अमेरिका द्वारा ईरान की अर्थव्यवस्था को अलग-थलग करने की कोशिश तेज कर करने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग भड़क गई है। इससे बाजार में और उथल-पुथल की आशंका बढ़ गई है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की उम्मीदों को भी झटका लगा है।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक अक्टूबर डिलीवरी वाले वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का दाम 86 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है और यह सप्ताह में लगभग 6% की बढ़त पर है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड गुरुवार को 94 डॉलर के करीब बंद हुआ, जो लगातार पांच सत्रों में चढ़ने के बाद आया है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि प्रशासन अगले सोमवार को इस पहल का डिटेल देगा। इससे पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कदम को "इकोनॉमिक डी-डे" करार दिया था। ये उपाय ईरान को निशाना बनाएंगे और उन देशों को भी फंसा सकते हैं जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं, जिनमें चीन भी शामिल है।
इस साल तेल की कीमतों में 50% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि अमेरिका-ईरान युद्ध ने मध्य पूर्व में हलचल मचा दी है और दोनों पक्ष हार्मुज स्ट्रेट पर आमने-सामने हैं। बेसेंट ने सीएनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि वाशिंगटन का इस जलमार्ग पर नियंत्रण है, और जहाज दक्षिणी मार्ग से निकल सकते हैं।
ईरानी तेल का सबसे बड़ा आयातक चीन ने कहा कि प्रतिबंध और दबाव से काम नहीं चलेगा और उसने कूटनीतिक समाधान की मांग की। बेसेंट ने अपनी बातों में कहा कि चीन को अपनी ज्यादातर ऊर्जा इसी क्षेत्र से मिलती है, और यह भी कहा कि "अगर वह इस कार्यक्रम के साथ जुड़ जाए तो उसका बड़ा भला होगा।"
आर्थिक दबाव की यह बढ़ी हुई लहर तब आई है, जब वाशिंगटन ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी कर दी है, ताकि तेहरान के कच्चे तेल के निर्यात को रोका जा सके। ऐसा लगता है कि यह कदम कारगर रहा है, क्योंकि इस हफ्ते ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने कहा कि तेल का प्रवाह "लगभग बंद हो गया है"।
मध्य पूर्व के अलावा, रूसी रिफाइनरियों और बंदरगाहों पर यूक्रेन के दर्जनों हमलों ने मॉस्को के ऊर्जा उद्योग को बाधित किया है, जिससे कुछ इलाकों में ईंधन की कमी पैदा हो गई है। इससे वैश्विक डीजल बाजार में तंगी बढ़ी है, और डीजल की कीमतों में बढ़त कच्चे तेल की तुलना में कहीं ज्यादा रही है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर हर देश में एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में फ्यूल की कीमतें बाजार तय करता है या सरकार। विशेषज्ञ इसे "पास-थ्रू इफेक्ट " कहते हैं, यानी कच्चे तेल की कीमत में बदलाव का कितना हिस्सा पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों तक पहुंचता है।
जिन देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पूरी तरह बाजार तय करता है, वहां कच्चे तेल की कीमत बदलने का असर बहुत जल्दी दिखता है। असर पहले सप्ताह से शुरू हो जाता है।दूसरे सप्ताह में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। तीसरे और चौथे सप्ताह तक नई कीमतें पूरी तरह लागू हो जाती हैं। हालांकि इसका असर टैक्स पर भी निर्भर करता है। जहां ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी ज्यादा होती है, वहां कच्चे तेल की कीमत बदलने का असर अपेक्षाकृत कम होता है। जहां तक भारत की बात है तो यहां ईंधन के रेट पर सरकार का नियंत्रण है। सरकार की मर्जी के बिना सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां IOCL, HPCL और भारत पेट्रोलियम तेल के दाम नहीं बढ़ा सकतीं। इसीलिए भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम केवल 7.50-7.50 रुपये ही बढ़े।
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