मुंबई की स्पेशल NIA कोर्ट ने एल्गार परिषद मामले में चार आरोपियों की जमानत रद्द करने की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की मांग खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि एजेंसी यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दे सकी कि चारों ने अपनी जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया था.
जिन लोगों की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी, उनमें कार्यकर्ता पी वरवरा राव, वर्नोन गोंसाल्वेस, सुधा भारद्वाज और अरुण फरेरा शामिल हैं. NIA ने इन चारों को फिर से गिरफ्तार करने की भी मांग की थी.
दरअसल, NIA ने आरोप लगाया था कि चारों आरोपी 19 जनवरी 2026 को मुंबई प्रेस क्लब की छत पर हुई एक बैठक में शामिल हुए थे. यह बैठक प्रतिबंधित संगठन CPI यानी माओवादी की विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए आयोजित की गई थी. NIA ने दावा किया था कि बैठक में अर्बन नक्सल आंदोलन की आगे की रणनीति पर चर्चा हुई. आरोपियों की मौजूदगी उनकी जमानत की शर्तों का उल्लंघन थी.
जमानत की एक शर्त के तहत आरोपियों को मामले के सह-आरोपियों या इसी तरह की गतिविधियों में शामिल लोगों से संपर्क और बातचीत करने से रोका गया था. इसी आधार पर NIA ने जमानत रद्द करने की मांग की थी.
आरोपियों ने कहा-किसी से संपर्क नहीं किया
चारों आरोपियों ने कोर्ट में NIA के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि बैठक में जेल में बंद कैदियों की जिंदगी और मामले से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी. सह-आरोपी गौतम नवलखा के दिल्ली जाने के बाद उनके आगे के कदमों पर भी बात हुई थी. इसके अलावा आरोपी सुरेंद्र गाडलिंग के खिलाफ चल रहे मामले, उनकी रिहाई की संभावना और जेल में उनकी मेडिकल सिचुएशन पर चर्चा हुई थी.
आरोपियों ने कहा कि उन्होंने किसी अन्य सह-आरोपी को बैठक में नहीं बुलाया था.उन्हें यह जानकारी भी नहीं थी कि बैठक में दूसरे सह-आरोपियों को बुलाया गया है. उन्होंने किसी सह-आरोपी या समान गतिविधियों से जुड़े व्यक्ति से संपर्क नहीं किया.
कोर्ट ने कहा-CCTV में सिर्फ मौजूदगी दिखी
विशेष NIA अदालत के जज चकोर एस बाविस्कर ने मामले की सुनवाई की. अदालत ने बैठक का CCTV फुटेज भी देखा. हालांकि फुटेज में आवाज नहीं थी. इसलिए यह पता नहीं चल सका कि बैठक में वास्तव में क्या बातचीत हुई थी.
कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपियों और सह-आरोपियों की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि वे किसी प्रतिबंधित गतिविधि में शामिल होने के लिए वहां जमा हुए थे. सिर्फ मौजूदगी को माओवादी विचारधारा के प्रचार से नहीं जोड़ा जा सकता.
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर बैठक में मामले या सह-आरोपियों को लेकर चर्चा हुई भी हो तो सिर्फ इस आधार पर जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता. जज ने कहा कि जमानत रद्द करने के लिए बहुत मजबूत और ठोस परिस्थितियां जरूरी होती हैं. जमानत तभी रद्द की जा सकती है जब न्याय प्रक्रिया में दखल, जमानत का गलत इस्तेमाल या आरोपी के फरार होने जैसी गंभीर स्थिति सामने आए.
कोर्ट ने NIA की सभी अर्जियां खारिज कर दीं. हालांकि आरोपियों को सावधान भी किया गया. कोर्ट ने कहा कि उन्हें भविष्य में ज्यादा सतर्क रहना चाहिए. ऐसी किसी स्थिति से बचना चाहिए, जिससे जमानत की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लग सके.
2018 से चल रहा है एल्गार परिषद मामला
एल्गार परिषद मामला साल 2018 में सामने आया था. इस मामले में आरोपियों पर प्रतिबंधित CPI माओवादी संगठन से संपर्क रखने और उसकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप हैं. जांच एजेंसियों ने कुछ आरोपियों को ‘अर्बन नक्सल’ के तौर पर भी बताया है.
मामले में सभी आरोपी अब तक जमानत पर हैं. हालांकि इस मामले में अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. ताजा आदेश के बाद चारों आरोपियों को राहत मिली है.
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