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इसराइल में अरब पार्टियों के चुनाव लड़ने पर क्यों लगा बैन, जानिए कौन हैं वहाँ के अरब नागरिक

Ajay Tiwari
29 September 2026 • 0 • 45
इसराइल में अरब पार्टियों के चुनाव लड़ने पर क्यों लगा बैन, जानिए कौन हैं वहाँ के अरब नागरिक

इमेज स्रोत, Jalaa MAREY / AFP via Getty Images

इसराइल की सेंट्रल इलेक्शन कमिटी (सीईसी) ने संसदीय चुनाव से पहले देश की प्रमुख अरब राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लड़ने से रोकने के पक्ष में मतदान किया है.

यह फ़ैसला बिन्यामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों की ओर से दायर याचिकाओं के बाद आया है.

सीईसी ने जिन पॉलिटिकल ग्रुप्स को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने के पक्ष में मतदान किया है, उनमें जॉइंट लिस्ट और राम (यूनाइटेड अरब लिस्ट) पार्टी शामिल हैं.

इसके अलावा प्रमुख अरब नेता सामी अबू शहादेह और अरब-यहूदी पार्टी हदाश के वामपंथी नेता ओफ़र कासिफ़ को भी चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने का फ़ैसला किया गया है.

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब चुनावी सर्वेक्षणों में किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल को 120 सदस्यीय क्नेसेट में बहुमत के लिए ज़रूरी 61 सीटें मिलती हुई नहीं दिखाई दे रही हैं.

ऐसे में अरब पार्टियों की भूमिका चुनाव के बाद सरकार बनाने में महत्वपूर्ण हो सकती है.

इसराइल के मौजूदा क्नेसेट चुनाव क़ानून के तहत किसी राजनीतिक पार्टी, 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नागरिक या अटॉर्नी जनरल को किसी पार्टी या उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग करते हुए सीईसी में याचिका दायर करने का अधिकार है. सीईसी के सदस्यों के 51 प्रतिशत बहुमत से ऐसी याचिका को मंज़ूरी दी जा सकती है.

इसराइल के बेसिक लॉ के आर्टिकल 7A के तहत किसी पार्टी या उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, अगर उसके उद्देश्य या गतिविधियां इसराइल को यहूदी और लोकतांत्रिक राज्य के रूप में नकारती हों.

इसके अलावा नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा देने या इसराइल के ख़िलाफ़ किसी दुश्मन देश या 'आतंकवादी संगठन के सशस्त्र संघर्ष' का समर्थन करने के आधार पर भी अयोग्य ठहराया जा सकता है.

अरब पार्टियों और संबंधित उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं में इन्हीं प्रावधानों का हवाला दिया गया है.

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हालांकि, अरब नेताओं और फ़ैसले के आलोचकों का कहना है कि यह क़दम राजनीतिक रूप से प्रेरित है और इसका उद्देश्य अरब मतदाताओं की राजनीतिक आवाज़ को कमज़ोर करना है. उनका दावा है कि इससे चुनाव में दक्षिणपंथी खेमे को फ़ायदा हो सकता है.

राम पार्टी के अध्यक्ष मंसूर अब्बास ने इस क़दम को "राजनीति से प्रेरित, अवैध और अलोकतांत्रिक" करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य ऐसी सरकार के गठन को रोकना है, जो नेतन्याहू की सरकार की जगह ले सकती है.

अमेरिका के वरिष्ठ नेता और डेमोक्रेटिक पार्टी से सीनेटर बर्नी सैंडर्स का मानना है कि अरब पार्टियों को बैन कर नेतन्याहू ने फ़लस्तीनी नागरिकों की आवाज़ दबाई है.

बर्नी ने एक्स पर लिखा, "इसराइल की चुनाव समिति ने चुनाव से चार हफ़्ते पहले दोनों प्रमुख अरब पार्टियों पर रोक लगा दी. नेतन्याहू और उनके कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी ऐसा इसराइल चाहते हैं, जहाँ फ़लस्तीनी नागरिकों की आवाज़ न हो. इसराइल को अमेरिका की सैन्य मदद अब और नहीं करनी चाहिए."

हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ़ यरुशलम के लॉ फ़ैकल्टी के प्रोफ़ेसर बराक मेदिना ने सोमवार को कहा कि इस प्रावधान का मक़सद सज़ा देना नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित जोखिम को रोकना है.

मेदिना ने द यरुशलम पोस्ट से बातचीत में यह भी तर्क दिया कि उपलब्ध सबूत किसी भी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने के लिए ज़रूरी मानक को पूरा नहीं करते.

उनके मुताबिक़, अगर उम्मीदवार बार-बार ऐसा रुख अपनाता है, जिसके आधार पर उसे बैन किया जा सकता है, तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा सबूतों से ऐसा साबित नहीं होता.

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सीईसी के फ़ैसले से प्रभावित दो प्रमुख राजनीतिक समूहों में पहला जॉइंट लिस्ट है. यह हदाश, बालाद और ताअल पार्टियों का गठबंधन है.

इन पार्टियों को मुख्य रूप से इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिकों का समर्थन मिलता है. ये आबादी देश की कुल आबादी का क़रीब पांचवां हिस्सा है.

जॉइंट लिस्ट में शामिल हदाश वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है, जिसमें यहूदी और अरब दोनों समुदायों के सदस्य हैं. ताअल मुख्य रूप से इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिकों के अधिकारों की वकालत करती है, जबकि बालाद सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों वाले राज्य की मांग करती है.

तीनों पार्टियों ने इस चुनाव में एक ही सूची के तहत मैदान में उतरने पर सहमति जताई है. इसका मतलब है कि चुनावी बैलेट पर तीनों दलों के उम्मीदवार एक ही सूची में होंगे.

मौजूदा 120 सदस्यीय नेसेट में हदाश-ताअल गठबंधन के पास पांच सीटें हैं. इनमें तीन सीटें हदाश के नेताओं के पास हैं, जबकि दो सीटों पर ताअल के नेता हैं. वहीं, बालाद के पास फ़िलहाल क्नेसेट में कोई सीट नहीं है.

हालांकि, हालिया चुनावी सर्वेक्षणों में जॉइंट लिस्ट की सीटों में बढ़ोतरी के संकेत मिले थे. कान 11 और चैनल 12 जैसे सर्वेक्षणों में गठबंधन को क़रीब 7 से 8 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था.

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मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम पार्टी इस बार अलग से चुनाव लड़ रही है.

2021 से 2022 के बीच बनी इसराइल की गठबंधन सरकार में राम भी शामिल थी. पार्टी का मुख्य समर्थन अरब और मुस्लिम मतदाताओं के बीच रहा है.

ब्रिटानिका एन्साइक्लोपीडिया, राम की विचारधारा का संबंध इस्लाम से प्रेरित राजनीतिक आंदोलन से रहा है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने धार्मिक और सामाजिक मुद्दों के बजाय इसराइल के अरब नागरिकों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ज़्यादा ज़ोर दिया है.

2025 में पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने कहा था कि राम इस्लामी संगठनों के साथ अपने औपचारिक संबंध ख़त्म करेगी. इसका उद्देश्य पार्टी को इसराइल की यहूदी आबादी के बीच भी अधिक स्वीकार्य बनाना था.

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को पारंपरिक रूप से दक्षिणपंथी और यहूदी मतदाताओं के बीच समर्थन मिलता रहा है. ऐसे मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश के तहत राम ने अपनी चुनावी सूची में योव सेगालोविट्ज़ को दूसरे स्थान पर रखा.

सेगालोविट्ज़ यहूदी हैं और खुद को मुख्यधारा के जियोनिस्ट विचारों का समर्थक मानते हैं. वह इसराइल के यहूदी और अरब समुदायों के बीच बराबरी की साझेदारी की ज़रूरत पर ज़ोर देते रहे हैं.

मौजूदा क्नेसेट में राम के पास पांच सीटें हैं. चुनाव से पहले आए सर्वेक्षणों में भी पार्टी को क़रीब 5 से 6 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था.

वहीं, सर्वे में किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल को बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें मिलती हुई नहीं दिखाई दे रही थीं. ऐसे में राम जैसी पार्टियों की भूमिका सरकार बनाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती थी.

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मार्च 2021 के चुनाव में भी किसी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. उस समय राम के पास चार सीटें थीं. पार्टी ने दक्षिणपंथी नेता बेनेट बेनेट और येर लैपिड के साथ गठबंधन किया था.

राम के समर्थन से बनी इस गठबंधन सरकार के गठन के बाद नेतन्याहू की क़रीब 12 साल से चली आ रही लगातार सत्ता का दौर ख़त्म हुआ था.

हालांकि, यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सका और दिसंबर 2022 में सरकार गिर गई. इसके बाद दोबारा चुनाव हुए.

चुनाव से पहले आए सर्वेक्षणों के मुताबिक़ अरब दलों को कुल मिलाकर क़रीब 12 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था. क्नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटों की ज़रूरत होती है.

ऐसे में अरब दलों के पास संभावित 12 सीटें सरकार बनाने के लिए ज़रूरी आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती थीं.

यही वजह है कि सीईसी के फ़ैसले के बाद अरब पार्टियों के चुनाव से बाहर होने की स्थिति का असर सिर्फ़ इन दलों और उनके समर्थकों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसका असर क्नेसेट की अगली तस्वीर और सरकार बनाने की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है.

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इसराइली कानून के अनुसार, चुनाव समिति का यह निर्णय अंतिम नहीं है. राजनीतिक दलों और नेताओं को इस प्रतिबंध के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है. वहीं, व्यक्तिगत अयोग्यता के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी अनिवार्य होती है.

मानवाधिकार संगठन 'अदाला' और संबंधित पार्टियों ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर अदालत आने वाले दिनों में सुनवाई और समीक्षा करेगी.

जॉइंट लिस्ट के वरिष्ठ सांसद अहमद तिबी ने फैसले को नस्लवादी और अलोकतांत्रिक बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस बार अरब मतदाता बड़ी संख्या में मतदान करेंगे.

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले उदाहरणों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट इस बैन को ख़ारिज भी कर सकता है.

2019 और 2022 में भी अरब पार्टियों को चुनाव से बाहर करने के ऐसे फैसले सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिए थे.

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बहुसंख्यक अरब लोग उन लोगों के वंशज हैं, जो 1948 के अरब-इसराइल युद्ध के बाद इसराइल की ओर से घोषित सीमाओं के भीतर रह गए थे. इसराइल का गठन ब्रिटिश मैंडेट ऑफ फ़लस्तीन से हुआ था, जहाँ उस समय क़रीब 12 लाख अरब रहते थे.

अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरन रिलेशन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''इनमें से सात लाख से ज़्यादा लोगों को निष्कासित कर दिया गया या वे वहाँ से चले गए, जिसे अरब लोग नकबा यानी तबाही कहते हैं. इसके बाद क़रीब 1.5 लाख अरब उस क्षेत्र में रह गए, जो बाद में इसराइल बना. वे स्वतः इसराइल के नागरिक बन गए और उस समय इसराइल की आबादी में उनकी हिस्सेदारी क़रीब आधी थी. यहूदी नागरिकों के उलट, इसराइल के अरब नागरिकों को 1966 तक सैन्य शासन के अधीन रखा गया था.''

''एक साल बाद, इसराइल ने पूर्वी यरुशलम को अपने में मिला लिया और वहाँ रहने वाले लाखों अरब लोगों को इसराइली नागरिकता की पेशकश की, लेकिन उनमें से अधिकांश ने इसे स्वीकार नहीं किया. संयुक्त राष्ट्र इस क्षेत्र को क़ब्ज़े वाला फ़लस्तीनी क्षेत्र मानता है. आज वहाँ रहने वाले अरब लोगों की गिनती इसराइल और फ़लस्तीन, दोनों की जनगणनाओं में होती है और उनमें से बहुत कम लोग इसराइल के नागरिक हैं.''

इसराइली अख़बार यरुशलम पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''अरब नागरिक इसराइल की आबादी का 21 प्रतिशत और मतदान के योग्य लोगों का क़रीब 17 प्रतिशत हैं. उनकी चुनावी क्षमता अहम है. सही परिस्थितियों में अरब मतदाता यह तय कर सकते हैं कि अगली सरकार किस राजनीतिक गठबंधन की बनेगी.''

आज इसराइल की आबादी का क़रीब 21 प्रतिशत अरब है, यानी लगभग 20 लाख लोग. इनमें पूर्वी यरुशलम में रहने वाले कुछ लाख लोगों को छोड़कर सभी इसराइल के नागरिक हैं. पूर्वी यरुशलम के ये लोग स्थायी निवासी हैं और इस दर्जे के तहत उन्हें नागरिकों की तुलना में कम अधिकार हासिल हैं. अरब नागरिकों में बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमान हैं.

हालांकि बड़ी संख्या में ईसाई और द्रूज समुदाय के लोग भी हैं. द्रूज समुदाय के लोग अपेक्षाकृत अधिक संख्या में अपनी पहचान इसराइली के रूप में स्वीकार करते हैं.

इन लोगों का इतिहास, संस्कृति और पारिवारिक संबंध वेस्ट बैंक, ग़ज़ा और पूर्वी यरुशलम में रहने वाले फ़लस्तीनी अरबों के साथ-साथ जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और अन्य देशों में रहने वाले फ़लस्तीनी प्रवासी समुदायों से जुड़े हैं.

इसराइली सरकार के दस्तावेज़ और मीडिया अरब नागरिकों को "अरब" या "इसराइली अरब" कहते हैं और कुछ अरब लोग भी अपने लिए इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. ग्लोबल न्यूज़ मीडिया भी आमतौर पर इसी तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करता है, ताकि इन लोगों को फ़लस्तीनी क्षेत्रों में रहने वाले अरबों से अलग किया जा सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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बेटे आनंद को चुनाव में मौका मिलेगा, वेट-योर-टर्न विल कम • यूपी में 543 में से केवल 73 किसानों को मिली सरकारी मदद, मत्स्य पालन KCC योजना का चौंकाने वाला हाल • LPU और Chitkara पर कैंपस हादसों के बाद अफवाहें और विवाद • भारत‑वेस्टइंडीज टी‑20 मुकाबला लखनऊ में, टिकट कीमतों में कटौती से बिक्री तेज़ • सिलिंडर, बैटरी या बारूद? भरभराकर गिरी दो मंजिला छत; मलबे से निकलीं पांच लाशें, देखें तस्वीरें • टैरिफ के बिना भी Essar का स्टील प्लांट क्यों बना? हॉवर्ड लटनिक का खुलासा • विभागीय अवॉर्ड विवाद, अधिकारी पर सजा और शहर की राजनीतिक कलह • आरसीए की नई टीम की कमान किसके हाथ?: आज 38 मतदाता करेंगे फैसला, छह पदों पर सीधी भिड़ंत • उरी हमले के बाद कैसे एलओसी पार कर भारतीय सेना ने आतंकी ठिकानों को किया तबाह, 10 साल पहले क्या हुआ? • उज्जैन में महाकुंभ सिंहस्थ 2028 की तैयारियों में 12 धार्मिक स्थल हटाए, कई प्राचीन मंदिर 9 फ़ुट पीछे शिफ्ट • क्या आज फिर शेयर बाजार में मचेगी तबाही? • बारिश, वायुसेना में F‑35A का पहला परिचय, HAL बाहर, FBI ने गोल्डी बराड़ को टेन मोस्ट वांटेड में जोड़ा • राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चयन में मसला, स्मृति इरानी, हरीश द्विवेदी को भी मौका • IIT मुंबई में आरक्षित वर्ग के छात्रों पर भेदभाव: छात्र आंदोलन और आत्महत्या के बाद उठे सवाल • हरियाणा में हर 43 मिनट में हृदय रोग से एक मौत, सात साल में 85,539 लोगों की मृत्यु; 2021‑22 में सबसे अधिक • विदेशी फंडों ने दो साल में निकाला ₹3.84 लाख करोड़, भारत की तेज़ी पर अब नहीं टिकते • 18 वर्ष की उम्र में सहपाठी का कत्ल: खोपड़ी का टुकड़ा जेब में, अब 30 साल बाद फांसी की सजा लागू • यूपी में चक्रवात के बाद मानसून समाप्त, अगले सप्ताह में तापमान आठ डिग्री तक बढ़ेगा • गोल्डी बराड़ को अमेरिका ने मोस्ट वॉन्टेड अपराधियों की सूची में नामित किया • अगरा पुलिस ने युवक को मौत के मुंह से बचाया, कुछ ही मिनटों में जान बचाई • लखनऊ में हार्ट ट्रांसप्लांट अब 15 लाख में, केजीएमयू में जल्द शुरू होने वाली सेवा • राधा मेडिकल स्टोर पर नकली एआरवी दवाओं के व्यापार की जांच, दवा बिक्री पर रोक • अमेरिका का सख्त संदेश: विदेश में फंसे बच्चों की वापसी में देरी होने पर वीजा पर प्रतिबंध • मुख्य चुनाव आयुक्त के घर पर कालिख लगाई, कांग्रेस तैयार है अंजाम भुगतने के लिए • उज्जैन में शाही मस्जिद को गिराने वाले AI वीडियो से भीड़ जुटी, पुलिस ने की कार्रवाई • बिहार के एसकेएमसीएच में भोजन पर बवाल: विधायक ने जले‑गीले चावल देख उठाई फटकार • यूएई ने इसराइली पीएम नेतन्याहू के 'गोपनीय' दौरे की पुष्टि की • सपा 3 नामांकन पत्र खरीदेगी, BJP में स्मृति ईरानी‑कौशल किशोर के उम्मीदवारों पर चर्चा • राजस्थान में बारिश का आखिरी दौर: आज तीन संभागों में मेघगर्जन के साथ बौछारें, तेज हवाओं के बाद बढ़ेगी गर्मी • होटल के कमरे का दरवाज़ा बंद, अंदर का दृश्य चौंकाने वाला, बिहार की महिला का शव मिला • 308 पहियों का ‘महाबली’ ट्रक: रस्तों पर संघर्ष, 20 किमी/दिन की धीमी गति • इसराइल में अरब पार्टियों के चुनाव लड़ने पर क्यों लगा बैन, जानिए कौन हैं वहाँ के अरब नागरिक • द वन' ने 'पैराडाइज' को पीछे छोड़ा, 'हनुमान अंश' ने 400 करोड़ का आंकड़ा पार किया • निधि तिवारी केस में नई दावे: शादीशुदा इंजीनियर से रिश्ते और ब्लूटूथ निगरानी का आरोप • राहुल ने DUSU चुनाव पर कन्हैया से पूछा: जीत के करीब थे, फिर क्या हुआ? • यमन के ताइज़ में युद्ध के बीच जनजीवन की वास्तविकता • पुरुष क्रिकेट में क्वार्टर फाइनल रद्द, अंतिम चार टीमों का निर्धारण बारिश से • शेयर बाजार में फिर धड़ाम, सेंसेक्स ने खुलते ही 600 अंक का गिरावट दर्ज किया • भारत ने सोमवार को 8 पदक जीते, एथलेटिक्स और शूटिंग में सफलता • एशियन गेम्स 2026 में भारत‑पाकिस्तान फाइनल की दुविधा, बांग्लादेश का बड़ा रोल • बेटे आनंद को चुनाव में मौका मिलेगा, वेट-योर-टर्न विल कम • यूपी में 543 में से केवल 73 किसानों को मिली सरकारी मदद, मत्स्य पालन KCC योजना का चौंकाने वाला हाल • LPU और Chitkara पर कैंपस हादसों के बाद अफवाहें और विवाद • भारत‑वेस्टइंडीज टी‑20 मुकाबला लखनऊ में, टिकट कीमतों में कटौती से बिक्री तेज़ • सिलिंडर, बैटरी या बारूद? भरभराकर गिरी दो मंजिला छत; मलबे से निकलीं पांच लाशें, देखें तस्वीरें • टैरिफ के बिना भी Essar का स्टील प्लांट क्यों बना? हॉवर्ड लटनिक का खुलासा • विभागीय अवॉर्ड विवाद, अधिकारी पर सजा और शहर की राजनीतिक कलह • आरसीए की नई टीम की कमान किसके हाथ?: आज 38 मतदाता करेंगे फैसला, छह पदों पर सीधी भिड़ंत • उरी हमले के बाद कैसे एलओसी पार कर भारतीय सेना ने आतंकी ठिकानों को किया तबाह, 10 साल पहले क्या हुआ? • उज्जैन में महाकुंभ सिंहस्थ 2028 की तैयारियों में 12 धार्मिक स्थल हटाए, कई प्राचीन मंदिर 9 फ़ुट पीछे शिफ्ट • क्या आज फिर शेयर बाजार में मचेगी तबाही? • बारिश, वायुसेना में F‑35A का पहला परिचय, HAL बाहर, FBI ने गोल्डी बराड़ को टेन मोस्ट वांटेड में जोड़ा • राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चयन में मसला, स्मृति इरानी, हरीश द्विवेदी को भी मौका • IIT मुंबई में आरक्षित वर्ग के छात्रों पर भेदभाव: छात्र आंदोलन और आत्महत्या के बाद उठे सवाल • हरियाणा में हर 43 मिनट में हृदय रोग से एक मौत, सात साल में 85,539 लोगों की मृत्यु; 2021‑22 में सबसे अधिक • विदेशी फंडों ने दो साल में निकाला ₹3.84 लाख करोड़, भारत की तेज़ी पर अब नहीं टिकते • 18 वर्ष की उम्र में सहपाठी का कत्ल: खोपड़ी का टुकड़ा जेब में, अब 30 साल बाद फांसी की सजा लागू • यूपी में चक्रवात के बाद मानसून समाप्त, अगले सप्ताह में तापमान आठ डिग्री तक बढ़ेगा • गोल्डी बराड़ को अमेरिका ने मोस्ट वॉन्टेड अपराधियों की सूची में नामित किया • अगरा पुलिस ने युवक को मौत के मुंह से बचाया, कुछ ही मिनटों में जान बचाई • लखनऊ में हार्ट ट्रांसप्लांट अब 15 लाख में, केजीएमयू में जल्द शुरू होने वाली सेवा • राधा मेडिकल स्टोर पर नकली एआरवी दवाओं के व्यापार की जांच, दवा बिक्री पर रोक • अमेरिका का सख्त संदेश: विदेश में फंसे बच्चों की वापसी में देरी होने पर वीजा पर प्रतिबंध • मुख्य चुनाव आयुक्त के घर पर कालिख लगाई, कांग्रेस तैयार है अंजाम भुगतने के लिए • उज्जैन में शाही मस्जिद को गिराने वाले AI वीडियो से भीड़ जुटी, पुलिस ने की कार्रवाई • बिहार के एसकेएमसीएच में भोजन पर बवाल: विधायक ने जले‑गीले चावल देख उठाई फटकार • यूएई ने इसराइली पीएम नेतन्याहू के 'गोपनीय' दौरे की पुष्टि की • सपा 3 नामांकन पत्र खरीदेगी, BJP में स्मृति ईरानी‑कौशल किशोर के उम्मीदवारों पर चर्चा • राजस्थान में बारिश का आखिरी दौर: आज तीन संभागों में मेघगर्जन के साथ बौछारें, तेज हवाओं के बाद बढ़ेगी गर्मी • होटल के कमरे का दरवाज़ा बंद, अंदर का दृश्य चौंकाने वाला, बिहार की महिला का शव मिला • 308 पहियों का ‘महाबली’ ट्रक: रस्तों पर संघर्ष, 20 किमी/दिन की धीमी गति • इसराइल में अरब पार्टियों के चुनाव लड़ने पर क्यों लगा बैन, जानिए कौन हैं वहाँ के अरब नागरिक • द वन' ने 'पैराडाइज' को पीछे छोड़ा, 'हनुमान अंश' ने 400 करोड़ का आंकड़ा पार किया • निधि तिवारी केस में नई दावे: शादीशुदा इंजीनियर से रिश्ते और ब्लूटूथ निगरानी का आरोप • राहुल ने DUSU चुनाव पर कन्हैया से पूछा: जीत के करीब थे, फिर क्या हुआ? 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