बिहार के छपरा में एक महिला डॉक्टर की लापरवाही से गर्भवती महिला की मौत हो गई। महिला के पति ने बिहार राज्य उपभोक्ता निवारण आयोग से इसकी शिकायत की। आयोग में मुकदमा चला और आखिरकार पति ने यह केस जीत लिया। अब डॉक्टर को 20 लाख का हर्जाना भरना पड़ेगा। यह मामला साल 2013 का है। महिला के गर्भ में पल रहे शिशु की पहले ही मौत हो चुकी थी। वह अंदर सड़ने लगा था। मगर आरोपी महिला डॉक्टर ने उस और ध्यान नहीं दिया था, जिस वजह से गर्भवती की भी जान चली गई थी।
बिहार राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि केवल अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पर आंख मूंदकर भरोसा करना और मरीज की जानलेवा पीड़ा को नजरअंदाज करना गंभीर अपराध है। आयोग ने असंवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी महिला डॉक्टर पर 20 लाख रुपये का भारी भरकम हर्जाना लगाया है।
यह मामला छपरा के भगवान बाजार स्थित 'भूमिजा चिकित्सा केंद्र' का है। शिकायतकर्ता नीरज कुमार जैन की पत्नी शालू जैन को गर्भावस्था के दौरान पेट में असहनीय दर्द हुआ था। गर्भ में पल रहे शिशु की हलचल भी बंद हो गई थी। नीरज अपनी पत्नी को डॉक्टर विमला शाही के पास दिखाने के लिए ले गए। महिला डॉक्टर ने मरीज की शारीरिक जांच किए बिना ही सिर्फ पुरानी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखकर सब कुछ सामान्य बता दिया।
महिला के पति ने आरोप लगाया कि इसके बाद 6 अक्टूबर 2013 को शालू तड़पते हुए दोबारा डॉक्टर शाही के पास पहुंची। डॉक्टर ने इलाज करने के बजाय उन्हें डांटकर भगा दिया और कहा कि एक ही फीस में कब तक दिखाओ। कुछ नहीं मिलेगा। दवा खाओ सब ठीक हो जाएगा।
फिर हालत बिगड़ने पर जब परिजन शालू को पटना के फोर्ड अस्पताल ले गए। हालांकि, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जांच में पता चला कि गर्भ में शिशु की काफी समय पहले ही मौत हो चुकी थी। भ्रूण अंदर सड़ने लगा था, जिससे गर्भवती महिला के पूरे शरीर में जहर (सेप्टीसीमिया) फैल गया। पटना में इलाज के दौरान 11 अक्टूबर 2013 को महिला ने दम तोड़ दिया था।
महिला और उसके गर्भ में पल रहे शिशु की मौत के बाद परिजन में कोहराम मच गया। पति नीरज जैन ने साल 2014 में इसकी शिकायत उपभोक्ता आयोग से की थी। आयोग में लगभग 12 सालों तक इसकी सुनवाई चली।
जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने पूरे मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि डॉक्टर ने अपनी जिम्मेदारी और पेशेवर दक्षता का सही पालन नहीं किया। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अगर मरीज को तेज दर्द था, तो डॉक्टर को तुरंत दूसरी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट या किसी अन्य विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए थी।
आयोग ने 'रेस इप्सा लोक्विटुर' (घटना स्वयं लापरवाही बयां करती है) का सिद्धांत लागू करते हुए महिला डॉक्टर को दोषी ठहराया। 1 सितंबर 2026 को जारी आदेश में उससे कहा गया कि पीड़ित पति को 60 दिनों के भीतर 20 लाख रुपये का मुआवजा और 20 हजार रुपये मुकदमे का खर्च अदा किया जाए। निर्धारित समय सीमा में भुगतान ना करने पर डॉक्टर से 8 प्रतिशत सालाना ब्याज भी वसूला जाएगा।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!