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महाराष्ट्र के जलगांव ज़िले की जामनेर एमआईडीसी में हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेस का बॉटलिंग प्लांट लगाने की योजना है.
फ़िलहाल यह प्रोजेक्ट केवल काग़ज़ों पर है और कारख़ाने का निर्माण शुरू नहीं हुआ है. लेकिन पानी, पर्यावरण और रोज़गार को लेकर इस प्रोजेक्ट पर विवाद शुरू हो गया है.
एक तरफ़ स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और किसान इसका विरोध कर रहे हैं. दूसरी तरफ़ राज्य सरकार का दावा है कि इससे बड़ा निवेश आएगा और रोज़गार के मौक़े पैदा होंगे.
बीबीसी मराठी ने जामनेर जाकर स्थानीय कार्यकर्ताओं, पर्यावरण के जानकारों और सरकारी अधिकारियों से बात की. इसके साथ ही सरकार का पक्ष भी जाना.
कंपनी ने बीबीसी के सवालों पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है.
साल 2004 में केरल के प्लाचीमाडा गांव में कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट के ख़िलाफ़ शुरू हुआ आंदोलन पूरे देश में चर्चा का विषय बना था.
स्थानीय लोगों ने कंपनी पर भूजल का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करने और पानी को प्रदूषित करने का आरोप लगाया था.
कई साल तक चले आंदोलन और क़ानूनी प्रक्रिया के बाद वह प्लांट बंद हो गया.
आज भी प्लाचीमाडा को औद्योगिक विकास और पानी पर लोगों के अधिकार के बीच हुए संघर्ष के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है.
अब क़रीब दो दशक बाद महाराष्ट्र में कोका-कोला का एक और बड़ा बॉटलिंग प्लांट लगाने की योजना है.
राज्य सरकार ने घोषणा की है कि जलगांव ज़िले की जामनेर एमआईडीसी में एक नया ग्रीनफ़ील्ड प्रोजेक्ट लगाया जाएगा. इसके साथ ही राज्य में क़रीब 1,200 करोड़ रुपये का निवेश होगा.
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सामाजिक कार्यकर्ता अजय पाटिल को इस प्रोजेक्ट के बारे में अख़बार से पता चला. इसके बाद उन्होंने इसके विरोध में अभियान शुरू कर दिया.
वह बताते हैं, "मैंने अख़बार में पढ़ा कि वाघूर बांध से कोका-कोला कंपनी को पानी दिया जाएगा. ख़बर में पानी की जो मात्रा बताई गई थी, उसे देखकर मैं हैरान रह गया."
अजय पाटिल का कहना है कि उनका विरोध किसी उद्योग से नहीं, बल्कि उसके लिए इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा से है.
वह कहते हैं, "हम इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन जामनेर तालुका के 160 गांवों में से क़रीब 100 गांव पानी की कमी से जूझ रहे हैं. बारिश के मौसम में भी लोगों को पानी ख़रीदना पड़ता है."
"कुछ गांवों में लोग सूखी नदी में गड्ढे खोदकर पानी निकालते हैं. ऐसे हालात में इतना ज़्यादा पानी इस्तेमाल करने वाला प्रोजेक्ट यहां क्यों लाया जा रहा है?"
अजय पाटिलअपना परिचय पूर्व पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देते हैं.
पिछले कुछ महीनों से वह जामनेर तालुका में घूमकर इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं. वह सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत दस्तावेज़ मांग रहे हैं और गांव-गांव जाकर लोगों को इसके बारे में बता रहे हैं.
उनका कहना है कि अब भी कई बुनियादी सवालों के जवाब नहीं मिले हैं.
वह कहते हैं, "कंपनी को कितनी ज़मीन दी जाएगी, कितना पानी मिलेगा और बिजली की दरें क्या होंगी, इसकी जानकारी नहीं है. पानी को साफ़ करने के बाद निकलने वाला गंदा पानी कहां जाएगा, यह भी पता नहीं है."
"कहा जा रहा है कि रोज़गार मिलेगा, लेकिन कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, यह साफ़ नहीं किया गया है. इसलिए हम दस्तावेज़ जुटा रहे हैं. हमारे पास आंकड़े होंगे, तभी हम लोगों के सामने तथ्य रख पाएंगे."
जामनेर में केवल अजय पाटिल इस प्रोजेक्ट का विरोध नहीं कर रहे हैं. किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण के जानकार भी इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं.
उनका कहना है कि यह विवाद केवल एक कंपनी का नहीं, बल्कि स्थानीय पानी के इस्तेमाल का है.
जलगांव में पानी के मुद्दे पर काम करने वाले पर्यावरण के जानकार राजेंद्र गाडगिल कहते हैं कि वाघूर बांध की बनावट और उसमें पानी की स्थिति को समझना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "वाघूर बांध में पानी का मुख्य स्रोत अजंता घाट है. मराठवाड़ा में हमेशा पानी की गंभीर समस्या रहती है. महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां कम बारिश होती है. इसलिए वाघूर बांध हर साल प्राकृतिक रूप से नहीं भरता."
राजेंद्र गाडगिल का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से बांध भर रहा है, लेकिन इसके पीछे जलवायु परिवर्तन का असर भी है.
वह कहते हैं, "अब कभी भी बहुत तेज़ बारिश हो जाती है, इसलिए बांध भर जाता है. लेकिन बांध भरने का मतलब यह नहीं है कि पानी हमेशा उपलब्ध रहेगा."
उनका कहना है कि कोका-कोला जैसे उद्योग को केवल निवेश के नज़रिए से नहीं, बल्कि पानी के इस्तेमाल के नज़रिए से भी देखना चाहिए.
वह कहते हैं, "पर्यावरण, स्वास्थ्य और जल संसाधनों के लिहाज़ से कोका-कोला ठीक नहीं है."
गाडगिल के मुताबिक़, जलगांव शहर के कई हिस्सों में आज भी नियमित पानी नहीं आता.
वह कहते हैं, "हमारा बांध केवल 70 प्रतिशत भरा है. फिर भी कहीं तीन दिन बाद, कहीं चार दिन बाद और कभी-कभी पांच-छह दिन बाद पानी आता है. प्रशासन को हमारे इन सवालों के जवाब देने चाहिए."
जामनेर के विधायक और महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन इन आपत्तियों से सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है कि जामनेर में पानी की कमी नहीं है और रोज़गार के लिए यह प्रोजेक्ट ज़रूरी है.
महाजन कहते हैं, "हमारे यहां कहीं भी पानी की कमी नहीं है. हमारे पास साढ़े ग्यारह टीएमसी का बांध है. उद्योग के लिए ज़रूरी पानी उपलब्ध है."
उनका कहना है कि जामनेर एमआईडीसी में उद्योग के लिए ज़रूरी सुविधाएं पहले से मौजूद हैं.
वह कहते हैं, "वहां पानी की व्यवस्था है, बिजली की लाइन है और जगह हाईवे के पास है. लोगों को रोज़गार मिलना ज़रूरी है और इसीलिए यह प्रोजेक्ट अहम है."
जलगांव एमआईडीसी की क्षेत्रीय अधिकारी दीपाली रासवे ने बीबीसी मराठी को बताया, "हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेस ने इस प्रोजेक्ट के लिए हर दिन पांच एमएलडी यानी 50 लाख लीटर पानी मांगा है. वाघूर बांध से यह पानी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है."
रासवे के मुताबिक़, कंपनी के अधिकारी अब तक चार से पांच बार प्रोजेक्ट की जगह का दौरा कर चुके हैं.
इस प्रोजेक्ट के लिए सड़क और बिजली उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी एमआईडीसी की है.
कंपनी ने 33 केवी का बिजली कनेक्शन मांगा है. इसे लेकर एमआईडीसी में बैठकें चल रही हैं.
रासवे ने बताया कि कोका-कोला 'रेड कैटेगरी' का उद्योग है. इसलिए इस प्रोजेक्ट के लिए महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंज़ूरी ज़रूरी होगी.
कंपनी को 'ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज' की नीति भी लागू करनी होगी. इसका मतलब है कि कारख़ाने से निकलने वाले गंदे पानी को साफ़ करने की ज़िम्मेदारी कंपनी की होगी.
रासवे के मुताबिक़, कंपनी ने वाघूर बांध के साथ तापी नदी से भी पानी मांगा है.
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हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेस ने 12 दिसंबर 2023 को जारी अपनी आधिकारिक प्रेस रिलीज़ में रत्नागिरी की लोटे-परशुराम एमआईडीसी में लग रहे ग्रीनफ़ील्ड कारख़ाने की जानकारी दी थी.
कंपनी के मुताबिक़, यह कारख़ाना 88 एकड़ ज़मीन पर बनाया जा रहा है. इसमें 1,387 करोड़ रुपये का निवेश होगा और 350 लोगों को रोज़गार मिलेगा.
जामनेर के लिए भी प्रोजेक्ट की घोषणा हो चुकी है. लेकिन इससे कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, कंपनी ने अभी तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी जारी नहीं की है.
सामाजिक कार्यकर्ता गौरव खोडपे इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हैं.
वह कहते हैं, "कोका-कोला की वेबसाइट पर बताया गया है कि भारत में उसके सभी प्लांट में कुल मिलाकर केवल छह हज़ार लोगों को रोज़गार मिला है. इतनी ज़मीन, पानी और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल करने वाली कंपनी से जामनेर को आख़िर कितना फ़ायदा होगा?"
जामनेर में कुछ लोग इस प्रोजेक्ट का समर्थन भी कर रहे हैं.
कुछ स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया पर कहा है कि यह प्रोजेक्ट रोज़गार और औद्योगिक विकास के लिए ज़रूरी है.
उनका मानना है कि बड़ा निवेश आने से इलाक़े का विकास होगा और नए उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा.
बीबीसी मराठी ने पानी के इस्तेमाल, पर्यावरण को बचाने के लिए किए जाने वाले उपायों और रोज़गार को लेकर हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेस से जवाब मांगा था.
लेकिन यह लेख प्रकाशित होने तक कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.
जामनेर में कारख़ाने का निर्माण अभी शुरू नहीं हुआ है. लेकिन पानी, पर्यावरण और रोज़गार को लेकर विवाद पहले ही शुरू हो चुका है.
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