, हफ़्ते में छह दिन काम करना.

कई युवा अब "लाई फ़्लैट" यानी निष्क्रिय रहने का विकल्प चुन रहे हैं.

वे "इनवोल्यूशन" की लगातार चलने वाली प्रतिस्पर्धा में फंसना नहीं चाहते, जिसमें व्यक्ति को सिर्फ़ वहीं बने रहने के लिए पहले से ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

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इस पृष्ठभूमि में, पूंजीवाद की माओ की आलोचनाएं कुछ युवाओं को प्रभावित करती हैं.

श्नाइडर कहते हैं कि कुछ युवा माओ के विचारों का इस्तेमाल उस असंतोष को व्यक्त करने के लिए करते हैं, जिसे वे "पूंजी का राज्य पर क़ब्ज़ा" मानते हैं. वहीं कुछ दूसरे लोग माओ की रचनाओं को जीवन के विरोधाभासों को समझने और उनसे निपटने की एक मार्गदर्शिका के रूप में देखते हैं.

डोंग भी कुछ ऐसा ही सोचता है.

वह कहता है. "हमारी पीढ़ी को बचपन से सिखाया गया था कि कड़ी मेहनत का फल मिलेगा. लेकिन जब हम वास्तव में बड़े हुए तो पता चला कि नौकरी पाना इतना आसान नहीं है और घर ख़रीदना हमारी पहुंच से बाहर है."

वह आगे कहता है कि माओ की भाषा सीधी और स्पष्ट है. वह लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटती है.

"वह आपको साफ़-साफ़ बताते हैं कि उत्पीड़क कौन है और उत्पीड़ित कौन है. यह सरल ढांचा आर्थिक शब्दावली की तुलना में समझना ज़्यादा आसान है."

श्नाइडर कहते हैं. "माओ की वापसी सिर्फ़ पुरानी यादों का नतीजा नहीं है. यह युवाओं की उस कोशिश को दर्शाती है, जिसके ज़रिये वे अपने अनुभव की असमानता और असुरक्षा को समझने और उसे नाम देने के लिए इतिहास से मिली एक परिचित भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं."

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) का माओ के बारे में आधिकारिक आकलन अब भी 1981 के प्रस्ताव पर आधारित है. इसके अनुसार माओ की उपलब्धियां प्रमुख हैं, जबकि उनकी ग़लतियां द्वितीयक हैं.

2021 में अपनाए गए पार्टी के तीसरे ऐतिहासिक प्रस्ताव में "चीनी राष्ट्र के महान पुनर्जागरण" को उसकी विचारधारा के केंद्र में रखा गया है.

इस ढांचे के भीतर माओ की क्रांति को अक्सर उस चरण के रूप में समझा जाता है, जब चीन "खड़ा हुआ".

इसी दौर में जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना हुई, राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा की गई और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की बुनियाद रखी गई.

इसलिए माओ केवल एक ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, जिनकी उपलब्धियों और असफलताओं का आकलन किया जाना चाहिए.

उन्हें आज चीन की राष्ट्रीय शक्ति से जुड़ी धारणाओं के एक स्रोत के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है.

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श्नाइडर का मानना है कि "आज माओ की बढ़ती लोकप्रियता के लिए पार्टी की शैक्षिक नीतियां कम से कम आंशिक रूप से ज़िम्मेदार हैं. कई युवाओं के लिए माओ का चीन एक ऐसी कल्पना पर आधारित है, जिसमें यह महान नेता एक निर्विवाद नायक के रूप में दिखाई देता है."

उनका तर्क है कि कई युवा ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड और सांस्कृतिक क्रांति की विनाशकारी वास्तविकताओं से परिचित नहीं हैं. या फिर इन घटनाओं में माओ की भूमिका को लेकर उनकी समझ विकृत है.

श्नाइडर चेतावनी देते हैं कि माओ के प्रति यह जनस्तरीय प्रशंसा अपने भीतर कहीं ज़्यादा राजनीतिक ऊर्जा रखती है, जितनी पहली नज़र में दिखाई देती है.

वे कहते हैं. "यह संभावित रूप से विस्फोटक स्थिति है. क्योंकि नीचे से उभरी यह माओ समर्थक संस्कृति स्पष्ट रूप से जनवादी चरित्र रखती है. यह ज़रूरी नहीं कि केवल आज की शासन पद्धतियों पर सवाल उठाने तक ही सीमित रहे."

वे इसकी तुलना चीन में राष्ट्रवादी भावनाओं की अभिव्यक्तियों से करते हैं.

उनका कहना है. "ऐसी जनवादी भावनाओं पर कुछ हद तक सेंसरशिप लगाई जा सकती है. लेकिन उन्हें पूरी तरह नियंत्रित करना बेहद कठिन है."

डोंग और उनकी पीढ़ी के लोगों के लिए मौजूदा "माओ क्रेज़" शायद अभी ख़त्म होने से बहुत दूर है.

यह इंटरनेट संस्कृति तक सीमित रहेगा या आगे चलकर राजनीतिक पहचान के अधिक स्थायी रूप में विकसित होगा, यह अभी देखना बाकी है.

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Senior Editorial writer covering tech innovations, space exploration, and emerging digital trends. Delivering deep analytical insights for premium global readers.

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'मिर्जापुर' का कलेक्शन भी बढ़ रहा है शेयर बाजार आज तेल की कीमतों से प्रभावित, गिफ्ट निफ्टी 122 अंक गिरा भागलपुर में 2 तटबंध टूटे, 44 लाख लोगों पर बाढ़ का संकट कच्चे तेल की कीमत 108 डॉलर के पार, क्या फिर से बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम? 1785 रुपये पर तय, GMP 200 के नीचे, 17 सितंबर से शुरू होगा इश्यू सरयू खतरे के निशान के ऊपर, कानपुर के 5 गांवों में घुसा गंगा का पानी, प्रयागराज के ये हाल तेल की आपूर्ति में बाधा के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था 7.8% बढ़ी, IMF ने सराहा एससी‑एसटी एक्ट में एक ही परिवार को 23 लाख, हाईकोर्ट ने दुरुपयोग पर जांच का आदेश दिया वैभव सूर्यवंशी से रोहित यादव तक: एशियन गेम्स में पाँच नई दिग्गजों पर उम्मीदें मोहल्ले में सबको सबकी पड़ी है, लेकिन क्या दर्शक को भी ‘चुम्बक’ में दिलचस्पी रहेगी? पढ़ें रिव्यू दलीप ट्रॉफी फाइनल में वैभव‑तिलक की नोकझोंक, ईस्ट जोन ने 13 साल बाद खिताब जीता माओत्से तुंग की मौत के 50 साल: फिर भी जेन ज़ी में क्यों है उनका आकर्षण? 12 साल बाद गुरु का होगा सिंह में महागोचर, इन 3 राशि के लोग होंगे मालामाल और चमकेगी किस्मत बैंक कर्मचारियों की हड़ताल: 1 दिन बंद, 3 दिन छुट्टियाँ – ग्राहकों को 4 दिन तक हो सकती है असुविधा जेल में बिगड़ती मादुरो की पत्नी की सेहत: 11 किलो वजन घटा, दिल की बीमारी के बीच घर में नजरबंदी की मांग आज से तीन दिन बैंक बंद रहेंगे: किन शहरों में बैंकों की रहेगी छुट्टी और कहां खुलेंगे? आज रात बनता है विष‑योग: कुंभ, कर्क और वृश्चिक राशियों को रखें सतर्कता पहला भारतीय कप्तान लाला अमरनाथ: जिन्होंने टीम इंडिया को पहली टेस्ट सीरीज जीत दिलाई अदालत ने फर्जी वसीयत मामले में अधिवक्ता की जमानत अर्जी को ठुकराया भारत के परमाणु भंडार में 30 नई हथियार, कुल 190 तक पहुंचा उज्जैन में खड़े हनुमान मंदिर स्थानांतरण विवाद: श्रद्धालुओं का कहना है दिशा बदलने पर भगवान नाराज, प्रशासन करवाएगा IIT स्कैनिंग अमेरिकी अरबपतियों का दबदबा जारी, फ्रांसीसी बर्नार्ड अरनॉल्ट टॉप 10 से बाहर यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में भाजपा की तीव्र गति, बीएल संतोष का आज संगठन समीक्षा दौरा बांग्लादेश को हराकर भारत फ़ाइनल में, हरमनप्रीत ने क्या कहा? बैंक यूनियनों ने आज देशव्यापी हड़ताल शुरू की: कुछ राज्यों में 4 दिन तक सेवाएँ प्रभावित पुतिन दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए पहुँचे; भारत महिला एशिया कप फाइनल में; इसरो ने चक्रवात चेतावनी जारी बिहार में 90% झीलें समाप्त, 6 वर्ष में 2693 से घटकर सिर्फ 258 प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की होगी मुलाकात, महिला एशिया कप का दूसरा सेमीफाइनल जिस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 25 साल पहले हुआ आतंकी हमला, वो बना कैसे था; गिरने के बाद वहां क्या हुआ? फ़ोन ऐप से गैस कनेक्शन धोखा: लखनऊ में लाखों की चोरी BRICS के साथ व्यापार में बढ़ता घाटा, चीन से आयात ही मुख्य कारण अशोक सिद्धार्थ के कदम से आकाश आनंद का राजनीतिक सफर समाप्त, जयचंद की भूमिका पर प्रकाश वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर चार हमले, हजारों की मौत – 25 वर्ष बाद भी पाँच सवाल ज़िंदा दवा कारोबारी हत्याकांड: शालू और सुब्रत ने दी थी पार्टी, काटे गए थे तीन-चार केक, मायके पक्ष बोला- नहीं था विवाद कुलदीप यादव का काउंटी क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन, 10 विकेट के साथ गंभीर और चयनकर्ताओं को भेजा स्पष्ट संदेश हूती हमलों के बीच ईरान‑सऊदी विदेश मंत्रियों की बातचीत, क्या अब जंग रुकेगी? आठ स्टार्टअप बने यूनिकॉर्न, छोटे स्तर से शुरू होकर अरबों डॉलर के मूल्यांकन तक पहुंचीं कंपनियां ट्विन टावर से वॉर ऑन टेरर तक अमेरिका का संघर्ष और साजिशें सम्राट चौधरी पर प्रशांत किशोर का तेज़ जवाब: बिहार को 'बेचारा' कहना गलत गोरखपुर में महिला का चौथे साथी के साथ रहना, थाने में हुआ विवाद हैवान के आगमन से 'हनुमान अंश' पर असर? 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