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मुर्शिदाबाद के मोहम्मद मोसलेउद्दीन सुभानी के परिवार में छह भाई-बहन हैं. पश्चिम बंगाल में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में उनमें से कोई भी वोट नहीं डाल पाया.
इसकी वजह ये थी कि वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान चुनाव आयोग ने एक ही पिता के छह बच्चे होने को 'तार्किक विसंगति' के रूप में चिह्नित किया था. इसके बाद सभी छह भाई-बहनों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए.
सुभानी कहते हैं, "जब हमारी सुनवाई हुई थी, तब हमने सभी ज़रूरी दस्तावेज़ दिखाए थे. इसके बावजूद हम सभी के नाम हटा दिए गए. एक वयस्क भारतीय नागरिक होने के बावजूद मैं पहली बार वोट नहीं दे पाया."
सुभानी की तरह क़रीब 27 लाख लोगों को न्यायिक प्रक्रिया के तहत वोट देने के लिए अयोग्य माना गया था. चुनाव से ठीक पहले उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए.
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अब वोट देने का अधिकार वापस पाने के लिए इनमें से कई लोगों को ट्रिब्यूनल के फ़ैसले का इंतज़ार करना पड़ रहा है.
वोट देने के अधिकार से जुड़ी आपत्तियों और शिकायतों के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पश्चिम बंगाल में 19 'अपीलीय ट्रिब्यूनल' बनाए गए थे.
हर ट्रिब्यूनल की ज़िम्मेदारी एक सेवानिवृत्त जज को दी गई है. इन ट्रिब्यूनलों को वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों की अर्ज़ियों पर विचार करके उनके वोट देने के अधिकार पर फ़ैसला करना है.
इन ट्रिब्यूनलों का गठन मार्च में किया गया था. लेकिन माना जा रहा है कि इनका काम पूरा होने में कई साल लग सकते हैं.
इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल की और पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई.
लेकिन सुभानी जैसे लाखों 'डिलीटेड वोटर' अब भी ट्रिब्यूनल के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं. वोटर लिस्ट में नाम वापस जोड़ने की अर्ज़ियों का निपटारा होने तक उन्हें नहीं पता कि वापस नाम जुड़ेगा या नहीं.
सुभानी कहते हैं, "हर दिन हमारी चिंता बढ़ रही है. कहीं सुनने को मिल रहा है कि डिलीटेड वोटरों को राशन मिलने में परेशानी हो रही है. अगर किसी महिला का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है, तो उसे अन्नपूर्णा योजना का लाभ नहीं मिलेगा. ट्रिब्यूनल में जिस रफ़्तार से मामलों का निपटारा हो रहा है, उसे लेकर हम बहुत चिंतित हैं. हमारा भविष्य अब ट्रिब्यूनल के हाथ में है."
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चुनाव आयोग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा जमा किया था. इस हलफ़नामे के मुताबिक़, ट्रिब्यूनलों में क़रीब 38 लाख 32 हज़ार अर्ज़ियां जमा हुई हैं.
इनमें क़रीब 22 लाख 22 हज़ार अर्ज़ियां उन लोगों की हैं, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे. इसके अलावा मौजूदा वोटर लिस्ट से क़रीब 16 लाख 11 हज़ार लोगों के नाम हटाने की अर्ज़ियां भी आई हैं.
हलफ़नामे में बताया गया है कि अब तक वोट देने के अधिकार से जुड़ी केवल 1 लाख 26 हज़ार अर्ज़ियों का निपटारा हुआ है. इसका मतलब है कि जमा हुई कुल अर्ज़ियों में से केवल 3.29 फ़ीसदी का निपटारा हुआ है.
चुनाव आयोग के हलफ़नामे के मुताबिक़, नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ अर्ज़ी देने वाले लोगों में से 92.98 फ़ीसदी को ट्रिब्यूनलों ने वैध वोटर माना है.
इस समय ट्रिब्यूनलों के सामने 37 लाख 5 हज़ार से ज़्यादा अर्ज़ियां विचार के लिए लंबित हैं. इससे साफ़ है कि बड़ी संख्या में अर्ज़ियां अब भी निपटारे का इंतज़ार कर रही हैं. वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों के दस्तावेज़ जांचकर फ़ैसला लेने की यह प्रक्रिया काफ़ी समय ले रही है.
चुनाव आयोग के हलफ़नामे में 10 सितंबर तक के आंकड़े दिए गए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल के सभी ज़िलों में सबसे ज़्यादा अर्ज़ियां मुर्शिदाबाद से ट्रिब्यूनल में जमा हुई हैं. लेकिन उनके निपटारे की रफ़्तार बेहद धीमी है.
अप्रैल में ट्रिब्यूनलों का काम शुरू हुआ था. इसके बाद 10 सितंबर तक मुर्शिदाबाद से क़रीब साढ़े सात लाख अर्ज़ियां जमा हुईं. इनमें से केवल 595 अर्ज़ियों का निपटारा हुआ. 522 लोगों के नाम दोबारा वोटर लिस्ट में जोड़े गए, जबकि 73 अर्ज़ियां ख़ारिज कर दी गईं.
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले क़रीब पांच महीनों में मुर्शिदाबाद से आई साढ़े सात लाख अर्ज़ियों में से केवल 0.08 फ़ीसदी का निपटारा हो पाया.
अपीलीय ट्रिब्यूनलों में इतनी बड़ी संख्या में अर्ज़ियां लंबित होने के कारण सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिम बंगाल के आने वाले नगर निकाय चुनावों में लाखों लोग वोट डाल पाएंगे.
इसी तरह रेजिनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों की वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों की अर्ज़ियों का निपटारा आने वाले उपचुनाव से पहले होगा या नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है.
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इस साल मई में एक ट्रिब्यूनल की ज़िम्मेदारी संभाल रहे सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति टीएस शिवज्ञानम ने ट्रिब्यूनल के अपना पद छोड़ दिया था.
'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने 22 दिनों में कुल 1,777 अर्ज़ियों का निपटारा किया था.
उन्होंने मीडिया से कहा था, "मैंने 22 दिनों तक रोज़ ट्रिब्यूनल का काम किया. सुबह साढ़े आठ बजे से शाम पांच बजे तक इतनी अर्ज़ियों का निपटारा किया. रविवार को भी मैंने अकेले यह काम किया."
हालांकि, उनका मानना था कि वोट देने के अधिकार से जुड़ी अर्ज़ियों का निपटारा जिस रफ़्तार से हो रहा है, उसी रफ़्तार से काम जारी रहा तो एक जज को लाखों अर्ज़ियों की जांच कर फ़ैसला देने में कई साल लग जाएंगे.
इस्तीफ़े के बाद उन्होंने मीडिया को बताया था कि ऑनलाइन अर्ज़ियों से जुड़ी कुछ समस्याएं भी हैं. जज आम तौर पर विस्तार से आदेश लिखने के आदी होते हैं, लेकिन इस व्यवस्था में आदेश लिखने के लिए शब्दों की सीमा तय की गई है.
ज़्यादातर सेवानिवृत्त जज तकनीक के इस्तेमाल में बहुत सहज नहीं हैं. इसलिए उन्हें लॉग-इन करने या ऑनलाइन आदेश अपलोड करने में परेशानी हो सकती है.
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एसआईआर के कारण आई इस स्थिति से 'डिलीटेड वोटरों' को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. कुछ महीने पहले महिबुल्ला मंडल नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दी थी.
उन्होंने मांग की थी कि वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद वोट देने का अधिकार खोने की वजह से उन्हें सरकारी राशन की सुविधा से वंचित न किया जाए.
भारत में राशन व्यवस्था कम आमदनी वाले परिवारों को सब्सिडी पर रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध कराने की सरकारी व्यवस्था है.
मंडल का आरोप है कि जून में पश्चिम बंगाल सरकार के खाद्य और आपूर्ति विभाग ने एक आदेश जारी किया था. इसमें 'डिलीटेड वोटरों' को राशन की सुविधा से बाहर रखने का ज़िक्र था.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रिब्यूनल में उनके वोट देने के अधिकार से जुड़े मामले का दो महीने के भीतर निपटारा किया जाए.
कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील आसिफ़ रज़ा अंसारी ने बताया कि ट्रिब्यूनलों में अर्ज़ियों का निपटारा देर से होने के कारण लोगों को किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
उनका कहना है कि कई मामलों में वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों को अपनी समस्याओं के कारण हाई कोर्ट जाना पड़ रहा है.
इस बारे में उन्होंने अपने एक मुवक्किल का उदाहरण दिया.
वे कहते हैं, "हाल में उत्तर दिनाजपुर ज़िले के एक लड़के ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की थी और वह मेडिकल कॉलेज में दाख़िले की तैयारी कर रहा था."
"मेडिकल में दाख़िले के लिए एक फ़ॉर्म भरना होता है, जिसमें स्थायी निवास का पता देना पड़ता है. लेकिन उसके पिता एक डिलीटेड वोटर थे. इसी वजह से स्थानीय प्रशासन का कोई अधिकारी उस लड़के को यह फ़ॉर्म नहीं देना चाहता था."
अंसारी ने बताया कि उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट में एक तत्काल अर्ज़ी देनी पड़ी, ताकि ट्रिब्यूनल में उस लड़के के पिता की सुनवाई और दस्तावेज़ों की जांच जल्दी पूरी की जा सके.
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि दो सप्ताह के भीतर उनकी सुनवाई करके अर्ज़ी का निपटारा किया जाए.
वे कहते हैं, "हाई कोर्ट के आदेश के कुछ दिनों के भीतर ही ट्रिब्यूनल में लड़के के पिता की तत्काल सुनवाई की व्यवस्था कर दी गई थी. इसके लिए मैं ट्रिब्यूनल को धन्यवाद दूंगा."
"ट्रिब्यूनल में अपील करने के बाद बहुत से लोग अलग-अलग कारणों से वकीलों के ज़रिए हाई कोर्ट जा रहे हैं, ताकि उनकी अर्ज़ियों का जल्दी निपटारा हो सके."
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अंसारी के मुताबिक़, ट्रिब्यूनल में एक अर्ज़ी का निपटारा करने में इतना समय लगने की ठोस वजहें हैं. उनका कहना है कि हर अर्ज़ी के मामले में दस्तावेज़ों की जांच और फ़ैसला लिखने सहित कई चरण पूरे करने पड़ते हैं.
वे कहते हैं, "ट्रिब्यूनल की ज़िम्मेदारी संभाल रहे जज हर व्यक्ति के सभी दस्तावेज़ों की बारीकी से जांच करते हैं. उन्हें देखना पड़ता है कि सभी दस्तावेज़ आपस में मेल खाते हैं या नहीं और व्यक्ति का नाम हर जगह सही लिखा है या नहीं."
"इसके बाद दस्तावेज़ों के आधार पर यह विचार करना होता है कि वह व्यक्ति योग्य वोटर है या नहीं. फिर जज को अपना फ़ैसला एक ऑर्डर शीट पर लिखना होता है. उस पर हस्ताक्षर और मुहर लगाने के बाद उसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड भी करना पड़ता है."
अंसारी कहते हैं, "इस पूरी प्रक्रिया में समय लगना स्वाभाविक है. अगर ट्रिब्यूनल का काम सुबह 11 बजे शुरू होकर शाम चार बजे तक चलता है, तो इस दौरान कई सुनवाई और भोजन का अवकाश भी होता है. ऐसे में एक जज एक दिन में एक ट्रिब्यूनल में सीमित संख्या में अर्ज़ियों का ही निपटारा कर सकते हैं.
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अंसारी के कई मुवक्किल ट्रिब्यूनल की सुनवाई में शामिल हो चुके हैं. उनका कहना है कि फ़िलहाल ट्रिब्यूनल में लोगों को सामने बुलाकर भी सुनवाई हो रही है और वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए भी.
वे कहते हैं, "कई लोग व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में शामिल नहीं हो पाते. ऐसे लोग अपने घर या उप-मंडल कार्यालय से सुनवाई में शामिल होते हैं. लेकिन हमारा अनुभव बताता है कि कई मामलों में ट्रिब्यूनल में व्यक्तिगत रूप से शामिल होना ज़्यादा असरदार होता है."
"इससे व्यक्ति अपने ज़रूरी दस्तावेज़ सीधे पेश कर सकता है और जज के सामने अपनी बात मज़बूती से रख सकता है."
अंसारी के मुताबिक़, ऑनलाइन सुनवाई में कई बार अलग-अलग बातों को लेकर स्थिति साफ़ नहीं हो पाती.
अपील करने वाला व्यक्ति भी कई बार अपना पक्ष अच्छी तरह नहीं रख पाता. ख़ास तौर पर उस समय, जब इंटरनेट की रफ़्तार या उसकी गुणवत्ता ख़राब हो.
वे बताते हैं, "सुनवाई के दौरान आपके दस्तावेज़ देखे जाते हैं. यह जांच की जाती है कि 2002 की वोटर लिस्ट में आपका नाम है या नहीं और उसमें कोई अंतर या विसंगति तो नहीं है. यह भी देखा जाता है कि आपके पुराने वोटर कार्ड और मौजूदा दस्तावेज़ों की जानकारी आपस में मेल खाती है या नहीं."
चुनाव आयोग ने हाल में जमा किए अपने हलफ़नामे में लंबित अर्ज़ियों के जल्दी निपटारे के लिए कुछ सुझाव दिए हैं.
आयोग ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है. आयोग के मुताबिक़, इससे लंबित अपीलों का निपटारा जल्दी हो सकेगा.
आयोग ने यह भी बताया कि ट्रिब्यूनल के जजों के लिए सुनवाई और दूसरी प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए बनाया गया सॉफ़्टवेयर किसी ख़ास जगह पर निर्भर नहीं है.
इसलिए ज़रूरत पड़ने पर जज तय ट्रिब्यूनल वाली जगह पर मौजूद हुए बिना भी सुनवाई कर सकते हैं. वे अपने घर से भी सुनवाई कर सकते हैं.
आयोग ने अदालत से कहा है कि इस व्यवस्था से आने-जाने में लगने वाला समय बचेगा और अर्ज़ियों के जल्दी निपटारे में मदद मिलेगी.
इस समय सभी ट्रिब्यूनल दक्षिण 24 परगना के जोका इलाक़े में स्थित केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के एक कार्यालय से काम कर रहे हैं.
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