12‑13 सितंबर को दिल्ली में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन 11 प्रमुख देशों के नेताओं को एकत्र करेगा, जिनमें मेज़बान भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीका, चीन, रूस, ईरान, यूएई और सऊदी अरब शामिल हैं। अमेरिका BRICS का सदस्य नहीं है, परंतु राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियाँ और उनके व्यापारिक निर्णय इस समिट पर गहरा असर डाल सकते हैं।
अमेरिकी टैरिफ़ और ऊर्जा बाजार पर प्रतिबंधों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा की है। इस पृष्ठभूमि में BRICS के सदस्य देश, विशेषकर रूस और ईरान, ट्रम्प की नीतियों के प्रति संवेदनशील हैं, जबकि चीन और भारत ने व्यापारिक साझेदारी को मजबूत करने के प्रयास जारी रखे हैं।
समिट के दौरान BRICS को अमेरिकी नीतियों पर खुली आलोचना करने से परहेज़ करने की उम्मीद है। देश-विशेष के हित भिन्न होने के कारण, एक साझा बयान तैयार करना मुश्किल है। भारत, जो अभी भी अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते के अंतिम चरण में है, किसी भी ऐसे बयान से बचना चाहेंगे जो ट्रम्प के प्रति विरोधी हो।
भारत के लिए मुख्य चुनौती यह है कि क्या वह सभी सदस्य देशों की सहमति से एक संयुक्त बयान तैयार कर सकता है। 2023 में G20 की मेज़बानी के दौरान, भारत ने रूस‑यूक्रेन युद्ध पर अलग-अलग मत रखने वाले देशों के बीच सहमति बनाकर एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसका अनुभव इस बार उपयोगी होगा।
BRICS की सबसे बड़ी उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) है, जिसने विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचे के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। इसके अलावा, समूह ने 100 अरब डॉलर का रिज़र्व फंड भी स्थापित किया है, जिसका अभी तक उपयोग नहीं हुआ है। ये वित्तीय पहलें समूह की आर्थिक शक्ति को दर्शाती हैं।
समिट में डि‑डॉलराइज़ेशन, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की सुविधा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा हो सकती है। रूस और ईरान, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के अधीन हैं, इन विषयों में विशेष रुचि दिखा सकते हैं।
भारत की विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्यों में बहुपक्षीय व्यवस्था, बहुध्रुवीय दुनिया, विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और वैश्विक व्यापार का खुलापन शामिल हैं। इन लक्ष्यों को BRICS के एजेंडे के साथ समन्वित करना भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, विशेषकर चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए।
साथ ही, भारत-चीन, भारत-रूस और भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बैठकों का भी कार्यक्रम है। व्यापार घाटे, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे इन चर्चाओं के मुख्य विषय बन सकते हैं।
इस शिखर सम्मेलन को भारत के लिए एक कूटनीतिक और भू‑राजनीतिक परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है। यदि भारत समूह के भीतर एकजुट बयान तैयार कर सके और BRICS की उपलब्धियों को उजागर कर सके, तो यह भारत की वैश्विक स्थिति को सुदृढ़ करने में मदद करेगा।
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