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बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंच गए हैं। 78 वर्षीय आलमगीर को संसद ने बांग्लादेश का 23वां राष्ट्रपति चुना है। राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्षी उम्मीदवार सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद को हराया। आलमगीर को 255 वोट मिले, जबकि ओली अहमद को 88 वोट हासिल हुए। इस तरह उन्होंने 167 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
लेकिन मिर्जा फखरुल की पहचान सिर्फ एक राष्ट्रपति के तौर पर नहीं है। उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत आज से कई दशक पहले छात्र राजनीति से हुई थी। एक समय वह वामपंथी विचारों वाले छात्र संगठन से जुड़े थे। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी की, शिक्षक बने, स्थानीय राजनीति में आए और फिर BNP के शीर्ष नेताओं में शामिल हुए। आखिर उनका यह लंबा सफर राष्ट्रपति पद तक कैसे पहुंचा? आइए जानते है...
बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव आम जनता सीधे नहीं करती। संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति का चुनाव संसद करती है। इस बार कुल 349 पंजीकृत मतदाताओं में से 343 ने मतदान किया। आलमगीर को 255 वोट मिले और ओली अहमद को 88 वोट मिले। यह मुकाबला करीब 35 साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए पहला प्रतिस्पर्धी चुनाव था। ओली अहमद लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष हैं और उन्हें जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के विपक्षी गठबंधन का समर्थन मिला था। दूसरी ओर आलमगीर सत्तारूढ़ BNP के उम्मीदवार थे।
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने राजनीति में कदम उस दौर में रखा, जब बांग्लादेश आजाद देश नहीं था और उसे पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर जाना जाता था। ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वह वामपंथी विचारधारा वाले ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े। 1969 में तत्कालीन सैन्य समर्थित सरकार के खिलाफ हुए जन आंदोलन के दौरान आलमगीर संगठन की ढाका विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष बने। यह वह दौर था जब पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा था और आगे चलकर यही घटनाक्रम बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि बना। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान आलमगीर ने वामपंथी विचारों वाले स्वतंत्रता सेनानियों के संगठन और लामबंदी में मदद की। उन्होंने भारत में शरण लेकर भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभाई। यानी उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत सीधे किसी बड़े राजनीतिक दल से नहीं हुई थी। वह पहले छात्र आंदोलन और विचारधारा आधारित राजनीति से जुड़े और धीरे-धीरे सक्रिय राजनीतिक जीवन की ओर बढ़े।
राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले आलमगीर सरकारी सेवा में थे। 1972 में उन्होंने सिविल सेवा के शिक्षा कैडर में प्रवेश किया और अर्थशास्त्र के शिक्षक बने। सरकारी सेवा के दौरान उन्होंने अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। लेकिन 1986 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और सक्रिय राजनीति में उतर गए। इसके दो साल बाद, 1988 में वह अपने गृह क्षेत्र ठाकुरगांव की नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। खास बात यह थी कि उन्होंने यह चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीता था। यहीं से उनकी स्थानीय राजनीति में पकड़ मजबूत हुई और आगे चलकर उनका रास्ता राष्ट्रीय राजनीति की ओर खुला।
मिर्जा फखरुल 1990 के दशक की शुरुआत में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) में शामिल हुए। उस समय देश में तत्कालीन राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद की सरकार के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन में BNP की नेता खालिदा जिया और अवामी लीग प्रमुख शेख हसीना भी इरशाद सरकार के खिलाफ एक साथ थीं। बाद में दोनों बांग्लादेश की राजनीति की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बन गईं और अलग-अलग समय पर प्रधानमंत्री रहीं। बीएनपी में शामिल होने के बाद आलमगीर ने पार्टी में लगातार अपनी स्थिति मजबूत की। करीब दो दशक तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाने के बाद 2011 में उन्हें पार्टी का कार्यवाहक महासचिव बनाया गया। 2016 में उन्हें बीएनपी का स्थायी महासचिव नियुक्त किया गया। वह लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे।
नहीं। पार्टी संगठन में अहम जिम्मेदारी निभाने के साथ आलमगीर ने सरकार में भी मंत्री पद संभाले। 2001 में वह पहली बार ठाकुरगांव-1 से संसद के लिए चुने गए। बीएनपी के सत्ता में लौटने के बाद उन्हें कृषि राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्हें नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी दी गई। इस तरह उनका राजनीतिक अनुभव सिर्फ विपक्षी राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सरकार में भी काम किया। 2026 में बीएनपी के सत्ता में लौटने के बाद आलमगीर को स्थानीय सरकार, ग्रामीण विकास और सहकारिता मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। इसी दौरान वह पार्टी के महासचिव भी थे।
मिर्जा फखरुल के राष्ट्रपति बनने की कहानी को 2026 के बांग्लादेश आम चुनाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह चुनाव शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के 2024 में छात्र नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के बाद सत्ता से बाहर होने के बाद हुए राजनीतिक बदलाव के बीच हुआ। इसके बाद मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया की निगरानी की। फरवरी 2026 में हुए आम चुनाव में BNP सत्ता में लौटी और तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। मिर्जा फखरुल भी ठाकुरगांव-1 से दोबारा सांसद चुने गए। नई सरकार में मंत्री बनने के बाद वह BNP संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। अब राष्ट्रपति चुने जाने के साथ उनका राजनीतिक सफर एक नए संवैधानिक पद तक पहुंच गया है।
बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति मुख्य रूप से राष्ट्राध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार चलती है। हालांकि राष्ट्रपति के पास संविधान के तहत कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी होती हैं। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं। इसके अलावा वह देश की सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भी होते हैं। हालांकि इन संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल आम तौर पर प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार किया जाता है। यही वजह है कि मिर्जा फखरुल का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना उनके लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि BNP के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश की नई राजनीतिक व्यवस्था का भी अहम हिस्सा है।
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