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भारतीय अधिकारियों और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस साल हुए 'फ़ोन कॉल' को लेकर मीडिया में प्रकाशित एक ख़बर पर विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 'अमेरिकी लॉबिंग फ़र्म एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने इस साल मई जून में व्हाइट हाउस और भारतीय अधिकारियों के बीच कई फ़ोन कॉल की व्यवस्था कराई थी.'
इस पर विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात करने के लिए भारत को लॉबिंग फ़र्म की ज़रूरत पड़ रही है.
हालांकि, विदेश मंत्रालय की फै़क्ट चेक टीम ने इस मुद्दे पर एक पत्रकार के सोशल मीडिया पोस्ट को भ्रामक बताते हुए उसका खंडन किया है.
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वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ने एक्स पर इस रिपोर्ट को साझा करते हुए लिखा, "पीएम मोदी के सबसे ज़्यादा दिनों तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्री बनने के विवादास्पद दावे वाले ट्रंप का ट्वीट, एक लॉबिंग फ़र्म को पैसे देकर कराया गया था. यह पैसा भारतीय करदाताओं का था."
इस पोस्ट को साझा करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के फ़ैक्ट चेक हैंडल से एक्स पर इसे भ्रामक बताया गया.
इसमें लिखा गया, "अमेरिका में दूतावासों और अन्य संस्थाओं द्वारा लॉबिंग फ़र्म नियुक्त करना एक सामान्य चलन है. वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास 1948 से ऐसी फ़र्मों की सेवाएं लेता रहा है. इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है. साथ ही जहां तक मर्करी पब्लिक अफ़ेयर्स एलएलसी की एफ़एआरए फ़ाइलिंग में भी स्पष्ट उल्लेख है कि उसने केवल संबंधित पोस्ट का प्रसार किया था."
द हिंदू की वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने एक्स विदेश मंत्रालय के फ़ैक्ट चेक हैंडल को साझा करते हुए लिखा, "ये कैसे भ्रामक है, क्या लॉबी फ़र्म के जरिए व्हाइट हाउस के साथ बातचीत की व्यवस्था करना सामान्य बात है?"
"सभी पूर्व राजनयिकों का कहना है कि लॉबी फ़र्म आमतौर पर (कैपिटल) हिल पर कामकाज और संपर्क साधने में मदद करती हैं, जबकि द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मामलों पर बातचीत सरकारी अधिकारियों के स्तर पर होती है."
वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिंह ने इस फ़ैक्ट चेक को ही भ्रामक करार दिया.
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विपक्षी दलों के नेताओं ने इस रिपोर्ट को मुद्दा बनाते हुए सरकार से सवाल किए हैं.
टीएमसी सांसद (ममता गुट) महुआ मोइत्रा ने कहा, "सच्चाई सामने आ गई है. जब डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अच्छी बातें ट्वीट करते हैं, तो इसकी वजह यह है कि हमने, यानी भारतीय टैक्सपेयर्स ने इसके लिए एक अमेरिकी लॉबिंग फ़र्म को पैसे दिए हैं!"
कांग्रेस के राज्य सभा सांसद पवन खेड़ा ने एक्स पर लिखा, "हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि मोदी को अपने 'दोस्त, डोनाल्ड ट्रंप' से बात करने के लिए भी एक लॉबिंग फ़र्म की ज़रूरत पड़ रही है."
"लेकिन असली बात तो यह है कि हर बार जब ट्रंप मोदी को अपना 'बहुत अच्छा दोस्त', 'सच्चा दोस्त', 'अच्छा दोस्त' या 'महान दोस्त' बताते हैं, तो इसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है. और यह कीमत मोदी भारतीय टैक्सपेयर्स के पैसे से लॉबिंग फ़र्म को भुगतान करके चुकाते हैं."
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इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें कहा गया है कि एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने अमेरिका के फ़ॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (एफ़एआरए) के तहत दाखिल दस्तावेज में कहा है कि उसने इस साल मई-जून के दौरान भारत सरकार और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच आठ फ़ोन कॉल अरेंज कराए.
इस अमेरिकी लॉबिंग फ़र्म के प्रमुख जेसन मिलर हैं.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ये बातचीत भारत-अमेरिका संबंधों पर केंद्रित थी और फ़र्म ने इन्हें "राजनीतिक गतिविधियों" का हिस्सा बताया है.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अप्रैल 2025 में जेसन मिलर की एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी के साथ अनुबंध किया था, जिसे इस साल अप्रैल में एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया.
हालांकि, 23 जून को यह अनुबंध ख़त्म हो गया क्योंकि जेसन मिलर ट्रंप प्रशासन से विशेष सरकारी कर्मचारी के रूप में जुड़ गए.
इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मई में मार्को रुबियो के भारत दौरे से पहले भारत सरकार और व्हाइट हाउस के कई वरिष्ठ अधिकारियों के बीच फ़ोन पर बातचीत कराई गई थी.
इनमें अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट, उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल नीडहम और आतंकवाद और वित्तीय ख़ुफ़िया मामलों के अवर सचिव जीन लैंगे शामिल थे.
इसके बाद जून में, मार्को रुबियो की भारत यात्रा के बाद भारत सरकार और अमेरिकी प्रशासन के बीच और भी उच्चस्तरीय संपर्क का ज़िक्र इस रिपोर्ट में है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद, वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास ने दो प्रमुख लॉबिंग फ़र्मों की सेवाएं लीं, जिनका नेतृत्व ट्रंप के क़रीबी माने जाने वाले लोगों के हाथों में था.
इनमें दूसरी फ़र्म मर्करी पब्लिक अफ़ेयर्स थी, जिसे प्रति माह 75,000 डॉलर की रिटेनरशिप पर रखा गया था.
फ़र्म की मुख्य टीम में ब्रायन लांज़ा शामिल थे, जो ट्रंप की ट्रांजिशन टीम में कम्युनिकेशंस डायरेक्टर रह चुके हैं.
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