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भारतीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर आई एक रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है.
इसके बाद कई विपक्षी नेताओं ने हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के अलावा 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को भी दोबारा कराने की मांग कर डाली.
कई जानकारों और विशेषज्ञों ने भी रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे 'लोकतंत्र के लिए चिंताजनक' बताया है.
'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक़, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फ़ैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की थी.
रिपोर्ट के मुताबिक़, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फ़ॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मामलों पर सवाल उठाए.
कुछ मामलों में उन्होंने कथित तौर पर ऐसे फ़ैसलों पर भी आपत्ति की, जिनके बारे में उनका कहना था कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी. यानी रिपोर्ट दावा करती है कि कुल मिलाकर वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (स्पेशन इंटेसिव रिवीज़न- एसआईआर) को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद हैं.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटा और चुनावी सॉफ़्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई थी. इस मामले में उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी को भी लिखा था.
हालांकि, चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के बाद कहा है कि आयोग के भीतर लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और अलग-अलग राय आना उसकी सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है.
आयोग का कहना है कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फ़ैसले, जिनमें एसआईआर से जुड़े फ़ैसले भी शामिल हैं, तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए.
इसी विवाद के बीच विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, एसआईआर को रोकने और पूरे मामले की जांच की मांग तेज़ कर दी है.
कुछ नेताओं ने इससे आगे बढ़कर उन राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है, जहां चुनाव हो चुके हैं.
सबसे ज़्यादा चर्चा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में दोबारा चुनाव कराने की मांग को लेकर हो रही है.
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देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
उद्धव ठाकरे:
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द कर दोबारा चुनाव कराने की मांग की है.
उन्होंने कहा कि नए चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाने चाहिए.
ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की भी मांग की.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों की आपत्तियों से विपक्ष की तरफ़ से पहले से उठाए जा रहे सवालों को बल मिला है.
उन्होंने कहा, "अब तक सिर्फ़ हम, यानी विपक्ष, ही ये बातें कहते रहे हैं. शायद देश के इतिहास में पहली बार ऐसा कुछ हुआ है. चुनाव आयोग में तीन चुनाव आयुक्त हैं और उनमें से दो, विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने कैबिनेट सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखकर शिकायत की है कि ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. ये बहुत गंभीर मामला है. लोकतंत्र की हत्या हो रही है... मैं दोनों का हिम्मत दिखाने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. अब हमारी मांग है कि ज्ञानेश कुमार को तुरंत जेल भेजा जाए और लोकतंत्र को बचाया जाए."
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव नवंबर 2024 में हुए थे. इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को 288 में से 237 सीटें मिली थीं. बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस राज्य के सीएम नियुक्त हुए थे.
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 2026 में हुए. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनी और तमिलनाडु में वर्तमान में तमिलगा वेत्री कज़गम (टीवीके) पार्टी की सरकार है और सी. जोसेफ विजय राज्य के मुख्यमंत्री हैं. कांग्रेस, वीसीके, और वाम दलों के समर्थन से यह सरकार बनी है.
यानी ठाकरे की मांग सिर्फ़ आने वाले चुनावों की प्रक्रिया पर सवाल उठाने की नहीं है. वह पहले हो चुके विधानसभा चुनावों को दोबारा कराने की मांग कर रहे हैं.
ममता बनर्जी:
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी राज्य में विधानसभा चुनाव दोबारा कराने की मांग की है.
उन्होंने कहा कि चुनाव एसआईआर से पहले वाली मतदाता सूची के आधार पर फिर से कराए जाने चाहिए.
ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ़्तारी की भी मांग की.
उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और चुनाव आयोग ने इस साल हुए बंगाल विधानसभा चुनाव को "लूट" लिया.
उन्होंने कहा, "ये बेहद शर्मनाक और गंभीर मामला है. हमने अपनी ज़िंदगी में ऐसा कभी नहीं देखा. मुख्य चुनाव आयुक्त को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए. उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. बीजेपी को समझना चाहिए कि वो हमारे संविधान को बर्बाद नहीं कर सकती. वो लोकतंत्र को खत्म नहीं कर सकती."
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अरविंद केजरीवाल:
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के संस्थापक अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली समेत कई राज्यों में फिर चुनाव की मांग की.
केजरीवाल ने कहा कि एसआईआर के तहत किए गए बदलावों को भी रद्द किया जाना चाहिए और तीन साल पुरानी मतदाता सूची बहाल की जानी चाहिए.
उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "हम मांग करते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को गिरफ़्तार किया जाए और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जाए. पिछले कुछ वर्षों में हुए सभी चुनाव रद्द किए जाएं और उन्हें दोबारा कराया जाए. चुनाव आयोग किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है. इसमें तीन सदस्य होते हैं. एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त. तीनों बैठकों में हिस्सा लेते हैं. फ़ैसले या तो सर्वसम्मति से लिए जाते हैं या बहुमत के आधार पर. तीनों में से किसी एक को अकेले फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं है. कोई एक व्यक्ति चुनाव आयोग को अपने हिसाब से नहीं चला सकता और न ही उसके अधिकारियों को अकेले आदेश दे सकता है. मुख्य चुनाव आयुक्त को अंग्रेज़ी में 'फ़र्स्ट एमंग इक्वल्स' कहा जाता है. यानी तीनों बराबर हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त सिर्फ़ बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और उनके पास कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं है."
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस मामले पर चुनाव आयोग और बीजेपी पर हमला बोला.
उन्होंने एक वीडियो जारी करके "वोट चोरी" को भारतीय लोगों के ख़िलाफ़ अपराध और संविधान पर सीधा हमला बताया.
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि जो किया जा रहा है वह ग़लत है और "समय आएगा" जब कार्रवाई होगी.
तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की है.
स्टालिन ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है.
उन्होंने एसआईआर को तुरंत रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी की.
स्टालिन ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें सामने आए तथ्यों से एसआईआर के बाद हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों पर गंभीर सवाल उठते हैं.
उन्होंने एक्स पर एक लंबी पोस्ट में लिखा, "विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर वोटर लिस्ट से करोड़ों लोगों के नाम हटाने के फ़ैसले का हम, डीएमके समेत विपक्षी दल लगातार विरोध करते रहे हैं. हर राज्य में चुनाव से कुछ महीने पहले जल्दबाज़ी में किए गए इस काम में कई गड़बड़ियां हुईं. पश्चिम बंगाल समेत कई राज्य जैसे रणक्षेत्र बन गए."
स्टालिन ने लिखा, "क़ानून के मुताबिक़, वोटर लिस्ट में संशोधन की जांच और उसे लागू करने का अधिकार इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अफ़सरों (ईआरओ) को है. लेकिन जो लोग योग्य मतदाता घोषित किए जा चुके थे, उनके नाम भी ईआरओ वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ पाए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके लिए इस्तेमाल होने वाली वेबसाइट पूरी तरह एक व्यक्ति के नियंत्रण में थी."
विपक्ष के इन आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज किया है.
आयोग ने कहा है कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जिन लिखित टिप्पणियों, सुझावों और आपत्तियों का ज़िक्र किया गया है, वे आयोग की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं.
आयोग के मुताबिक़, किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान चुनाव आयुक्तों की अलग-अलग राय हो सकती है.
लेकिन अंतिम फ़ैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए.
आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में एसआईआर समेत सभी प्रमुख मामलों पर लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से हुए.
यानी चुनाव आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की ओर से टिप्पणियां या आपत्तियां किए जाने से इनकार नहीं किया है, बल्कि उसका कहना है कि इन टिप्पणियों को अंतिम फ़ैसलों से अलग करके देखा जाना चाहिए.
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चुनाव आयोग के बयान के साथ-साथ बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि विपक्षी दलों ने चुनाव न जीत पाने की हताशा में संवैधानिक संस्थाओं पर वार करने और उन्हें बदनाम करने को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है.
उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग ने अपने पहले ही पैराग्राफ़ में साफ़ लिखा है कि सारे आधिकारिक और लोकतांत्रिक विचार-विमर्श होने के बाद अंत में एसआईआर का फ़ैसला सर्वसम्मति से हुआ."
"कुल मिलाकर कहानी इतनी है कि भारत का चुनाव आयोग या भारत की कोई भी संवैधानिक संस्था तानाशाही शासन के अधीन नहीं है. वे लोकतांत्रिक तरीके से काम कर रहे हैं और भारत के लोकतंत्र को बनाए हुए हैं."
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस घटनाक्रम को गंभीर बताया है.
पीटीआई के मुताबिक़ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि वैधानिक वोटर रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म-6 में किए गए बदलाव "बिल्कुल ग़लत और ग़ैरक़ानूनी" हैं.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने भी इस घटनाक्रम पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की विश्वसनीयता के लिए ये घटनाक्रम गंभीर हैं.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने भी इस घटनाक्रम पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की विश्वसनीयता के लिए ये घटनाक्रम गंभीर हैं.
इंडिया टुडे से बातचीत में क़ुरैशी ने कहा कि वो सारे फ़ैसले जो दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद लिए गए हैं उन फ़ैसलों को रद्द कर देना चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में हुआ ग़ैरक़ानूनी बदलाव भी रद्द होना चाहिए.
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