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बिन्यामिन नेतन्याहू के सातवीं बार इसराइल का प्रधानमंत्री बनने में ये हैं चुनौतियां

Ajay Tiwari
26 October 2026 • 0 • 15
बिन्यामिन नेतन्याहू के सातवीं बार इसराइल का प्रधानमंत्री बनने में ये हैं चुनौतियां

इमेज स्रोत, BBC/Getty Images

इसराइल में 27 अक्तूबर को संसदीय चुनाव होने वाले हैं. देश में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बिन्यामिन नेतन्याहू की नज़र अब सातवें कार्यकाल पर है.

77 साल के नेतन्याहू दशकों से ख़ुद को इसराइल के 'मिस्टर सिक्योरिटी' के रूप में पेश करते रहे हैं. लेकिन इस बार वह एक ऐसे समय में दोबारा प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं, जब बहुत से इसराइली सात अक्तूबर 2023 के हमास के नेतृत्व वाले हमलों को देश के इतिहास की सबसे बड़ी सुरक्षा विफलता मानते हैं.

इन हमलों के बाद नेतन्याहू ने हमास के साथ-साथ उसके सहयोगियों हिज़्बुल्लाह और ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध पर ध्यान लगाया है. इस बीच वह भ्रष्टाचार के आरोपों में चल रहे एक आपराधिक मुक़दमे का भी सामना कर रहे हैं. नेतन्याहू इन आरोपों से इनकार करते हैं.

चुनावी सर्वे बताते हैं कि नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन और उन्हें सत्ता से हटाने के लिए साथ आए विपक्षी दलों के गठबंधन के बीच मुक़ाबला क़रीबी हो सकता है. विपक्षी गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट और सेना के पूर्व प्रमुख गादी आइज़नकोट भी शामिल हैं.

इमेज स्रोत, Menahem KAHANA / AFP) (Photo by MENAHEM KAHANA/AFP via Getty Images

कई विवादों और राजनीतिक संकटों ने सत्ता पर नेतन्याहू की पकड़ को चुनौती दी है. इसके बावजूद उन्होंने एक ऐसे नेता की पहचान बनाई है, जो हर राजनीतिक संकट से बचकर निकल जाता है.

नवंबर 2022 में नेतन्याहू छठी बार प्रधानमंत्री चुने गए थे. वह इसराइल के इतिहास की सबसे दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं.

इससे पहले वह लगातार 12 साल तक प्रधानमंत्री रहने के बाद कुछ समय के लिए विपक्ष में चले गए थे.

लेकिन सत्ता में उनकी वापसी ने समर्थकों के इस भरोसे को और मज़बूत किया कि 'किंग बीबी' को राजनीति में हराना लगभग नामुमकिन है.

नेतन्याहू अब भी बहुत से दक्षिणपंथी और धार्मिक मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं. ये मतदाता उन्हें सुरक्षा के मामले में एक मज़बूत नेता मानते हैं.

उनकी सरकार ने धार्मिक शिक्षा में पूरा समय देने वाले अति-रूढ़िवादी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट बढ़ाने की भी कोशिश की है.

लेकिन सात अक्तूबर के हमलों का साया इस चुनाव पर मंडरा रहा है और इसके साथ ही नेतन्याहू की राजनीतिक अजेयता भी ख़तरे में दिखाई दे रही है.

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देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

नेतन्याहू ने माना है कि सात अक्तूबर 2023 की घटना को न रोक पाने की कुछ ज़िम्मेदारी उनकी भी है.

उनके प्रधानमंत्री रहते इसराइल ने अपने इतिहास का सबसे भयावह हमला झेला था.

हमास के नेतृत्व में हज़ारों बंदूकधारी ग़ज़ा की सीमा तोड़कर इसराइल में घुस आए थे. हमले में क़रीब 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बनाकर ग़ज़ा ले जाया गया.

लेकिन नेतन्याहू का कहना है कि हमलों तक पहुंचने वाली विफलताओं के लिए वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों समेत कई दूसरे लोग भी ज़िम्मेदार हैं.

उन्होंने आरोप लगाया है कि हमले से कुछ घंटे पहले सुरक्षा अधिकारियों ने जानबूझकर उन्हें नहीं जगाया.

नेतन्याहू के मुताबिक़, अधिकारियों को डर था कि वह इसराइली सेना को बड़े पैमाने पर तैनात करने का आदेश दे सकते हैं और इससे हालात बिगड़ सकते हैं.

ग़ज़ा में इसराइल के हमलों में कम से कम 74 हज़ार लोग मारे गए हैं. ये आंकड़े ग़ज़ा के हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र भरोसेमंद मानता है.

ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बड़े पैमाने पर निंदा की है.

सात अक्तूबर के हमले के बाद के वर्षों में ऐसी रिपोर्टों की संख्या बढ़ी है, जिनमें दावा किया गया कि नेतन्याहू को पहले से चेतावनियां दी गई थीं.

कहा गया कि ये चेतावनियां उनके अपने सुरक्षा प्रमुख और क्षेत्र के पड़ोसी देशों की तरफ़ से आई थीं. नेतन्याहू इससे इनकार करते हैं.

पिछले महीने इसराइली अख़बार 'हारेत्ज़' ने एक नई किताब के कुछ अंश प्रकाशित किए.

किताब में आरोप लगाया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के नेता ने हमले से 10 दिन पहले नेतन्याहू को फ़ोन किया था और हमास के किसी बड़े अभियान की योजना के बारे में चेतावनी दी थी.

नेतन्याहू के कार्यालय ने इस रिपोर्ट को "पूरी तरह झूठ" बताया है और कहा है कि वह अख़बार के ख़िलाफ़ मुक़दमा करेंगे.

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नवंबर 2024 में इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी आईसीसी ने नेतन्याहू के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था.

वह ऐसे चौथे वैश्विक नेता बने, जिनके ख़िलाफ़ आईसीसी ने गिरफ़्तारी वारंट जारी किया. इससे पहले रूस के व्लादिमीर पुतिन, सूडान के उमर अल-बशीर और लीबिया के मुअम्मर ग़द्दाफ़ी के ख़िलाफ़ ऐसे वारंट जारी हो चुके थे.

नेतन्याहू और इसराइल के पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के ख़िलाफ़ जारी वारंट पर इसराइल के लगभग सभी राजनीतिक पक्षों ने कड़ी नाराज़गी जताई थी.

ये वारंट सात अक्तूबर के हमास के हमलों के बाद ग़ज़ा में इसराइल की सैन्य कार्रवाई से जुड़े हैं.

इनमें "भुखमरी को युद्ध के तरीक़े के रूप में इस्तेमाल करने" के साथ हत्या, उत्पीड़न और दूसरे अमानवीय कामों जैसे मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के आरोप शामिल हैं.

नेतन्याहू और गैलेंट दोनों इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

बिन्यामिन नेतन्याहू का जन्म 1949 में तेल अवीव में हुआ था.

साल 1963 में उनका परिवार अमेरिका चला गया. उनके पिता बेंजियन एक जाने-माने इतिहासकार और यहूदी राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता थे. उन्हें अमेरिका में एक अकादमिक पद मिला था.

18 साल की उम्र में नेतन्याहू इसराइल वापस लौटे.

उन्होंने पांच साल तक सेना में काम किया और एक विशिष्ट कमांडो यूनिट 'सायेरेत मतकल' में कैप्टन बने.

साल 1972 में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने बेल्जियम के एक यात्री विमान को अगवा कर लिया था. विमान को इसराइल में उतारा गया था.

बंधकों को छुड़ाने के लिए की गई कार्रवाई में नेतन्याहू घायल हो गए थे. इसके बाद उन्होंने 1973 के मध्य पूर्व युद्ध में भी हिस्सा लिया.

साल 1976 में नेतन्याहू के भाई जोनाथन की युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के लिए चलाए गए अभियान का नेतृत्व करते हुए मौत हो गई.

जोनाथन की मौत का नेतन्याहू परिवार पर गहरा असर पड़ा और इसराइल में उनका नाम एक मशहूर क़िस्सा बन गया.

नेतन्याहू ने अपने भाई की याद में आतंकवाद विरोधी संस्थान शुरू किया.

साल 1982 में वह वॉशिंगटन में इसराइली दूतावास के उप प्रमुख बने.

इसके साथ ही उनका सार्वजनिक जीवन अचानक तेज़ी से आगे बढ़ने लगा.

अच्छी अंग्रेज़ी और अलग अमेरिकी लहजे के कारण वह जल्द ही अमेरिकी टेलीविज़न पर जाना-पहचाना चेहरा बन गए. वह इसराइल का पक्ष असरदार तरीक़े से रखने लगे.

साल 1984 में उन्हें न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया गया.

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साल 1988 में इसराइल लौटने के बाद नेतन्याहू राजनीति में आ गए.

उन्होंने लिकुड पार्टी के टिकट पर संसद यानी नेसेट का चुनाव जीता और उप विदेश मंत्री बने.

बाद में वह लिकुड पार्टी के अध्यक्ष बने.

इसराइल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या के बाद समय से पहले चुनाव कराए गए. साल 1996 में हुए इन चुनावों में जीत हासिल करके नेतन्याहू पहली बार प्रधानमंत्री बने.

वह इसराइल के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे. वह 1948 में इसराइल की स्थापना के बाद जन्म लेने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री भी थे.

नेतन्याहू ने इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच 1993 में हुए ओस्लो शांति समझौतों की कड़ी आलोचना की थी.

इसके बावजूद 1997 में उन्होंने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत हेब्रोन का 80 प्रतिशत हिस्सा फ़लस्तीनी प्राधिकरण के नियंत्रण में सौंप दिया गया.

उन्होंने क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक से इसराइल की सेना को और पीछे हटाने पर भी सहमति जताई.

इसके कारण दक्षिणपंथी पक्ष की ओर से उनकी कड़ी आलोचना हुई. हालांकि, इसराइल की सेना के अधिकतर इलाक़ों से पीछे हटने से पहले ही यह योजना विफल हो गई.

साल 1999 में नेतन्याहू ने तय समय से 17 महीने पहले चुनाव कराने का फ़ैसला किया.

इन चुनावों में लेबर पार्टी के नेता एहुद बराक ने उन्हें हरा दिया. एहुद बराक सेना में नेतन्याहू के कमांडर भी रह चुके थे.

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चुनाव हारने के बाद नेतन्याहू ने लिकुड पार्टी के नेता का पद छोड़ दिया. उनकी जगह एरियल शेरोन ने ली.

साल 2001 में शेरोन के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नेतन्याहू सरकार में वापस लौटे.

पहले उन्हें विदेश मंत्री और बाद में वित्त मंत्री बनाया गया.

साल 2005 में उन्होंने क़ब्ज़े वाले ग़ज़ा पट्टी क्षेत्र से इसराइल के हटने के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया.

उसी साल उन्हें एक और मौक़ा मिला.

एरियल शेरोन ने लिकुड पार्टी से अलग होकर 'कदीमा' नाम की एक नई मध्यमार्गी पार्टी बनाई. इसके कुछ समय बाद उन्हें गंभीर स्ट्रोक आया और वह कोमा में चले गए.

नेतन्याहू एक बार फिर लिकुड पार्टी के नेता चुने गए.

मार्च 2009 में वह दूसरी बार इसराइल के प्रधानमंत्री बने.

उन्होंने वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के निर्माण पर 10 महीने की रोक लगाने पर सहमति दी. हालांकि, इसमें कई तरह की छूट भी शामिल थीं.

इस अभूतपूर्व क़दम से फ़लस्तीनियों के साथ शांति वार्ता शुरू हो सकी, लेकिन 2010 के आख़िर तक बातचीत टूट गई.

साल 2009 में नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से कुछ शर्तों के साथ इसराइल के साथ-साथ एक फ़लस्तीनी राष्ट्र को स्वीकार करने की बात कही थी.

हालांकि, बाद में उनका रुख़ सख़्त हो गया.

उन्होंने 2019 में एक इसराइली रेडियो स्टेशन से कहा था, "जिस फ़लस्तीनी राष्ट्र की लोग बात कर रहे हैं, वह नहीं बनाया जाएगा. ऐसा नहीं होगा."

इस साल की शुरुआत में नेतन्याहू ने कहा कि हर कोई उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जानता है, जिसने "दशकों तक ऐसे फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना को रोके रखा, जिससे हमारे अस्तित्व को ख़तरा हो सकता था."

उन्होंने कहा कि इसराइल जॉर्डन नदी के पश्चिम में मौजूद पूरे क्षेत्र पर अपना पूरा सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखेगा.

इसमें ग़ज़ा और वेस्ट बैंक दोनों शामिल हैं और उनके मुताबिक़, यह नियंत्रण "चाहे कुछ भी हो" बना रहेगा.

नेतन्याहू के कार्यकाल के दौरान क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इसराइली बस्तियों का तेज़ी से विस्तार हुआ.

आलोचकों का कहना है कि इससे दो राष्ट्रों के समाधान तक पहुंचने की कोशिशें और मुश्किल हुई हैं.

साल 2022 में सत्ता में आने के बाद उनकी मौजूदा सरकार 100 से ज़्यादा नई बस्तियों को मंज़ूरी दे चुकी है.

सरकार के कार्यकाल में पहाड़ियों पर बिना अनुमति बनाई गई चौकियों और फ़ार्मों का भी तेज़ी से विस्तार हुआ है.

दो राष्ट्रों के समाधान का समर्थन करने वाले इसराइली संगठन 'पीस नाउ' ने कहा है कि सरकार ने "वेस्ट बैंक को वास्तव में अपने में मिलाने की प्रक्रिया को अभूतपूर्व रफ़्तार से आगे बढ़ाया है."

क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इसराइल की सभी बस्तियां और चौकियां अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत ग़ैर-क़ानूनी हैं.

ये चौकियां इसराइली क़ानून के तहत भी ग़ैर-क़ानूनी हैं. हालांकि, इनमें से कई को सरकार का समर्थन मिलता है.

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फ़लस्तीनी हमलों और इसराइल की सैन्य कार्रवाई के कारण ग़ज़ा पट्टी और उसके आसपास बार-बार टकराव हुआ.

ये टकराव 2009 में नेतन्याहू के सत्ता में लौटने से पहले भी हुए और उसके बाद भी जारी रहे.

नेतन्याहू अपने पूरे राजनीतिक जीवन में बार-बार कहते रहे हैं कि ईरान इसराइल के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.

तीन दशक से अधिक समय तक उन्होंने दावा किया कि तेहरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश कर रहा है.

वह दुनिया के नेताओं से ईरान की सरकार के ख़िलाफ़ और सख़्त रुख़ अपनाने की अपील करते रहे.

उनका यह लंबा अभियान फ़रवरी 2026 में अपने चरम पर पहुंचा, जब इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई मारे गए.

इसके जवाब में ईरान ने इसराइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी देशों पर हमले किए.

इसी दौरान हिज़्बुल्लाह के हमले के बाद लेबनान में एक नया युद्ध शुरू हो गया.

अप्रैल में पाकिस्तान की मध्यस्थता से युद्धविराम लागू हुआ.

जून में अमेरिका और ईरान के बीच एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए, लेकिन कुछ ही हफ़्तों में यह समझौता टूट गया.

इसके बाद से अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे पर हमले किए हैं और फ़िलहाल कोई नया समझौता लागू नहीं है.

मुक़दमे का साया

साल 2016 के बाद नेतन्याहू के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की जांच शुरू हुई.

नवंबर 2019 में जांच के बाद उन पर तीन अलग-अलग मामलों में रिश्वत लेने, धोखाधड़ी और विश्वास तोड़ने के आरोप लगाए गए.

नेतन्याहू किसी भी तरह की ग़लती से इनकार करते हैं.

उनका कहना है कि वह अपने विरोधियों की ओर से राजनीतिक मक़सद से चलाए जा रहे "विच हंट" का शिकार हैं.

मई 2020 में उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा शुरू हुआ. वह पद पर रहते हुए आपराधिक मुक़दमे का सामना करने वाले इसराइल के पहले प्रधानमंत्री बने.

नेतन्याहू ने राष्ट्रपति आइज़क हर्ज़ोग से माफ़ी देने की अपील की है.

लेकिन हर्ज़ोग ने कहा है कि पहले किसी समझौते के ज़रिए आरोप स्वीकार करने से जुड़ी कोशिशें होनी चाहिए.

छह साल से अधिक समय बाद भी यह मामला अनसुलझा है और मुक़दमे की सुनवाई जारी है.

न्यायपालिका में बड़े बदलाव की नेतन्याहू सरकार की विवादित योजनाओं के कारण भी इसराइल में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे.

सात अक्तूबर के हमलों से पहले इन प्रदर्शनों ने इसराइल की राष्ट्रीय पहचान और लोकतंत्र को लेकर गहरे मतभेद सामने ला दिए थे.

इसराइल एक बार फिर चुनाव की तैयारी कर रहा है, लेकिन ये मतभेद अब भी दूर नहीं हुए हैं.

इमेज स्रोत, Maâayan Toaf (GPO)/Handout/Anadolu via Getty Images

साल 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद इसराइल और अमेरिका की सरकारों की नीतियां एक-दूसरे के और क़रीब आ गईं.

एक साल के भीतर ट्रंप ने यरुशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने की घोषणा कर दी.

इस फ़ैसले से अरब देशों में भारी नाराज़गी फैल गई.

अरब देश पूर्वी यरुशलम पर फ़लस्तीनियों के दावे का समर्थन करते हैं. इसराइल ने 1967 के मध्य पूर्व युद्ध के बाद इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किया था.

फ़लस्तीनियों के दावे को संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन हासिल है. संयुक्त राष्ट्र पूर्वी यरुशलम को क़ब्ज़े वाली फ़लस्तीनी भूमि मानता है.

हालांकि, ट्रंप के इस फ़ैसले को नेतन्याहू के लिए घरेलू राजनीति और कूटनीति में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा गया.

जनवरी 2020 में नेतन्याहू ने इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांति के लिए ट्रंप की योजना को "सदी का अवसर" बताया.

लेकिन फ़लस्तीनियों ने इसे एकतरफ़ा बताते हुए ख़ारिज कर दिया और योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

ईरान के मामले में भी नेतन्याहू और ट्रंप की सोच मिलती रही है.

नेतन्याहू ने 2018 में ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने और आर्थिक प्रतिबंध दोबारा लगाने के ट्रंप के फ़ैसले का स्वागत किया था.

हालांकि, नवंबर 2020 में जो बाइडन को राष्ट्रपति चुनाव जीतने पर बधाई देने के बाद नेतन्याहू को ट्रंप की कड़ी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा.

ट्रंप ने नेतन्याहू पर वफ़ादार न होने का आरोप लगाया था.

इसके बाद दोनों नेताओं के रिश्ते सुधर गए, लेकिन उनकी दोबारा परीक्षा भी हुई.

अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में इसराइल का समर्थन किया.

उन्होंने भ्रष्टाचार के मामले में नेतन्याहू को माफ़ी देने की मांग की और कई बार व्हाइट हाउस में उनकी मेज़बानी की.

दोनों की सबसे हालिया मुलाक़ात जुलाई में हुई थी.

जनवरी 2025 में ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद नेतन्याहू उनसे आठ बार मिल चुके हैं. इस दौरान दुनिया का कोई दूसरा नेता ट्रंप से इतनी बार नहीं मिला है.

चुनाव से कुछ दिन पहले ट्रंप ने एक बार फिर नेतन्याहू के लिए अपना समर्थन ज़ाहिर किया.

अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक पोस्ट में ट्रंप ने नेतन्याहू का समर्थन किया.

उन्होंने नेतन्याहू को "एक महान योद्धा प्रधानमंत्री" बताया और कहा कि "भारी विरोध के सामने वह मज़बूत, बहादुर और प्रतिभाशाली रहे हैं."

सबसे बढ़कर इस चुनाव को इसराइल के सबसे ज़्यादा मतभेद पैदा करने वाले नेताओं में से एक पर जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है.

समर्थकों का मानना है कि इसराइल को सुरक्षित रखने के लिए अब भी बिन्यामिन नेतन्याहू की ज़रूरत है.

आलोचकों का कहना है कि नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने की कोशिश इसराइल को ख़तरे में डाल रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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