अगर आप किसी बीमा कंपनी से कोई पॉलिसी खरीद रहे हैं तो आंखमूंद कर एजेंट की बातों पर विश्वास करना आपके लिए भारी पड़ सकता है। एक महिला 4 सितंबर 2023 को अपने बेटे को अमेरिका पैसे भेजने के लिए बैंक शाखा गई थीं। उन्हें बैंक अधिकारियों ने उन्हें दो एजेंटों से मिलवाया। इन एजेंटों ने बीमा उत्पाद को एक निवेश योजना के रूप में पेश किया।
महिला को 10 लाख रुपये लगाने के लिए राजी किया गया और बताया गया कि चार साल बाद हर साल 2.67 लाख रुपये मिलेंगे। इसके बाद की कहानी आपकी आंखें खोले देगी। उससे पहले यह जान लें कि महिला को कंज्यूमर फोरम से कितनी बड़ी जीत मिली है…
हैदराबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक 73 साल की रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर को कुल 10.6 लाख रुपये की राहत दिलाई। इसमें 10 लाख रुपये की पॉलिसी राशि वापसी, 50 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये खर्च शामिल हैं।
आयोग ने एक अहम फैसले में कहा कि बीमा पॉलिसी बेचते समय सिर्फ साइन ले लेना यह साबित नहीं करता कि ग्राहक ने पूरी जानकारी के साथ सहमति दी है। 27 अगस्त को पारित इस आदेश में आयोग अध्यक्ष बी उमा वेंकट सुब्बा लक्ष्मी, सदस्य सी लक्ष्मी प्रसन्ना और बी राजी रेड्डी शामिल थे।
महिला ने आरोप लगाया कि एजेंटों ने उनकी सैलरी एक करोड़ रुपये दर्ज कर दी, जबकि वह रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर थीं और उनकी मासिक पेंशन करीब 57 हजार रुपये थी। उनका यह भी कहना था कि बीमा खरीदने का उनका कोई इरादा नहीं था।
बैंक अधिकारियों ने लोन से जुड़े कागजों पर उनके साइन करा लिए और उसके बाद 10 लाख रुपये बीमा पॉलिसी में लगा दिए। महिला को यह बताया गया कि यह एक बार का निवेश है, जबकि पॉलिसी में हर साल प्रीमियम देना जरूरी था।
जब महिला ने पॉलिसी कैंसिल कराने की कोशिश की तो बैंक अधिकारियों ने कहा कि यह सितंबर 2024 में ही हो सकता है। मार्च 2024 में अमेरिका से लौटने के बाद उन्हें बताया गया कि अब कैंसिलेशन सितंबर 2025 में संभव होगा। बैंक ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि सादे कागजों पर दस्तखत नहीं लिए गए और बीमा लेनदेन महिला और बीमा कंपनी के बीच था। बीमा कंपनी ने दावा किया कि पॉलिसी उनकी सहमति से जारी हुई थी और पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स 18 सितंबर 2023 को उनके पते पर भेज दिए गए थे।
आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या महिला को पॉलिसी जांचने और फ्री-लुक सुविधा का उपयोग करने का वास्तविक मौका मिला। पर्पोजल फॉर्म में महिला के स्थायी और वर्तमान दोनों पते थे, लेकिन बीमा कंपनी ने डॉक्यूमेंट्स स्थायी पते पर भेजे, जबकि महिला उस समय विदेश में थीं।
आयोग ने कहा कि केवल दस्तावेज भेज देना तब तक काफी नहीं है जब तक उपभोक्ता को उन्हें पढ़ने और रद्द करने का वास्तविक अवसर न मिले।
आयोग ने महिला की उम्र और स्थिति पर भी ध्यान दिया। आयोग ने कहा कि एक सीनियर सिटीजन और रिटायर्ड व्यक्ति से यह नहीं माना जा सकता कि वह जटिल बीमा शर्तों को अपने आप समझ जाएगा। बैंक और बीमा कंपनी को उन्हें सभी जरूरी शर्तें साफ तौर पर समझानी चाहिए थीं। आयोग ने यह भी पाया कि लोन लेनदेन और बीमा निवेश के बीच गहरा संबंध था, जिससे महिला की सहमति की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।
आयोग ने अंत में माना कि पॉलिसी महिला की स्वतंत्र इच्छा और सोच-समझकर दी गई सहमति से नहीं ली गई थी। बैंक और बीमा कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी पाया गया। आयोग ने बीमा कंपनी को पॉलिसी बंद कर 10 लाख रुपये वापस करने का निर्देश दिया। साथ ही बैंक और बीमा कंपनी को संयुक्त रूप से 50 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये खर्च देने का आदेश दिया गया।
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