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वज़न कम करने की कोशिश शुरू होते ही सलाहों की एक लंबी सूची सामने आ जाती है. कोई रोटी और चावल छोड़ने को कहता है, कोई इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग की सलाह देता है.
कुछ लोग भूखे रहने या केवल तरल चीज़ें लेने को वज़न घटाने का सबसे तेज़ तरीक़ा बताते हैं.
लेकिन क्या फ़िट होने के लिए पसंदीदा खाना छोड़ना और लगातार भूखे रहना ज़रूरी है? क्या वज़न कम होना और शरीर की चर्बी कम होना एक ही बात है? और अगर दोनों अलग हैं, तो यह कैसे पता चलेगा कि शरीर से वास्तव में फ़ैट कम हो रहा है या केवल मांसपेशियां और पानी?
इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी हिंदी के संपादक नितिन श्रीवास्तव ने मेडिकल डॉक्टर और फ़ूड एक्सपर्ट डॉक्टर शिखा शर्मा से बातचीत की.
डॉक्टर शिखा शर्मा कहती हैं कि वेट लॉस और फ़ैट लॉस के बीच "ज़मीन-आसमान का फ़र्क़" है.
इसे समझाने के लिए वह दो अलग-अलग तस्वीरों की कल्पना करने को कहती हैं. पहली तस्वीर ऐसे व्यक्ति की है, जिसका वज़न तो कम हो गया है, लेकिन उसकी मांसपेशियां कमज़ोर हैं, चेहरे पर चमक नहीं है और वह बीमार दिखाई देता है.
दूसरी तस्वीर ऐसे व्यक्ति की है, जिसके चेहरे पर चमक है, मांसपेशियां मज़बूत हैं और उसके उठने-बैठने के तरीक़े से शरीर की ताक़त दिखाई देती है. वह व्यक्ति केवल पतला नहीं, बल्कि फ़िट नज़र आता है.
उनके मुताबिक़, लोग आम तौर पर कहते हैं कि उन्हें अपना वज़न कम करना है. फिर वे इसके लिए ऐसे तरीक़े अपनाते हैं, जिनसे शरीर का कुल वज़न घटे. लेकिन उनकी असली इच्छा शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करके फ़िट दिखने की होती है.
वह कहती हैं, "अगर आपको फ़ैट लॉस करना है, तो फ़ैट लॉस पर ध्यान दीजिए, केवल वेट लॉस पर नहीं."
जब कोई व्यक्ति वज़न मशीन पर खड़ा होता है, तो मशीन केवल चर्बी नहीं नापती. उसमें हड्डियों, शरीर में मौजूद पानी, अंगों और मांसपेशियों का वज़न भी शामिल होता है.
डॉक्टर शर्मा फ़ैट की तुलना रुई से करती हैं. उनके मुताबिक़, फ़ैट का वज़न कम होता है, लेकिन वह शरीर में ज़्यादा जगह घेरता है. इसलिए शरीर की चर्बी में कमी जानने के लिए वह वेट मशीन के बजाय इंच टेप के इस्तेमाल की सलाह देती हैं.
यही वजह है कि कई बार किसी व्यक्ति का वज़न पहले जितना ही रहता है, लेकिन उसके कपड़े ढीले होने लगते हैं. डॉक्टर शर्मा के मुताबिक़, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि उसका फ़ैट कम हो रहा है.
वह कहती हैं, "दुनिया चाहती फ़ैट लॉस है, लेकिन करती वेट लॉस है."
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वज़न घटाने की चर्चा में कैलोरी का हिसाब लगभग हमेशा आता है. मोबाइल ऐप बताते हैं कि खाने से कितनी कैलोरी मिली और चलने या व्यायाम से कितनी ख़र्च हुई.
लेकिन डॉक्टर शर्मा कैलोरी पर किसी ख़ास तरीक़े से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि केवल खाने की मात्रा और कैलोरी कम करने से शरीर की चर्बी के साथ मांसपेशियां भी कम हो सकती हैं. इससे व्यक्ति कमज़ोर दिखाई दे सकता है और वैसा ही महसूस भी कर सकता है.
वह कैलोरी की अवधारणा के इतिहास को स्टीम इंजन से जोड़ती हैं. उनके मुताबिक़, उस समय यह समझने की कोशिश की गई थी कि कोयला जलाने से कितनी ऊर्जा मिलती है. बाद में भोजन और शरीर को भी इसी तरह देखने की कोशिश हुई.
डॉक्टर शर्मा का तर्क है कि स्टीम इंजन में ईंधन जलने और शरीर में भोजन के ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है. शरीर में भोजन के बदलने की प्रक्रिया को मेटाबॉलिज़्म कहा जाता है, जबकि इंजन में ईंधन जलने की प्रक्रिया अलग है.
वह एक उदाहरण देती हैं. अगर किसी व्यक्ति को तय कैलोरी के भीतर केवल आइसक्रीम या हॉट चॉकलेट फ़ज दे दिया जाए, तो केवल कैलोरी कम होने से वह स्वस्थ तरीक़े से फ़ैट कम नहीं कर पाएगा. उनके मुताबिक़, लंबे समय तक सफल रहने के लिए खाने की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता और शरीर की ज़रूरतों को समझना भी ज़रूरी है.
डॉक्टर शर्मा शरीर की चर्बी को समझाते हुए त्वचा के नीचे जमा फ़ैट और अंगों के आसपास जमा होने वाले विसरल फ़ैट के बीच अंतर करती हैं.
त्वचा के नीचे मौजूद फ़ैट से चेहरा और शरीर भरा हुआ दिखाई दे सकता है. वहीं, विसरल फ़ैट शरीर के अंदरूनी अंगों के आसपास जमा होता है. इसमें किसी व्यक्ति के हाथ-पैर पतले हो सकते हैं, लेकिन पेट बाहर निकला दिखाई देता है.
उनके मुताबिक़, पेट के आसपास जमा होने वाला यह अंदरूनी फ़ैट सेहत के लिए ज़्यादा ख़तरनाक है. वह इसे दिल की बीमारी, डायबिटीज़ और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से जोड़ती हैं.
उनका कहना है कि शरीर में फ़ैट किस जगह जमा होगा, इसमें व्यक्ति की शारीरिक बनावट और डीएनए की भूमिका हो सकती है. इसके अलावा वह आंतों की सेहत, लिवर और हार्मोन को भी अहम मानती हैं.
महिलाओं में हार्मोन समय के साथ बदलते रहते हैं. वहीं पुरुषों में मांसपेशियों की मात्रा कम होने के साथ हार्मोन और शरीर में फ़ैट जमा होने का तरीक़ा बदल सकता है.
बातचीत के दौरान नितिन श्रीवास्तव ने नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि क़रीब 30 प्रतिशत महिलाओं और 27 प्रतिशत पुरुषों में ज़्यादा वज़न की समस्या दर्ज की गई है.
डॉक्टर शर्मा इसे गंभीर स्थिति मानती हैं. उनका कहना है कि अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो डायबिटीज़, दिल और किडनी से जुड़ी बीमारियों का बोझ बढ़ सकता है.
वह खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों, कीटनाशकों, रिफ़ाइंड तेल और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए तैयार किए गए प्रोसेस्ड भोजन को भी बढ़ती समस्या की वजहों में गिनती हैं.
उन्होंने पैक्ड फ़्रेंच फ़्राइज़, सलामी, सॉसेज, कोल्ड ड्रिंक और एनालॉग पनीर जैसे उदाहरण दिए. उनका कहना है कि केवल यह देखना काफ़ी नहीं है कि कोई व्यक्ति कितना खा रहा है. यह देखना भी ज़रूरी है कि वह किस तरह का भोजन कर रहा है.
यह वज़न घटाने वालों के सबसे आम सवालों में से एक है. रोटी और चावल छोड़ने की सलाह इतनी बार दी जाती है कि कई लोगों को लगता है कि इनके रहते फ़ैट कम करना संभव ही नहीं है.
लेकिन डॉक्टर शर्मा का सीधा जवाब है, "रोटी-चावल छोड़िए नहीं, उन्हें बदल दीजिए."
वह कहती हैं कि रोटी के लिए ऐसे आटे का इस्तेमाल किया जाए, जिसमें चोकर मौजूद हो. गेहूं के साथ जौ, बाजरा या चने का आटा मिलाया जा सकता है. उनके मुताबिक़, इससे रोटी में प्रोटीन और पोषण बढ़ सकता है.
उनका कहना है कि गेहूं शरीर में जाकर शुगर बढ़ा सकता है. इसलिए रोटी पूरी तरह बंद करने के बजाय उसके आटे में बदलाव किया जा सकता है.
चावल के मामले में वह पॉलिश किए हुए चावल के बजाय बिना पॉलिश वाला और पुराना चावल इस्तेमाल करने की सलाह देती हैं. उनका कहना है कि आयुर्वेद में पुराने चावल को नए चावल से बेहतर बताया गया है. उनके मुताबिक़, नया चावल शरीर में पानी और गैस बढ़ा सकता है, जबकि पुराने चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम हो जाता है.
वह इसे कच्चे और पके फल के अंतर से समझाती हैं. जैसे कच्चे आम और पके आम का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही समय के साथ चावल में भी बदलाव आता है.
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"नाश्ता राजा की तरह, दोपहर का खाना रानी की तरह और रात का खाना ग़रीब की तरह"—डॉक्टर शर्मा इस पुरानी बात को सही मानती हैं.
उनके मुताबिक़, शरीर की पाचन शक्ति सुबह शुरू होती है, दोपहर के आसपास अपने सबसे अच्छे स्तर पर पहुंचती है और फिर सूरज ढलने के साथ धीरे-धीरे कम होती जाती है.
वह सुबह कुछ हल्का लेने, उसके बाद नाश्ता करने और दोपहर का भोजन 12 से एक बजे के बीच करने की बात कहती हैं. शाम में भूख लगे तो मूंगफली या भुना चना लिया जा सकता है और रात का खाना सात बजे तक खाने की कोशिश की जानी चाहिए.
उनका कहना है कि देर हो जाने पर रात में भारी भोजन करने के बजाय कुछ हल्का लेना बेहतर है. हालांकि सात या आठ बजे के बाद हर चीज़ पूरी तरह बंद करना ज़रूरी नहीं है. उनके मुताबिक़, इस समय ऐसा भारी भोजन नहीं करना चाहिए, जिससे शरीर पर ज़्यादा दबाव पड़े.
डॉक्टर शर्मा कहती हैं कि आज कई लोग सुबह ठीक से नहीं खाते. वे बिस्कुट जैसे प्रोसेस्ड और रिफ़ाइंड खाद्य पदार्थ लेते रहते हैं. दोपहर का खाना दो या तीन बजे और रात का खाना 11 बजे खाते हैं. उनके मुताबिक़, यह शरीर की स्वाभाविक लय के उलट है.
डॉक्टर शर्मा यह भी कहती हैं कि हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट अलग होती है. जो खाना एक व्यक्ति के लिए ठीक है, ज़रूरी नहीं कि वही दूसरे के लिए भी ठीक हो.
फिर भी वह दिन की शुरुआत हर्बल पेय से करने का सुझाव देती हैं. इसमें तुलसी, अदरक, दालचीनी, इलायची और सौंफ़ का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके बाद चाय या कॉफ़ी ली जा सकती है.
वह सुबह फल खाने और दिन में कम से कम एक फल लेने की बात कहती हैं. नाश्ते में बहुत सारी चीज़ें रखने के बजाय दो चीज़ें अच्छी तरह खाने की सलाह देती हैं.
नाश्ते में मूंगफली वाला पोहा, बेसन या मूंग दाल का चीला, सब्ज़ी भरा परांठा, इडली, रागी की इडली, ढोकला या उबला चना लिया जा सकता है.
दोपहर के भोजन में मल्टीग्रेन रोटी, एक हरी पत्तेदार सब्ज़ी और एक दूसरी सब्ज़ी रखी जा सकती है. आटा दाल से गूंधने का विकल्प भी उन्होंने बताया.
शाम को भुना चना या मूंगफली ली जा सकती है. रात का खाना सूप से शुरू करने की बात कहते हुए वह बताती हैं कि इससे बहुत तेज़ भूख के कारण ज़रूरत से ज़्यादा खाने से बचा जा सकता है.
वह खीरा, ककड़ी और टमाटर जैसी कच्ची चीज़ें खाने पर भी ज़ोर देती हैं. इनके अलावा सेब, चुकंदर और गाजर की स्मूदी का उदाहरण देते हुए वह कहती हैं कि यह दिल, आंतों और लिवर के लिए अच्छी हो सकती है.
डॉक्टर शर्मा बार-बार स्पष्ट करती हैं कि बातचीत केवल वज़न नहीं, फ़ैट कम करने के बारे में है.
उनके मुताबिक़, शुरुआत में खाने-पीने में बदलाव करने से फ़ैट घटाने में जल्दी फ़र्क़ दिखाई दे सकता है. लेकिन लंबे समय तक इसे बनाए रखने के लिए व्यायाम ज़रूरी है.
वह कहती हैं कि व्यायाम से मांसपेशियां मज़बूत होती हैं और शरीर का मेटाबॉलिज़्म सुस्त से सक्रिय होता है. केवल व्यायाम करके समोसा-कचौड़ी खाते रहने या केवल खाना बदलकर बिना किसी गतिविधि के फ़िट रहने की सोच, दोनों ही ग़लत हैं.
दस हज़ार क़दम चलने के बारे में उनका कहना है कि चलना शरीर की सबसे सामान्य गतिविधियों में से एक है. यह लक्ष्य आसान है और अधिकतर लोगों के लिए हानिकारक भी नहीं है.
वह जिम, एरोबिक्स और योग करने से मना नहीं करतीं. लेकिन उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति इनमें से कुछ नहीं कर पा रहा, तो उसे कम से कम दस हज़ार क़दम चलने की कोशिश करनी चाहिए.
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डॉक्टर शर्मा धीरे-धीरे और लगातार होने वाले वज़न में बदलाव को बेहतर मानती हैं. उनके मुताबिक़, तेज़ी से वज़न घटाने पर सबसे पहले मांसपेशियां कम हो सकती हैं, जिन्हें दोबारा बनाना आसान नहीं होता.
वह कहती हैं कि तेज़ी से वज़न घटाने वाले कुछ लोगों में उन्होंने किडनी या गॉल ब्लैडर में पथरी की समस्या देखी है. उनका कहना है कि कम उम्र में शरीर एक बार तेज़ बदलाव संभाल सकता है, लेकिन इसे बार-बार दोहराने से शरीर को नुक़सान पहुंच सकता है.
इसलिए वह भोजन की गुणवत्ता सुधारने, सही तरह का खाना चुनने और शारीरिक गतिविधि बढ़ाने की सलाह देती हैं. उनके मुताबिक़, यही तरीक़ा बढ़ती उम्र तक शरीर का साथ दे सकता है.
डॉक्टर शर्मा इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग को वज़न घटाने का "शर्तिया इलाज" मानने से सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है कि लोग 16 घंटे भूखे रहने के बाद कॉफ़ी, तेज़ चाय, तला हुआ भोजन, रिफ़ाइंड खाना या सैंडविच खाकर उपवास तोड़ते हैं. इससे शरीर को पहले भूखा रखने और फिर जंक फ़ूड देने जैसा झटका लगता है.
वह कहती हैं कि अलग-अलग संस्कृतियों में उपवास हल्की चीज़ों से तोड़ा जाता है. इनमें खजूर, नारियल पानी, नींबू पानी या फल शामिल हो सकते हैं.
उनके मुताबिक़, ग़लत तरीक़े से की गई इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग से मांसपेशियां कम हो सकती हैं, नतीजे कुछ समय के लिए मिल सकते हैं और बाद में निराशा हो सकती है.
यही बात वह सप्ताह के पांच दिन बहुत सख़्त डाइट और फिर सप्ताहांत में बहुत ज़्यादा खाने पर भी कहती हैं. कभी शादी या त्योहार में थोड़ा ज़्यादा खा लेने को वह समस्या नहीं मानतीं. लेकिन इसे हर सप्ताह की आदत बनाना शरीर को बार-बार झटका देना है.
वह इसकी तुलना बदलते मौसम से पत्थर टूटने के साथ करती हैं. उनके मुताबिक़, शरीर के साथ दो बिल्कुल विपरीत छोरों पर जाने के बजाय संतुलन बनाए रखना चाहिए.
डॉक्टर शर्मा सबसे पहले घर के माहौल को बदलने की बात कहती हैं. वह फ़्रिज में सलाद और फल रखने तथा चॉकलेट और मिठाइयों के डिब्बे घर से हटाने की सलाह देती हैं. उनका कहना है कि लुभाने वाली चीज़ें सामने होंगी, तो अनुशासन बनाए रखना मुश्किल होगा.
दूसरी प्राथमिकता शरीर में पानी की कमी न होने देना है. पानी के अलावा हर्बल पेय, नींबू पानी या नारियल पानी लिया जा सकता है. वह अपने साथ पानी की बोतल रखने और हर घंटे थोड़ा पानी पीने की बात कहती हैं.
उनका कहना है कि कई बार शरीर को पानी की ज़रूरत होती है, लेकिन व्यक्ति इसे भूख समझकर चिप्स या चॉकलेट खाने लगता है.
तीसरी बात, खाने को सज़ा या तपस्या न बनाया जाए. मीठा खाने की इच्छा हो तो अंजीर, किशमिश, आम या स्वाभाविक रूप से मीठे दूसरे विकल्प रखे जा सकते हैं.
वह कहती हैं कि केवल उबली हुई तोरी या लौकी जैसा बेस्वाद खाना लंबे समय तक नहीं चल पाएगा. खाना स्वादिष्ट होना चाहिए, लेकिन स्वाद का मतलब केवल चॉकलेट और चिप्स नहीं है.
डॉक्टर शर्मा के मुताबिक़, डाइट का अर्थ कम खाना नहीं, बल्कि एक तय और व्यवस्थित तरीक़े से खाना है.
उनका संदेश है, "खाने को तपस्या मत बनाइए."
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