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यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सऊदी समर्थक सरकार और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच चल रहा युद्ध फिर शुरू हो गया है.
यहाँ तक कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ मक्का रक्षा समझौते को भी एक्टिवेट कर दिया है.
हूतियों को आधिकारिक रूप से अंसार अल्लाह (अल्लाह के समर्थक) के नाम से जाना जाता है. ये लोग यमन के उत्तर-पश्चिमी सादा प्रांत से आने वाले एक क़बीले से जुड़े हैं.
हूती शिया इस्लाम की ज़ैदी शाखा के अनुयायी हैं, जिसकी आबादी यमन की कुल आबादी का लगभग एक-तिहाई है.
हूती संगठन 1990 के दशक में उत्तरी और दक्षिणी यमन के एकीकरण के बाद उभरा. उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ कई विद्रोह किए. 2014 में हूतियों के सना पर कब्ज़े ने गृहयुद्ध को जन्म दिया, जिसने आज भी देश को विभाजित कर रखा है.
हूती पश्चिम और इसराइल विरोधी हैं और अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ ने उन्हें आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया है.
हूतियों के साथ सऊदी अरब की लड़ाई में अब पाकिस्तान भी शामिल हो गया है.
पाकिस्तान सुन्नी बहुल इस्लामिक देश है. सऊदी अरब के साथ उसका क़रीबी रक्षा और रणनीतिक संबंध मक्का समझौते से पहले भी था. मुस्लिम देशों में पाकिस्तान को संभवतः सैन्य रूप से सबसे सक्षम देशों में से एक माना जाता है.
पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न और अहम सैन्य ताक़त है. पाकिस्तान अपनी ताक़त को भारत से मुक़ाबले के रूप में पेश करता है. पाकिस्तान सऊदी अरब की सशस्त्र सेनाओं को आर्मी ट्रेनिंग और हथियार उपलब्ध कराने वाला एक अहम देश भी है.
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दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, आर्थिक रूप से कमज़ोर पाकिस्तानी सरकार के लिए वित्तीय सहायता का एक बड़ा स्रोत रहा है.
हाल ही में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को आठ अरब डॉलर की वित्तीय मदद और निवेश दिया है, जो उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ है.
रक्षा साझेदार होने के साथ-साथ पाकिस्तान आर्थिक और जियो-पॉलिटिकली रूप से लगभग पूरी तरह सऊदी अरब पर निर्भर है.
1990 में पाकिस्तान ने इराक़ी आक्रमण से सऊदी अरब की रक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य बल में शामिल होने पर सहमति जताई थी. उस समय पाकिस्तानी सैनिकों ने सऊदी अरब के पवित्र स्थलों की सुरक्षा की थी.
इन सबके बावजूद अप्रैल 2015 में पाकिस्तानी संसद ने भी यमन के हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था.
तब पाकिस्तान के इस फ़ैसले से ईरान समर्थित विद्रोहियों के ख़िलाफ़ व्यापक सुन्नी मोर्चा बनाने की सऊदी की कोशिशों को झटका लगा था.
पाकिस्तान के सांसदों ने कहा था, "पाकिस्तान को यमन संघर्ष में तटस्थ रहना चाहिए, ताकि संकट को ख़त्म करने के लिए वह सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभा सके."
लेकिन इस बार पाकिस्तान मक्का समझौते के तहत हूती विद्रोहियों से मुक़ाबले के लिए सऊदी अरब में अपनी सेना भेजने पर तैयार हो गया है.
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पाकिस्तान अगर हूती विद्रोहियों से आमने-सामने लड़ता है तो इसका असर क्या होगा?
इसे पाकिस्तान के लिए बहुत ही जटिल स्थिति के रूप में देखा जा रहा है. हूतियों से सऊदी की लंबी लड़ाई है. अगर इसमें पाकिस्तान शामिल होता है तो उसे भी इस लंबी लड़ाई में जाना होगा.
पाकिस्तान को भारत के साथ तनाव, अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर झड़पों और देश के भीतर सशस्त्र समूहों के हमलों से निपटना पड़ रहा है.
इस्लामाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिसी स्टडीज के वरिष्ठ एसोसिएट और रिटायर्ड ब्रिगेडियर तुग़रल यामिन ने अल जज़ीरा से कहा कि समझौते की सीमाएं दोनों पक्षों पर लागू होती हैं.
उन्होंने कहा, "सैनिकों को भेजना मुश्किल होगा, क्योंकि पाकिस्तान की सेना बाहरी और आंतरिक ख़तरों के कारण पहले से ही ज़मीनी स्तर पर काफ़ी दबाव में है. यह भी अटकलों का विषय है कि क्या तुर्की सऊदी अरब में सैनिक भेजने के लिए अपनी सेना का कुछ हिस्सा बाक़ी देशों से हटाने को तैयार होगा. तुर्की की नेटो के प्रति अपनी प्रतिबद्धताएं हैं और सीरिया के साथ उसकी सीमा भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है."
हूती ईरान समर्थित हैं जबकि पाकिस्तान के पास तेहरान के साथ अपने संबंध बनाए रखने के कारण हैं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान तेल और गैस की उन आपूर्तियों पर भी निर्भर है, जिनके रास्तों को ईरान और हूती बाधित कर सकते हैं. इनमें होर्मुज़ स्ट्रेट और लाल सागर भी शामिल हैं. इसलिए हूतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में उतरने से युद्ध के मैदान से बाहर भी कूटनीतिक और आर्थिक जोखिम पैदा होंगे.
इसका यह मतलब अपने आप नहीं होगा कि पाकिस्तान ईरान के साथ युद्ध में उतर जाएगा, लेकिन इससे पाकिस्तान के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना और मुश्किल हो जाएगा.
किंग्स कॉलेज लंदन की रक्षा विश्लेषक और सीनियर फेलो आयशा सिद्दीक़ा ने ब्रिटिश न्यूज़ वेबसाइट द गार्डियन से कहा, "मुझे नहीं लगता कि असीम मुनीर ने इसके ख़तरों का सही आकलन किया था और यह भी नहीं सोचा था कि पाकिस्तान को इतनी जल्दी अपने सैनिकों को मोर्चे पर उतारने की ज़रूरत पड़ सकती है."
सऊदी अरब के पास लड़ाकू विमानों और युद्धक हथियारों का विशाल जखीरा है, जिसकी क़ीमत कई अरब डॉलर है, लेकिन उसके पास हूतियों से लड़ने का युद्ध अनुभव नहीं है. हूतियों ने खुद को मुश्किल हालात में लड़ने वाले और मज़बूत लड़ाके साबित किया है.
पाकिस्तान के अधिकारी इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि कहीं मुल्क मध्य-पूर्व में जारी अंतहीन युद्ध में न घसीट लिया जाए. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही बुरी तरह कमज़ोर है, वह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ वास्तविक युद्ध जैसी स्थिति में है और अपने सीमावर्ती इलाक़ों में बढ़ती उग्रवाद की समस्या का सामना कर रहा है, जिसे नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है.
सिद्दीक़ा कहती हैं, ''पाकिस्तान का हूतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल होना गंभीर नतीजों वाला होगा. ईरान के बाद पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी है. ऐसे में हूतियों के ख़िलाफ़ हमलों में पाकिस्तान की भागीदारी के विरोध में वहाँ प्रदर्शन होने की आशंका है.''
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इस्लामाबाद स्थित पाक इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज के निदेशक मुहम्मद आमिर राना ने द गार्डियन से कहा, "पाकिस्तान यमन की धरती पर किसी भी सैन्य अभियान में शामिल होने से बचने की पूरी कोशिश करेगा."
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''सऊदी अरब के लिए हूतियों को हराने का मतलब लंबे समय से चले आ रहे दुश्मन को ख़त्म करना होगा. हूतियों के हमलों से सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नुक़सान पहुंचने का ख़तरा है. वह डेटा सेंटर से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण तक की परियोजनाओं में अरबों डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहते हैं.''
''अन्य देशों के लिए हूतियों की हार लाल सागर में जहाज़ों के लिए मौजूद एक बड़े ख़तरे को ख़त्म कर देगा. हूतियों ने वर्षों से लाल सागर में समुद्री यातायात को प्रभावित किया है. 2023 में जब हूतियों ने पहली बार वहाँ जहाजों पर हमले शुरू किए, तो उन्होंने कहा था कि यह 7 अक्टूबर के हमास हमलों के बाद ग़ज़ा में इसराइल के सैन्य अभियान के जवाब में किया जा रहा है. शुरुआत में समूह ने कहा था कि उसका निशाना केवल इसराइल से जुड़े जहाज हैं. लेकिन ऐसे जहाज़ भी हमलों की चपेट में आए, जिनका इसराइल से कोई सीधा संबंध नहीं था.
''स्वेज कैनाल, लाल सागर और बाब अल-मंदेब के रास्ते से होकर जाने वाला समुद्री मार्ग यूरोप और एशिया के बीच यात्रा करने वाले जहाजों के लिए सबसे सुविधाजनक रास्ता है. लेकिन लाल सागर से पूरी तरह बचने के लिए अब कई शिपिंग कंपनियां अपने जहाज़ों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर के रास्ते भेज रही हैं. यह एक महंगा वैकल्पिक मार्ग है, जो हज़ारों मील लंबा है और यात्रा में दो सप्ताह तक का अतिरिक्त समय जोड़ सकता है.''
पाकिस्तान के एक अधिकारी ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से पिछले महीने 18 सितंबर को कहा था, "ईरान का कहना है कि यह सऊदी अरब और यमन के बीच का विवाद है. लेकिन ऐसा भी लगता है कि तनाव बढ़ना क्षेत्र में ईरान की नीति के अनुकूल है."
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एफ़टी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''ईरान की "प्रतिरोध की धुरी" के सबसे प्रभावशाली सदस्यों में शामिल यमन के हूती, तेहरान समर्थित अन्य लड़ाकों की तुलना में वैचारिक रूप से ईरानी शासन के साथ उतने मज़बूती से नहीं जुड़े हैं और मुख्य रूप से अपने घरेलू एजेंडे को आगे बढ़ाते रहे हैं. ईरानी अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हूती स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन उनका सैन्य अभियान वैश्विक ऊर्जा क़ीमतों को बढ़ाने के तेहरान के लक्ष्य को समर्थन देता है.
एफ़टी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''पाकिस्तान की ईरान के साथ बातचीत की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि इस्लामाबाद मुश्किल स्थिति में है. अप्रैल में पाकिस्तान ने पूर्वी सऊदी अरब के एक एयरबेस पर लड़ाकू विमानों और वायुसेना के जवानों को तैनात किया था.''
विश्लेषकों का कहना है कि 2015 में पाकिस्तान ने यमन में सऊदी नेतृत्व वाले हवाई हमलों में शामिल होने से इनकार कर दिया था, लेकिन मक्का समझौते के तहत उसकी प्रतिबद्धताओं और गंभीर वित्तीय कमज़ोरियों के कारण इस बार रियाद के अनुरोध का विरोध करना उसके लिए मुश्किल था.
सऊदी-पाकिस्तान संबंधों की स्टडी करने वाले बर्मिंगम यूनिवर्सिटी के रिसर्च फेलो उमर करीम का मानना है कि पाकिस्तान की कोई भी सहायता रियाद के इस फ़ैसले के बाद ही आएगी कि वह "यमन में पूर्ण युद्ध" में शामिल होना चाहता है या सीमित अभियान चलाना चाहता है.
करीम ने एफ़टी से कहा, "बड़े पैमाने पर युद्ध का मतलब होगा कि सऊदी बुनियादी ढांचे को कहीं बड़े स्तर पर हमलों का सामना करना पड़ेगा. अगर सऊदी पाकिस्तान से मदद मांगता है, तो पाकिस्तान सऊदी अरब को ड्रोन हमलों से बचाने के लिए हवाई अभियान में शामिल हो सकता है या यमन में हमले शुरू करने वाले ठिकानों को निशाना बना सकता है.''
हूतियों ने सऊदी अरब के साथ कई वर्षों तक युद्ध लड़ा था, जब सऊदी अरब ने विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अरब गठबंधन का नेतृत्व करते हुए यमन में हस्तक्षेप किया था. 2022 में दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम हुआ था. लेकिन विद्रोहियों ने जुलाई में इस समझौते को तोड़ दिया और घोषणा की कि वे सऊदी अरब के बंदरगाहों की नाकेबंदी कर रहे हैं और सऊदी तेल टैंकरों पर हमले कर रहे हैं.
हूतियों ने कई मांगें रखी हैं. इनमें यमन सरकार के नियंत्रण वाले क्षेत्रों से मिलने वाले तेल राजस्व तक उनकी पहुंच और विद्रोहियों के नियंत्रण वाले बंदरगाहों से यातायात के निर्बाध आवागमन की अनुमति शामिल है.
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