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जब देश भर में रावण के पुतले धू-धू कर जल रहे होते हैं, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर में लकड़ी का एक विशाल रथ जंगल की धरती पर आगे बढ़ रहा होता है. न रामलीला, न रावण वध, न तीर-कमान.
बस्तर में दशहरा भगवान राम की नहीं, यहां की आराध्य देवी दंतेश्वरी की विजयगाथा है और बस्तर का यह दशहरा उत्सव पूरे 76 दिन चलता है.
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हर समुदाय की भूमिका तय है. रथ बनाने वाले एक गांव के हैं, रस्सी लाने वाले दूसरे के, रथ खींचने वाले लोग तीसरे के, सारा आयोजन बिना किसी बाधा के समाप्त होने की कामना के साथ नौ दिनों तक गड्ढे में बैठ कर प्रार्थना करने वाले जोगी चौथे गांव का.
रथ की लकड़ी एक गांव से आती है, कारीगर दूसरे गांव के, रस्सी तीसरे इलाक़े की देन है और विजय रथ खींचने का अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों के पास है.
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बस्तर के सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप कहते हैं, "यही इस दशहरा पर्व की विशेषता है कि बस्तर के हर समाज के लोग इसमें शामिल होते हैं. हर समाज की भूमिका तय है. साल दर साल इस विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा को देखने के लिए भारत के अलावा दूसरे देशों से लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. इस दशहरा में हम किसी का पुतला दहन नहीं करते."
देश के दूसरे हिस्सों में दशहरा रावण के जलने के साथ याद किया जाता है. बस्तर में शायद इसे उन लोगों के हाथों से याद किया जाता है, जो हर साल इस रथ को बनाते हैं, खींचते हैं और फिर अगले साल के लिए लौट जाते हैं. यहां कुछ भी जलाकर ख़त्म नहीं किया जाता. एक परंपरा है, जो हर साल विदा होती है और फिर लौट आती है.
मान्यता है कि लगभग 600 साल पहले चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी की यात्रा पर निकले. मुरिया, भतरा, गोंड, धाकड़, माहरा समेत कई जातियों के मुखिया उनके साथ चले. राजा खुद पैदल चले, किसी सवारी पर नहीं बैठे.
कहा जाता है कि पुरी के राजा ने उन्हें सोलह पहियों वाला रथ भेंट किया. लौटकर राजा ने रथ बांट दिया. चार पहिए भगवान जगन्नाथ को और बारह देवी दंतेश्वरी को अर्पित हुए. तब से बस्तर के दशहरे में देवी का छत्र रथ पर रखा जाता है और रथ की परिक्रमा होती है.
हरेली अमावस्या की सुबह जगदलपुर में दंतेश्वरी मंदिर के सामने जंगल से लाई गई लकड़ी का एक बड़ा कुंदा रखा जाता है. इसे 'ठुरलू खोटला' कहते हैं. रथ बनाने के औजारों के साथ इसकी पूजा होती है. यही 'पाठ जात्रा' दशहरा का पहला कदम है.
इसके बाद रथ बनना शुरू होता है. झारउमरगांव और बेड़ाउमरगांव के कारीगर बसूला, कुल्हाड़ी और बिंधना जैसे पारंपरिक औजारों से लगभग दस दिन में 40 फीट ऊंचा रथ खड़ा कर देते हैं. मशीनों का नामोनिशान नहीं. अलग-अलग हिस्सों की लकड़ी लाने की जिम्मेदारी अलग-अलग गांवों की है, जिसे वे पीढ़ियों से निभा रहे हैं. रथ खींचने की रस्सी पेड़ की छाल से बनती है और पोटानार क्षेत्र के ग्रामीण उसे लाते हैं.
पितृमोक्ष अमावस्या की शाम बस्तर दशहरा का सबसे रोमांचक दृश्य दिखता है. भंगाराम चौक की काछिनगुड़ी में पनका जाति की एक कुंवारी बालिका पर काछिन देवी आती हैं, इसके बाद बालिका कांटों के झूले पर बैठकर दशहरा शुरू करने की अनुमति देती है.
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जिन काछिन देवी से पर्व शुरू करने की अनुमति ली जाती है, वे मिरगान, चंडार और तिकड़ा जैसे आदिवासी समाजों की कुल-देवी हैं.
पिछले पांच सालों से काछिन देवी की प्रतिनिधि बनने वाली पांचवीं कक्षा की छात्रा, 10 साल की पीहू बड़ी हो कर कलेक्टर बनना चाहती हैं.
पीहू कहती हैं, "जब मैं काछिन देवी बनती हूं तो मुझे लगता है कि मैं पीहू हूं ही नहीं. मैं देवी की तरह ही लोगों को दर्शन देती हूं. मुझे देखने के लिए बहुत लोग आते हैं. दूसरे इलाकों से देवी-देवताओं को भी मेरे पास लाया जाता है."
बस्तर दशहरा में हर दिन कोई न कोई पारंपरिक रस्म चलती है, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी भाग लेते हैं.
आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक रोज़ फूलों से सजे रथ की परिक्रमा होती है. हज़ारों ग्रामीण छाल की मोटी रस्सी थामकर रथ खींचते हैं. पुलिस के जवान रथ पर विराजी देवी दंतेश्वरी को सशस्त्र सलामी देते हैं. महिलाएं रथ की नज़र उतारती हैं और पुष्प वर्षा करती हैं.
अष्टमी की आधी रात 'निशा जात्रा' की परंपरा होती है. दंतेश्वरी मंदिर से देवी की डोली निकलकर निशा-जात्रा मंदिर पहुंचती है, जो साल में सिर्फ़ एक बार खुलता है.
यहां बलि की परंपरा है और भोग-प्रसाद पारंपरिक रूप से राजपुरोहित परिवार तैयार करता है.
विजयादशमी पर आठ पहियों वाला विजय रथ निकलता है. परिक्रमा के बाद देर रात रथ को 'चुरा' लिया जाता है और कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा दिया जाता है. यह 'भीतर रैनी' की रस्म है.
कुम्हड़ाकोट में ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत कई इलाकों से तीन हज़ार से ज़्यादा देवी-देवताओं को लाया जाता है. अगले दिन राज परिवार के प्रतिनिधि नए अन्न का भोग लगाकर जनता के साथ नवाखानी मनाते हैं, फिर रथ लौटता है.
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इस दशहरा उत्सव के आखिर में मुरिया दरबार होता है. पुराने दस्तावेज़ बताते हैं कि इस मुरिया दरबार की शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी. रियासत काल में आदिवासियों की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था- मांझी, मुखिया, चालकी और नाईक अपने-अपने इलाक़ों की समस्याएँ सीधे राजा के सामने रखते थे.
यह परंपरा आज भी जारी है, बस अब राजा की जगह जनप्रतिनिधि और प्रशासन के लोग आमने-सामने बैठते हैं.
इसके मुरिया दरबार के बाद बाहर से आए देवी-देवताओं को सम्मान के साथ विदा किया जाता है. दंतेवाड़ा से आईं मावली माता की डोली और देवी दंतेश्वरी का छत्र, सशस्त्र सलामी के बीच शोभायात्रा के साथ लौटते हैं.
दशहरा बीत जाता है. रथ लौट जाता है, देवी अपने धाम चली जाती हैं और दूर-दराज़ के गांवों से आए लोग घर लौटने लगते हैं. लेकिन अगले साल फिर जंगल से लकड़ी आएगी, कारीगर औज़ार निकालेंगे, रस्सियां तैयार होंगी और हज़ारों हाथ एक बार फिर रथ को खींचने के लिए जुटेंगे. पीहू शायद तब तक एक कक्षा और आगे बढ़ चुकी होंगी, लेकिन काछिन देवी बनने पर वह शायद फिर वही कहेंगी कि उस वक़्त वह पीहू नहीं रहती.
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