राम मंदिर की धार्मिक न्यास समिति ने वर्चुअल बैठक में पुजारियों के लिये कई नए नियम तय किये। महंत गोविंद देव गिरि की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया गया कि अब पुजारी अर्द्ध छौर नहीं करा सकेंगे; उन्हें या तो सिर के बाल बढ़ाने होंगे या फिर पूरी तरह मुंडन कराना होगा। इसके अतिरिक्त, आरती के समय सिर को ढँक कर भगवान की पूजा करनी अनिवार्य की गई।
श्रीराम वल्लभा कुंज के अधिकारी राजकुमार दास ने कहा कि रामलला के अर्चक आम जन के आदर्श हैं, इसलिए उनके कार्य‑प्रणाली में अनुशासन आवश्यक है। डॉ. रामानंद दास ने बताया कि बाल में पाप का स्थान माना जाता है, इसलिए परम्परा के अनुसार सिर ढँक कर आरती अर्पित की जानी चाहिए। आचार्य मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि अर्द्ध छौर प्रथा अनुचित है और यह शिकायत उन्हें अन्य देवस्थानों में भी मिली है।
बैठक में स्वामी परमानंद महाराज, निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेद्र दास, मणिराम छावनी के महंत कमलनयन दास, स्वामी विश्व प्रसन्न तीर्थ तथा आचार्य इंद्रदेव मिश्र सहित कई प्रमुख संत शामिल थे।
सावन उत्सव में विशेष भोग‑प्रसाद पर भी चर्चा हुई। रामकुंज कथा मंडप के पीठाधीश्वर डॉ. रामानंद दास ने बताया कि पूर्णिमा तक रोज़ देसी घी के मालपुआ और खीर का भोग स्थानीय परम्परा के अनुसार अर्पित किया जाता है, जिस पर सभी संतों ने सहमति व्यक्त की। श्रीराम वल्लभा कुंज के अधिकारी स्वामी राजकुमार दास ने सुझाव दिया कि अगले पंद्रह दिनों तक पूड़ी‑साग का भी भोग लगाया जाए, जिसे सर्वसम्मति से मंजूरी मिली।
अर्चकों की संख्या के आधार पर रामलला और उसके परिवार के साथ सभी उप‑मंदिरों में देवी‑देवताओं की झूले की व्यवस्था का भी निर्णय लिया गया। झूले‑उत्सव का समय निर्धारित किया गया; पुजारी प्रशिक्षण योजना के प्रभारी आचार्य केशव शर्मा ने बताया कि प्रातःकाल भगवान को झूले पर विराजित कर झूले‑उत्सव मनाया जाता है, जिसमें दोहरी परदा व्यवस्था रहती है। संतों ने इसे अनुचित माना और कहा कि अर्चकों के लिये उत्सव का समय स्पष्ट होना चाहिए। वर्तमान में श्रद्धालुओं की दृष्टि से यह तय किया गया कि श्रृंगार आरती के बाद रामलला मंदिर के गर्भगृह के बाहर विराजेंगे, मध्याह्न में विश्राम के बाद सायंकाल फिर झूले पर स्थापित होंगे और शयन‑आरती तक वही रहेंगे। सायंकाल प्रत्येक दिन मंदिर परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद देव गिरि ने सभी संतों से विनती की कि पुजारियों की व्यवस्था को सुधारने हेतु मंदिर में परिधान व अन्य सुधारों पर राय दें। इस पर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि जब तक गर्भगृह में अतिरिक्त लोग प्रवेश कर रहे हैं, व्यवस्था सुधारी नहीं जा सकती। महंत गोविंद देव ने आश्वासन दिया कि सब ठीक हो जाएगा, बस थोड़ा समय चाहिए। फिर भी आचार्य शरण ने कहा कि समय देने पर भी पुरानी प्रथा बनी रहेगी। अंततः यह निर्णय लिया गया कि बिना संस्कार के कोई भी अन्य व्यक्ति गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर सकेगा।
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