इंडियन सिनेमा में महिलाओं के चित्रण को लेकर बहस कोई नई नहीं है. कभी फिल्मों में विलेन महिलाओं के साथ बदसलूकी करता था और हीरो आकर उन्हें बचाता था. यह फॉर्मूला भी महिलाओं को एक स्वतंत्र किरदार के बजाय ‘बचाए जाने वाली चीज’ में बदल देता था. लेकिन वक्त के साथ सिनेमा बदला और महिलाओं को लेकर ज्यादा प्रोग्रेसिव होने का दावा भी बढ़ा. समस्या यह है कि कई बार इस प्रोग्रेसिव पैकेजिंग के भीतर वही पुरानी पुरुषवादी नजर छिपी रह जाती है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसे ग्लैमर, सेक्सुअल लिबरेशन और अल्फा-मेल व्यक्तित्व के नाम पर पेश किया जाता है.
यही वह जगह है जहां सवाल उठता है कि क्या महिला किरदारों को पर्दे पर स्वतंत्रता देने का मतलब सिर्फ उन्हें सेक्सुअली बोल्ड दिखाना है? क्या एक पुरुष का महिलाओं के साथ मनमाना व्यवहार इसलिए स्वीकार्य हो जाता है क्योंकि उसे टॉक्सिक, बोल्ड या अल्फा कह दिया गया है? सिनेमा जब ऐसे व्यवहार को चुनौती देने के बजाय उसे स्टाइल, आकर्षण और मर्दानगी के प्रतीक की तरह पेश करता है, तो वह अनजाने में उसी सोच को मजबूत करता है जिसमें महिला की मौजूदगी पुरुष की कहानी, इच्छा और मनोरंजन के लिए होती है.
गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी फिल्म टॉक्सिक इसी विरोधाभास का एक दिलचस्प और असहज उदाहरण है. फिल्म की कमान एक महिला निर्देशक के हाथ में होने के कारण स्वाभाविक रूप से यह उम्मीद बनती है कि महिला किरदारों को सिर्फ ग्लैमर या कहानी की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें अपनी इच्छा और व्यक्तित्व के साथ देखा जाएगा. लेकिन फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि क्या टॉक्सिक वास्तव में महिलाओं को उतनी ही स्वतंत्रता देती है, जितनी वह अपने प्रचार और शुरुआती विवादों के बीच दावा करती हुई नजर आई थी.
टीजर रिलीज के दौरान बोल्ड दृश्यों को लेकर उठे सवालों पर महिलाओं की पसंद और सहमति का तर्क सामने आया था. बेशक, किसी महिला का अपनी देह और अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर फैसला उसका अधिकार है और उसे सिर्फ बोल्ड होने के कारण जज नहीं किया जा सकता. लेकिन सिनेमा में प्रतिनिधित्व का सवाल सिर्फ कपड़ों या बोल्ड दृश्यों तक सीमित नहीं होता. असली सवाल यह है कि कैमरा महिला को किस नजर से देख रहा है, कहानी में उसकी भूमिका क्या है और क्या वह अपने फैसले लेने वाली व्यक्ति है या मुख्य पुरुष किरदार की यात्रा को आगे बढ़ाने का माध्यम भर.
यहीं टॉक्सिक की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है. फिल्म में कई महिला किरदारों की मौजूदगी उनके व्यक्तित्व से ज्यादा उनके शरीर, रिश्तों और पुरुष किरदार के साथ उनके समीकरण से तय होती है. यानी जिस फ्रीडम की बात की जाती है, वह कई जगह महिला की स्वतंत्रता से ज्यादा पुरुष की इच्छा को स्वतंत्रता देती नजर आती है. महिला पात्र मौजूद हैं, बोल्ड हैं, सेक्सुअली ओपन हैं, लेकिन उनकी कहानी सीमित है. यह विरोधाभास फिल्म को महिला सशक्तिकरण की बहस में और ज्यादा दिलचस्प, लेकिन उतना ही असहज उदाहरण बना देता है.
फिल्म की एक बड़ी कमजोरी इसकी बिखरी हुई राइटिंग भी है. टॉक्सिक सिर्फ एक बुरे आदमी की कहानी नहीं है. Toxicity का मतलब ऐसे व्यवहार और रिश्तों से है जो लगातार दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाते हैं. लेकिन फिल्म कई जगह इस मानसिकता को पहचानने या उसकी आलोचना करने के बजाय उसे स्टाइल और आकर्षण में बदल देती है. कियारा आडवाणी का किरदार जब अपने लवर के व्यवहार को टॉक्सिक कहता है, वहीं दूसरी तरफ यश का किरदार उसके लिए B**CH जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करता है. समस्या सिर्फ इस भाषा के इस्तेमाल की नहीं है, बल्कि यह है कि फिल्म इस जहरीले व्यवहार को किस तरह फ्रेम करती है. जब अपमान, अधिकार जताने और अस्वस्थ रिश्तों को रोमांटिक या सेक्सी पैकेजिंग मिल जाती है, तो दर्शक के सामने सवाल खड़ा होता है कि फिल्म इसकी आलोचना कर रही है या इसे बेच रही है.
फिल्म में चीटिंग और प्री-मैरिटल अफेयर को लेकर भी यही समस्या दिखाई देती है. किसी फिल्म में ऐसे रिश्तों का होना अपने आप में गलत नहीं है. सिनेमा का काम सिर्फ आदर्श रिश्ते दिखाना नहीं है. लेकिन जब इन व्यवहारों के भावनात्मक और नैतिक परिणामों को लगभग नजरअंदाज कर दिया जाए और पूरी चीज पुरुष किरदार की लाइफस्टाइल और आकर्षण का हिस्सा बनकर रह जाए, तो कहानी का नजरिया सवालों के घेरे में आ जाता है. नयनतारा और कियारा आडवाणी से जुड़े हिस्सों में भी यही महसूस होता है कि महिला पात्रों की जटिलता के बजाय उनके रिश्ते और पुरुष पात्र से उनका जुड़ाव ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया गया है.
प्रमोशन के दौरान यश ने महिलाओं की इच्छाओं, बराबरी और स्वतंत्रता को लेकर जो बातें कहीं, उनके संदर्भ में फिल्म को देखना और भी दिलचस्प हो जाता है. क्योंकि पर्दे पर दिखाई देने वाला पुरुष किरदार कई बार उसी बराबरी के ठीक उलट व्यवहार करता नजर आता है. लड़कियों से मिलना, सिगरेट और शराब, सेक्स और उसके बाद हिंसा हीरो की दुनिया का बड़ा हिस्सा इन्हीं चीजों के इर्द-गिर्द घूमता है. समस्या यह नहीं कि फिल्मों में ये चीजें दिखाई क्यों गईं. सवाल यह है कि इनके बीच महिला किरदारों की अपनी दुनिया कहां है?
किरदारों की बनावट पर गौर करें तो पांच अभिनेत्रियों की मौजूदगी के बावजूद महिला पात्रों के बीच पर्याप्त विविधता नजर नहीं आती. कियारा आडवाणी का किरदार मुख्य पुरुष पात्र के साथ रिश्ते और उसके बाद प्रेग्नेंसी के इर्द-गिर्द सिमट जाता है. हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया के किरदार भी अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय पुरुष पात्र के साथ अपने संबंधों से ज्यादा पहचाने जाते हैं. रुक्मिणी वसंत का अचानक आना भी कहानी में किसी गहरी महिला दृष्टि को जोड़ने के बजाय मुख्य किरदार के साथ उनके समीकरण तक सीमित दिखाई देता है. इन सबके बीच नयनतारा का किरदार मजबूत और उद्देश्यपूर्ण जरूर लगता है, लेकिन वह भी पूरी फिल्म में महिला प्रतिनिधित्व की कमी को पूरी तरह संतुलित नहीं कर पाता.
सबसे ज्यादा निराशा इस बात से होती है कि फिल्म में महिला किरदारों को अपनी बात कहने और कहानी पर प्रभाव डालने के मौके बेहद सीमित मिलते हैं. बड़े और याद रह जाने वाले संवाद पुरुष पात्र के हिस्से आते हैं, जबकि महिलाओं की भावनात्मक भूमिका अक्सर रोने, रिश्तों और प्रतिक्रिया देने तक सिमट जाती है. मसलन, 'लोग मर कर ऊपर जाते हैं, हम एक दूसरे पर चढ़कर ऊपर जाएंगे' जैसे संवाद पुरुष किरदार को उसकी महत्वाकांक्षा और आक्रामकता के साथ स्थापित करते हैं, लेकिन महिला किरदारों के पास वैसी ही वैचारिक या भावनात्मक जगह बहुत कम है.
और फिर आता है फिल्म का वह हिंसक हिस्सा, जहां यश का किरदार कई लड़कियों को बेरहमी से मारता है. यहां समस्या सिर्फ हिंसा की मात्रा नहीं है. सवाल यह है कि कहानी ने इन महिला पात्रों को पहले किस तरह स्थापित किया और फिर किस तरह उन्हें पुरुष नायक की हिंसक यात्रा का हिस्सा बनाकर खत्म कर दिया. जब महिला पात्रों को पहले ग्लैमर और सेक्सुअलिटी के जरिए पेश किया जाए और अंत में उनकी मौत भी पुरुष किरदार की ताकत दिखाने का उपकरण बन जाए, तो यह ऑब्जैक्टिफिकेशन के उसी पुराने ढांचे को और मजबूत करता है. बस इस बार उसका पैकेज आधुनिक है.
टॉक्सिक की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि फिल्म महिलाओं को सेक्सुअली स्वतंत्र दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन उनका नैरेटिव उतना ही सीमित रखती है. यानी महिला पात्रों के शरीर को आजादी मिलती दिखाई देती है, लेकिन उनकी कहानी को नहीं. यही फर्क सशक्तिकरण और ऑब्जैक्टिफिकेशन के बीच की असली रेखा है.
और यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समस्या सिर्फ इसलिए नहीं है कि फिल्म की निर्देशक एक महिला हैं. महिला होना अपने आप में किसी फिल्म को प्रोग्रेसिव बनाने की गारंटी नहीं देता, ठीक उसी तरह जैसे पुरुष निर्देशक होना किसी फिल्म को अनिवार्य रूप से महिला-विरोधी नहीं बनाता. असली सवाल दृष्टि का है. निर्देशक कैमरे को किस नजर से रखता है, किरदारों को कितनी एजेंसी देता है और कहानी में किसकी इच्छा, आवाज और अनुभव को केंद्र में रखता है. यही तय करता है कि पर्दे पर महिला को व्यक्ति की तरह देखा जा रहा है या वस्तु की तरह.
इस लिहाज से टॉक्सिक एक महत्वपूर्ण बहस जरूर खड़ी करती है. क्योंकि आज सिनेमा में महिलाओं को बोल्ड, बेफिक्र और प्रोग्रेसिव दिखाना आसान है, लेकिन उन्हें पूरी तरह मनुष्य की तरह लिखना उनकी इच्छाओं, कमजोरियों, महत्वाकांक्षाओं, फैसलों और विरोधाभासों के साथ अब भी चुनौती बना हुआ है. जब तक महिला किरदारों की आजादी सिर्फ उनके शरीर तक सीमित रहेगी और उनकी कहानी पर अधिकार पुरुष किरदार के पास रहेगा, तब तक पर्दे पर दिखने वाला यह बदलाव अधूरा ही रहेगा.
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