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देश जब स्वाधीन हुआ तो शिक्षा व्यवस्था राज्यों का विषय थी। तब केंद्र सरकार का ज्यादा ध्यान आईआईटी, आईआईएम और एआईआईएमएस जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों के गठन पर था। इंदिरा गांधी सत्ता में आईं तो उन्होंने शिक्षा को समवर्ती सूची में डालकर केंद्र के अधीन लाने का कानून बनाया। अब राज्यों को केंद्र की दिशा का अनुसरण करना होता है। लेकिन शिक्षा में सुधार के लिए केंद्र और राज्य दोनों के बीच समन्वय होना चाहिए।
यह बहुत अच्छा प्रयोग रहा है। मैंने एक योजना बनाकर एक साथ सौ केंद्रीय विद्यालय खुलवाए। जमीनें राज्य सरकारों ने दी और केंद्र ने स्कूल खोले। इसका पैसा हमने बचा रखा था।
शिक्षा समावेशी ही नहीं, सर्वग्राही भी होनी चाहिए। शिक्षा निशुल्क होगी, तभी सबके लिए सुलभ होगी। शिक्षा रोजगार से तो जुड़ी हो लेकिन इसका व्यवसायीकरण नहीं होनी चाहिए। शिक्षा का अर्थ संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास है, न कि सिर्फ कामगार पैदा करना। आईएमएफ से फंड लेकर जब शिक्षा में सुधार का सुझाव आया तो मैं उधार लेकर शिक्षा देने के पक्ष में नहीं था। मैंने में शिक्षा खर्च के लिए तीन फीसदी सेस लगाने का सुझाव दिया।
शिक्षा का संबंध समाज, इतिहास, मूल्य, संस्कृति-सभ्यता, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति से होना चाहिए। अफसोस किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हमने पहली बार शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दुरुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया। कई लोगों ने कहा कि नई शिक्षा नीति बनाइए। मैंने पुरानी शिक्षा नीति देखी तो नई नीति बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। शिक्षा नीति सिर्फ इस आधार पर बदलना ठीक नहीं कि इसे पूर्ववर्ती सरकार ने बनाया है। जहां जरूरी लगा, हस्तक्षेप किया और चीजों को सुधारा। दुनिया का सबसे बड़ा अभियान सर्वशिक्षा अभियान चलाया।
शिक्षा के साथ रोजगार भी जुड़ा है। सिर्फ कॉलेज खोलने और विश्वविद्यालय बनाने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा रोजगार देने वाली भी होनी चाहिए। भारत की शिक्षा पद्धति पांच छह हजार साल पुरानी है। यही वजह है कि लोग घूस देकर अध्यापक या कोई और नियुक्ति पा लेते हैं। जब लोग देखते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की शिकायतें हैं, हर जगह पैसे का बोलबाला है तो वे यही रास्ता अपनाने में संकोच नहीं करते। कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं।
शिक्षा अब सरकार की प्राथमिकता नहीं है। सड़क परिवहन का बजट लगातार बढ़ रहा है। निजी उद्योगीकरण प्राथमिकता में है इसलिए पैसा उसमें ज्यादा खर्च हो रहा है। लेकिन सड़क-पुल बनाने के लिए तो इंजीनियर तभी मिलेंगे जब देश में शिक्षा संस्थान होंगे। सूचना तकनीक के बाद अब आप एआई पर जोर दे रहे हैं लेकिन इसके लिए जरूरी मूल तत्व आपके पास नहीं है। तकनीक हम विदेश से चीन और अमेरिका से ला रहे हैं। बिजली और पानी जरूरत के मुताबिक अपर्याप्त है। विश्व गुरु बनना चाहते हैं लेकिन विकसित देश हमसे छह गुना आगे हैं।
हमारी प्रस्तावना थी कि देश में करीब दस हजार केंद्रीय विद्यालय खोले जाने चाहिए। साथ ही संविधान में एक संशोधन भी किया जाना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने पड़ोस के स्कूल में ही निशुल्क पढ़ेगा। उच्च शिक्षा का भी व्यसायीकरण नहीं होना चाहिए। शिक्षा में निजी क्षेत्र भी आगे आए और पैसा कमाए। लेकिन कमाई का एक निश्चित अनुपात शिक्षा के विकास में ही लगाए। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही नहीं होने चाहिए।
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