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क्या आपने कभी सोचा है कि इंसान के सिर का वज़न गर्दन पर कितना दबाव डालता है?
लंदन के क्वीन हॉस्पिटल में ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस यानी एनएचएस के रीढ़ की हड्डी के विशेषज्ञ न्यूरोसर्जन एंथनी घोष बताते हैं कि जब आप सीधे बैठते या खड़े होते हैं, तो सिर की वजह से गर्दन पर क़रीब 12 पाउंड यानी 5.4 किलो का भार पड़ता है.
इतना भार गर्दन के लिए कोई समस्या नहीं है. लेकिन दुनियाभर में अरबों लोग अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा शरीर को आगे की ओर झुकाकर बिताते हैं.
जब हम लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन देखने के लिए आगे झुकते हैं, तो गर्दन पर सिर का वज़न पड़ने का तरीक़ा पूरी तरह बदल जाता है. घोष बताते हैं कि नीचे देखते हुए इस असहज स्थिति में गर्दन पर सिर का भार बढ़कर क़रीब 60 पाउंड यानी 27.2 किलो हो जाता है.
वह कहते हैं, "यह काफ़ी ज़्यादा दबाव है, जिसे आपकी गर्दन को सहना पड़ता है."
सीधे शब्दों में कहें तो आज की जीवनशैली हमारी गर्दन के लिए बेहद ख़राब है.
लेकिन पांच आसान एक्सरसाइज़ हैं, जिन्हें करके आप अपनी गर्दन को स्वस्थ रख सकते हैं और आगे होने वाली समस्याओं से बच सकते हैं.
आपकी उम्र चाहे जो भी हो, ये एक्सरसाइज़ मदद कर सकती हैं.
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उम्र बढ़ने के साथ हमारी हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों में बदलाव होते हैं. गर्दन की कुछ समस्याएं इन्हीं बदलावों का स्वाभाविक नतीजा होती हैं.
गर्दन को सहारा देने वाले हिस्सों का लचीलापन धीरे-धीरे कम होने लगता है और उनमें अकड़न बढ़ जाती है. उम्र के साथ होने वाले इन बदलावों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता. हालांकि, एक्सरसाइज़ की मदद से गर्दन में होने वाली टूट-फूट को धीमा किया जा सकता है.
घोष कहते हैं, "रीढ़ की हड्डी की बात करें तो 40 साल से ज़्यादा उम्र के किसी भी व्यक्ति का एमआरआई स्कैन पूरी तरह सामान्य नहीं होता."
"हर किसी की कुछ डिस्क घिसी हुई मिलेंगी. ये डिस्क रीढ़ की हड्डियों के बीच गद्दी की तरह काम करती हैं. गर्दन के पीछे के जोड़ भी थोड़े मोटे और सख़्त हो जाते हैं."
इसके अलावा तकनीक के इस्तेमाल का असर भी गर्दन पर पड़ता है.
जब हम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को ध्यान से देखने के लिए झुकते हैं, तो हमारे शरीर की स्थिति एक ख़ास तरह की हो जाती है.
पीठ का ऊपरी हिस्सा ज़्यादा गोल होकर झुक जाता है. ठुड्डी और सिर भी कंधों के ठीक ऊपर रहने के बजाय आगे निकल जाते हैं. इससे गर्दन की मांसपेशियों और रीढ़ के ऊपरी हिस्से के जोड़ों पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है.
ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीज़ 2021 रिपोर्ट के एक विश्लेषण के मुताबिक़, 60 से 80 फ़ीसदी लोगों को अपने जीवन में कभी न कभी गर्दन के दर्द का सामना करना पड़ता है.
क़रीब 50 फ़ीसदी लोगों को गर्दन का दर्द बार-बार होता है या लंबे समय तक बना रहता है.
इस समस्या की शुरुआत रीढ़ के ऊपरी हिस्से में बढ़ती अकड़न और उसे हिलाने-डुलाने में परेशानी से हो सकती है. इसके बाद बेचैनी और दर्द लगातार बढ़ सकता है.
चिंता की बात यह है कि शोध बताते हैं कि गर्दन और पीठ के ऊपरी हिस्से से जुड़ी समस्याएं अब कम उम्र में ही शुरू हो रही हैं.
दुनियाभर के आंकड़ों पर 2025 में किए गए एक बड़े विश्लेषण के मुताबिक़, पिछले तीन दशकों में बच्चों और किशोरों के बीच स्कोलियोसिस की समस्या लगातार बढ़ी है.
स्कोलियोसिस में रीढ़ की हड्डी सामान्य से अलग तरीक़े से मुड़ जाती है. ऐसे में सिर को सीधा रखने के लिए गर्दन की मांसपेशियों को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है और उन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है.
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हालांकि, 2025 के अध्ययन में इस समस्या का ख़राब तरीक़े से बैठने, लंबे समय तक बैठे रहने और स्क्रीन के सामने बहुत ज़्यादा समय बिताने से साफ़ संबंध मिला.
इसके अलावा परिवार में पहले से इस बीमारी का होना, व्यक्ति का लिंग और कम बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई भी इससे जुड़े पाए गए.
लेकिन गर्दन की समस्याओं को शुरू होने से रोकने या उनका असर कम करने के लिए हम काफ़ी कुछ कर सकते हैं.
घोष बेहतर कुर्सियों या शरीर को सही स्थिति में रखने वाले दूसरे सामान पर पैसा खर्च करने के बजाय ज़्यादा चलने-फिरने और स्क्रीन देखने के बीच बार-बार ब्रेक लेने की सलाह देते हैं.
वह कहते हैं, "रीढ़ की हड्डी को बस हिलते-डुलते रहने की ज़रूरत होती है. इससे उसमें ख़ून का बहाव बना रहता है और मांसपेशियों में कसाव बना रहता है."
नीचे बताई गई एक्सरसाइज़ जोड़ों की अकड़न कम करने, बैठने और खड़े होने का ग़लत तरीक़ा सुधारने और गर्दन की मांसपेशियों को ज़्यादा मज़बूत बनाने में मदद कर सकती हैं.
इससे गर्दन लंबे समय तक सामने रखी स्क्रीन को देखने से पड़ने वाले दबाव को बेहतर तरीक़े से सह सकती है.
कोई भी नई एक्सरसाइज़ शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें.
अगर आपकी गर्दन में दर्द है, तो एनएचएस एक आसान एक्सरसाइज़ करने की सलाह देता है. इससे गर्दन की ताक़त और उसे हिलाने-डुलाने की क्षमता वापस पाने में मदद मिल सकती है.
सीधे बैठ जाएं या पीठ के बल लेट जाएं.
इसके बाद अपने सिर को जितना हो सके, दाईं ओर घुमाएं और दो सेकंड तक इसी स्थिति में रहें.
इस दौरान गर्दन के दूसरी तरफ़ खिंचाव महसूस होना चाहिए.
अब सिर को वापस बीच में लाएं. इसके बाद उसे जितना हो सके, बाईं ओर घुमाएं.
इसे दो या तीन बार दोहराएं. दिनभर में जितनी बार सहज महसूस करें, यह एक्सरसाइज़ कर सकते हैं.
गर्दन को सही स्थिति में रखना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ग़लत तरीक़े से बैठने या खड़े होने पर गर्दन की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है.
हमारी गर्दन इस तरह बनी है कि वह हर दिशा में घूम सके. इसलिए दिनभर में गर्दन को नियमित रूप से हिलाते-डुलाते रहना मददगार हो सकता है.
लेकिन गर्दन के लिए सबसे सही स्थिति वह है, जब वह रीढ़ की हड्डी की सीध में हो.
अपने कंधों और पीठ को ढीला रखें. गर्दन को लंबा और सीधा रखने की कोशिश करें.
ठुड्डी को आगे निकालने और कंधों को गोल करके झुकाने से बचें.
सिर को लंबे समय तक एक तरफ़ घुमाकर या झुकाकर भी न रखें.
लंबे समय तक बैठने के दौरान गर्दन की इस स्थिति का ध्यान रखना फ़ायदेमंद होता है. ख़ासकर कंप्यूटर पर काम करते समय, टेलीविज़न देखते हुए या गाड़ी चलाते समय.
सालों तक कंप्यूटर स्क्रीन देखते रहने से ठुड्डी आगे निकालकर बैठने की आदत पड़ सकती है. इस स्थिति में सिर कंधों के ठीक ऊपर रहने के बजाय आगे की ओर निकल जाता है.
हालांकि, बैठने का तरीक़ा बदलकर और कुछ आसान एक्सरसाइज़ करके इसे सुधारा जा सकता है. एक तरीक़ा यह है कि ठुड्डी को हल्का सा अंदर करते हुए गर्दन को धीरे-धीरे ऊपर की ओर लंबा करें.
इस दौरान कल्पना करें कि आपकी ठुड्डी के नीचे एक मुलायम आड़ू रखा है. ठुड्डी को इतनी ज़ोर से अंदर न करें कि वह आड़ू दब जाए. लेकिन उसे इतना ढीला भी न छोड़ें कि आड़ू नीचे गिर जाए.
गर्दन के नीचे सामने की दोनों हड्डियों को फैलाएं. इसके बाद कंधों की हड्डियों को हल्के से नीचे और पीछे, रीढ़ की हड्डी की ओर ले जाएं.
इसी दौरान पेट के निचले हिस्से की अंदरूनी मांसपेशियों को हल्के से अंदर खींचें. इससे कमर के निचले हिस्से का स्वाभाविक हल्का घुमाव बना रहेगा.
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कारख़ानों और मशीनों का दौर शुरू होने से पहले भी पढ़ने-लिखने वाले लोग कई घंटे पांडुलिपियों को ध्यान से देखते हुए बिताते थे.
लेकिन घोष ने पुरानी पेंटिंग में देखा कि वे आमतौर पर क़रीब 45 डिग्री तक झुके हुए स्टैंड या मेज़ पर पढ़ते और लिखते थे.
इससे गर्दन पर कम दबाव पड़ता था.
घोष कहते हैं, "सदियों तक तिरछी मेज़ों का इस्तेमाल आम था क्योंकि स्याही में डुबोकर इस्तेमाल की जाने वाली पंख वाली कलम के लिए वे ज़्यादा सही थीं."
वह बताते हैं कि काग़ज़ को सीधा और सपाट रखने पर स्याही का बहाव रुक सकता था और उसके धब्बे भी ज़्यादा पड़ते थे.
सपाट मेज़ें पिछले क़रीब 100 साल में ही ज़्यादा उपयोगी हुईं. पहले टाइपराइटर और फिर कंप्यूटर आने के बाद इनका इस्तेमाल बढ़ा.
इसके साथ ही गर्दन के दर्द की नई समस्याएं भी सामने आईं.
अब हम दिन में कई घंटे स्क्रीन देखते हुए बिताते हैं.
घोष बताते हैं कि ऐसे में गर्दन को आगे झुकाने वाली अंदरूनी मांसपेशियों की सहने की ताक़त बढ़ाना फ़ायदेमंद होता है.
मांसपेशियों का यह समूह गर्दन को स्थिर रखने और सिर का वज़न संभालने में मदद करता है.
इन मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ करने के लिए बिस्तर पर पीठ के बल लेट जाएं. घुटनों को मोड़कर रखें और दोनों पैर बिस्तर पर सपाट टिके होने चाहिए.
इसके बाद ठुड्डी को छाती की ओर झुकाएं.
एक हाथ सिर के पीछे रखें और उसकी मदद से सिर को बिस्तर से क़रीब एक इंच ऊपर उठाएं.
अब हाथ हटा लें और जितनी देर हो सके, सिर को उसी स्थिति में रखने की कोशिश करें.
शुरुआत में कुछ सेकंड तक ऐसा करने की कोशिश करें. धीरे-धीरे इस समय को बढ़ाकर 30 सेकंड तक ले जाने का प्रयास करें.
गर्दन को आगे झुकाने वाली मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ करने का एक और तरीक़ा है. इसके लिए सिर को सहारा देने वाली ऊंची पीठ की कुर्सी का इस्तेमाल किया जा सकता है.
कुर्सी पर बैठकर सामने की ओर देखें.
सिर को पीछे की तरफ़ कुर्सी के सहारे पर दबाएं. इसके बाद ठुड्डी को नीचे छाती की ओर लाएं.
कुछ देर इसी स्थिति में रहें और फिर शुरुआती स्थिति में लौट आएं.
इसे कई बार दोहराएं.
इसी एक्सरसाइज़ को थोड़ा मुश्किल तरीक़े से करने के लिए रेज़िस्टेंस बैंड का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह एक्सरसाइज़ के लिए इस्तेमाल होने वाला लचीला बैंड होता है.
सबसे पहले बैंड को सिर की ऊंचाई पर किसी चीज़ से बांध दें.
बैंड को पकड़कर अपने माथे के चारों ओर लगाएं. इसके बाद बैंड में हल्का खिंचाव आने तक दो क़दम आगे बढ़ें.
सीधे खड़े रहें और गर्दन को आगे झुकाते हुए सिर नीचे लाएं.
कुछ देर रुकें. फिर गर्दन को ढीला छोड़ते हुए शुरुआती स्थिति में लौट आएं.
इसके बाद इस एक्सरसाइज़ को फिर से करें.
समय के साथ ये एक्सरसाइज़ गर्दन को 21वीं सदी की जीवनशैली से पैदा होने वाली चुनौतियों को बेहतर तरीक़े से सहने लायक बना सकती हैं.
इस लेख में दी गई सारी जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इसे स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मेडिकल सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
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