एनडीए के दो घटक दल हम (से.) और लोजपा (रा) के बीच आरक्षण की समीक्षा को लेकर संघर्ष पिछले हफ्ते से तीव्र हो गया है। दोनों पक्षों ने एक‑दूसरे से इस्तीफ़ा माँगते हुए स्थिति को और नाटकीय बना दिया।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन ने मौजूदा आरक्षण प्रावधानों की समीक्षा की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि कोटा के भीतर कोटा होना चाहिए ताकि जरूरतमंदों को असली लाभ मिल सके।
इसके जवाब में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरक्षण को कमजोर या समाप्त करने की किसी भी कोशिश को अस्वीकार किया।
रविवार को इस टकराव में बिहार के मुख्य विपक्षी दल राजद और एनडीए के बड़े घटक जदयू की भी एंट्री हो गई। जदयू के वरिष्ठ नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “ऐसे कोई नहीं है जो आरक्षण को खत्म कर सके।” उन्होंने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को चुनौती दी कि वे इस्तीफ़ा देकर अनारक्षित सीट से चुनाव लड़ें, तभी उनका “ज्ञान चक्षु खुलेंगे।”
जदयू के पूर्व मंत्री श्याम रजक ने भी इस पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आरक्षण का मौजूदा स्वरूप यदि बदला गया तो “स्थिति गृहयुद्ध जैसी हो जाएगी।” रजक ने कहा, “आरक्षण कोई भीख नहीं, यह दलित, आदिवासी और वंचित वर्गों का संवैधानिक अधिकार है।”
रजक ने आगे बताया कि यदि आरक्षण में कोई कटौती या समीक्षा की जाती है तो इसका सामाजिक परिणाम गंभीर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि केवल कुछ परिवारों को लाभ मिलना, पूरे वर्ग का उत्थान नहीं माना जा सकता।
संतोष कुमार सुमन ने अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, “कोटे में कोटा देना हमारा अधिकार है, हम किसी की धमकी से डरते नहीं हैं। यह लड़ाई उन लोगों के अधिकार के लिए है जो वर्षों से आरक्षण के लाभ से वंचित रहे हैं।” सुमन ने कहा कि वंचित समाज को अपनी जनसंख्या को राजनीतिक ताकत में बदलना होगा और सत्ता में उचित हिस्सेदारी के लिए संगठित होना होगा।
तेजस्वी यादव ने फिर से लोजपा और जदयू के नेताओं पर निशाना साधा। पटना एयरपोर्ट पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “आरएसएस और भाजपा शुरू से ही आरक्षण विरोधी रहे हैं। यदि इन नेताओं में हिम्मत है तो मंत्री पद से इस्तीफ़ा दें और सामान्य सीट से चुनाव लड़ें, तभी जनता को असली बात समझ आएगी।”
मुख्य बयानों का सारांश इस प्रकार है:
• चिराग पासवान (24 अगस्त): आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, इसे कमजोर या समाप्त नहीं किया जाएगा।
• संतोष सुमन (27 अगस्त): आरक्षण की समीक्षा को समाप्त करने की मांग के रूप में नहीं देखना चाहिए; यह वंचित वर्गों का अधिकार है।
• चिराग पासवान (28 अगस्त): समीक्षा करने वाले लोग आरक्षण को समाप्त करना चाहते हैं, जिससे लोगों को हटाया जाएगा।
• संतोष सुमन (28 अगस्त): कई अनुसूचित जाति के समुदाय अभी भी शिक्षा, रोजगार और प्रतिनिधित्व में पीछे हैं।
• चिराग पासवान (29 अगस्त): आरक्षण सामाजिक भेदभाव का समाधान है, इसे आर्थिक आधार पर नहीं तोड़ा जाना चाहिए। जीतन राम मांझी को इस्तीफ़ा देने की सलाह दी।
• जीतन राम मांझी (29 अगस्त): पिछड़ी जातियों को अलग से आरक्षण मिलना चाहिए, चिराग और संतोष सुमन को पहले इस्तीफ़ा देना चाहिए।
• संतोष सुमन (29 अगस्त): इस्तीफ़ा देने को हम तैयार हैं, लेकिन हमारे छोटे भाई की पार्टी बड़ी है और हमारे पास अधिक संख्या में बल है।
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