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"गांव में गफ़ूरन बुआ का जनाज़ा रखा था. वे हमारे गांव की बेटी तो थीं हीं, हमारी बुआ समान भी थीं. उनका जनाज़ा गांव में रखा हो और हम रामलीला कर मनोरंजन करें, दिल ने गवारा नहीं किया. हमारी कमेटी ने उस दिन शुरू होने वाली रामलीला के आयोजन को टाल दिया."
यह कहना है उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर के गांव मोहड़ा के रहने वाले ऋषिपाल सिंह का. ऋषिपाल सिंह गांव में ही आदर्श रामलीला कमेटी के संरक्षक और ग्राम प्रधान हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "देखिए, वैसे तो हमारा पूरा गांव ही आपसी सौहार्द की मिसाल है. यहां कभी हिंदू-मुस्लिम तनाव जैसा कोई इतिहास नहीं रहा. वे ऐसी महिला थीं, जो अपने घर के सामने पीपल के पेड़ के नीचे बैठी रहती थीं. देवता पूजन के लिए जब नए जोड़े आते तो वे उन्हें आशीर्वाद देती थीं."
वे आगे कहते हैं, "गांव के हर छोटे-बड़े को उनके ख़ानदान से पहचानती थीं. हर कोई उनकी ऐसी इज़्जत करता कि कोई ही उनके सामने से बिना दुआ-सलाम के गुज़रा हो."
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दरअसल, बिजनौर की धामपुर तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत मोहड़ा स्थित है. लगभग 3200 की आबादी वाले इस गांव में चौहान बहुसंख्यक हैं, जबकि मुस्लिम, वाल्मीकि समाज और अन्य वर्गों के लोग भी रहते हैं.
बीते 10 अक्तूबर को यहां लगभग 85 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला गफ़ूरन का निधन हो गया. वे कुछ समय से बीमार थीं. उनका शव शाम लगभग पांच बजे गांव पहुंचा तो वहां का माहौल ग़मगीन हो गया.
इसी दिन गांव में रात आठ बजे से रामलीला का मंचन शुरू होना था. यह नवरात्र का पहला दिन था, जब हर साल की तरह इस गांव में रामलीला का आरंभ होता है. लेकिन गफ़ूरन के निधन को देखते हुए आदर्श रामलीला कमेटी से जुड़े सभी आयोजकों ने आपसी सहमति से रामलीला का आयोजन टालने की घोषणा की.
इसके बाद आपसी सौहार्द का यह मामला पूरे इलाक़े में सुर्ख़ियों में आ गया. सोशल मीडिया पर भी लोग इसकी चर्चा करने लगे.
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धामपुर से मुरादाबाद जाने वाले हाईवे से क़रीब डेढ़ किलोमीटर अंदर मोहड़ा गांव पड़ता है. गांव में घुसते ही जगह-जगह लकड़ी के पोलों पर लाउडस्पीकर लगे हैं. सड़क के दोनों ओर सजावट हो रही है.
रामलीला ग्राउंड गफ़ूरन के घर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है. गांवभर में जगह-जगह लगे लाउडस्पीकरों के चलते हर घर तक रामलीला के मंचन और भजनों की आवाज़ पहुंच रही है.
एक मुस्लिम महिला ने नाम न छापने की गुज़ारिश करते हुए हमसे बात की. उन्होंने कहा, "हम भी इकट्ठे होकर रामलीला देखने जाते हैं. गांव का हर कोई भाई-भतीजा सा लगता है."
इसी बीच रामलीला ग्राउंड में सामने से आते रामलीला समिति के अध्यक्ष ऋषिपाल सिंह दिखे. गफ़ूरन के निधन और रामलीला टलने के सवाल पर उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "गफ़ूरन से भले हमारा ख़ून का रिश्ता नहीं था, लेकिन वह गांव की बेटी थीं."
पास ही नीली शर्ट में खड़े भूपेंद्र सिंह ने भी हमसे बात की. वह कमेटी में उपसचिव हैं. उन्होंने कहा, "पिछले तक़रीबन 40 साल से गांव में रामलीला हो रही है. यहां कभी तनाव जैसा कुछ नहीं रहा है. बल्कि मुसलमानों के कई परिवार रामलीला कमेटी को सहयोग करते हैं. उनके घरों से भी महिलाएं यहां रामलीला देखने आती हैं."
जिस दिन हम मोहड़ा गांव पहुंचे, वहां राम बारात निकाली जा रही थी. रामलीला ग्राउंड में बच्चे खेल रहे थे. महिलाएं और बुज़ुर्ग भी अच्छी तादाद में मौजूद थे.
राम बारात देखने पहुंचीं ऐसी ही एक महिला सुनीता देवी से हमने गफ़ूरन बुआ के बारे में पूछा. उन्होंने कहा, "मेरी उम्र लगभग 56 साल है. मैं जिस दिन से यहां ब्याहकर आई हूं, सबके बीच प्रेम देख रही हूं. गफ़ूरन बुआ इसलिए गांव वालों की चहेती थीं क्योंकि वह हर आने-जाने वाले के सिर पर हाथ फेरती थीं."
पास में खड़ीं एक बुज़ुर्ग महिला उर्मिला ने गफ़ूरन को याद करते हुए कहा, "उनका परिवार पास के एक गांव का था, जो क़रीब 50-55 साल पहले यहां आकर बस गया. गफ़ूरन की शादी पास के जटपुरा गांव के अकबर हुसैन से हुई. कुछ वजह से वे भी यहीं आकर रहने लगे. गफ़ूरन कहती थीं कि ये गांव प्यार-मोहब्बत वाला है."
गांव के रहने वाले भूरे मियां कहते हैं, "हमारे गांव में आज तक सांप्रदायिक माहौल ख़राब नहीं हुआ है. हमारे गांव की सीमा पर ऐसे सभी मामले दम तोड़ जाते हैं. आगे भी ऐसा ही होगा."
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गांव में घुसते ही बाएं हाथ पर एक छोटा रास्ता मुड़ता है. इस रास्ते के किनारे गन्ने की फ़सल खड़ी है. क़रीब 300 मीटर चलने पर बाएं हाथ पर चहारदीवारी से घिरा एक बड़ा पीपल का पेड़ दिखता है. यहां से 15 से 20 क़दम आगे चलने पर गफ़ूरन का घर है, जिसके दरवाज़े पर लाल रंग का लोहे का गेट लगा है.
गफ़ूरन के चार बेटे और एक बेटी थे. उनके पति के अलावा उनके दो बेटों और एक बेटी का भी इंतकाल काफ़ी पहले हो गया था.
अब उनके बच्चों में लगभग 65 साल के ज़ाकिर हुसैन और उनके छोटे भाई शमशाद हुसैन ही ज़िंदा हैं. ज़ाकिर गांव में ही अपना एक क्लिनिक चलाते हैं और उनके बच्चों की भी शादी हो चुकी है. इस तरह गफ़ूरन के घर में उनकी चौथी पीढ़ी के बच्चे पल रहे हैं.
ज़ाकिर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "अम्मा की तबीयत 10 अक्तूबर की सुबह अचानक ख़राब हो गई थी. उन्हें धामपुर में एक डॉक्टर के पास ले जाया गया, लेकिन शाम चार बजे उनका इंतकाल हो गया."
उन्होंने आगे कहा, "गांव में रामलीला की तैयारी थी. पूजा-अर्चना के लिए भी अक्सर भोंपू बजता है, लेकिन उस दिन गांव में भोंपू नहीं बजा. रात को होने वाली रामलीला भी उस दिन के लिए स्थगित कर दी गई."
वे आगे कहते हैं, "अम्मा ने हमेशा हमारे परिवार को इकट्ठा बनाए रखा. अब भी हमारे पूरे परिवार का एक ही दरवाज़ा है. यही एका वो गांववालों के साथ भी रखती थीं."
ज़ाकिर यह भी कहते हैं कि बचपन से ही रामलीला में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करने की सीख उन्हें उनकी अम्मा देती थीं.
वे बोले, "दिवाली हो या ईद, हिंदू भाइयों के यहां हमारा आना-जाना लगा रहता था. अम्मा के जनाज़े में गांव के कई हिंदू भाई शामिल रहे."
वे यह भी कहते हैं कि कई लोग हर रोज़ उनके घर सांत्वना देने पहुंच रहे हैं.
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आदर्श रामलीला मंच में राम का किरदार अमित चौहान निभा रहे हैं. उन्होंने रामलीला टाले जाने और गफ़ूरन को लेकर हमसे बात की.
अमित कहते हैं, "मंचन के लिए काफ़ी पहले से डायलॉग याद करने पड़ते हैं और अभिनय की प्रैक्टिस चलती है. ऐसे में जिस दिन के लिए तैयारी हो, उस दिन आयोजन ही टल जाए तो बहुत भारी लगता है."
मगर वे यह भी जोड़ते हैं, "गफ़ूरन बुआ के बारे में हम अपने बड़ों से सुनते आ रहे हैं. हमने उन्हें देखा भी है. उनका जाना पूरे गांव के लिए एक बड़ी क्षति है."
इस गांव से धामपुर शहर की दूरी तक़रीबन तीन किलोमीटर है. धामपुर उत्तर प्रदेश का एक विधानसभा क्षेत्र भी है. यहां से भाजपा के अशोक कुमार राणा विधायक हैं.
धामपुर एक नगरपालिका क्षेत्र भी है, जहां हिंदू-मुसलमानों की मिश्रित आबादी है. आसपास के गांवों से हर रोज़ बड़ी संख्या में ग्रामीण अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए ख़रीदारी करने यहां आते हैं.
एसडीएम कार्यालय के नज़दीक वकीलों के चेंबर हैं. यहां वकालत करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व पत्रकार गजेंद्र सिंह कहते हैं, "देखिए, धामपुर में साल 1978 में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा था. उस दौर में धामपुर को काफ़ी नुक़सान हुआ. उसके बाद भी कुछ बार सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बनी, लेकिन मोहड़ा गांव में कभी अशांति नहीं पहुंची. वहां शुरू से ही आपसी भाईचारा बना हुआ है. ये बात जगज़ाहिर है."
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