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रक्षाबंधन सिर्फ कलाई पर बंधने वाला एक धागा नहीं है। इसके पीछे भाई-बहन के प्रेम और विश्वास से लेकर कई पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक प्रसंग और देश के अलग-अलग हिस्सों की परंपराएं जुड़ी हैं। सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह त्योहार आखिर इतना खास क्यों है और इससे जुड़ी कौन-कौन सी कहानियां हैं? आइए जानते हैं...
रक्षाबंधन का त्योहार हर साल सावन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है, जो भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते को सम्मान देता है। रक्षाबंधन को प्यार से राखी भी कहा जाता है। यह एक प्रसिद्ध हिंदू त्योहार है, जो जाति और संप्रदाय की सीमाओं से आगे बढ़कर मनाया जाता है। संस्कृत से लिया गया 'रक्षाबंधन' शब्द 'रक्षा के बंधन' या 'रक्षा की गांठ' के अर्थ में इस्तेमाल होता है।
कृष्ण और द्रौपदी की कहानी महाभारत की कथा के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी। इसे देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया, ताकि खून रुक सके। प्रचलित मान्यता में इस कपड़े के टुकड़े को राखी के पवित्र धागे और रक्षा के भाव से जोड़ा जाता है। माता लक्ष्मी और राजा बलि की कहानी रक्षाबंधन की शुरुआत से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा बलि की भगवान विष्णु के प्रति भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके राज्य की रक्षा करने लगे। इसके लिए उन्हें अपने निवास से दूर रहना पड़ा। भगवान विष्णु की पत्नी माता लक्ष्मी उनसे दूर नहीं रहना चाहती थीं। कथा के अनुसार, उन्होंने ब्राह्मण महिला का रूप धारण किया और श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर राखी बांधी। इसके बाद उन्होंने राजा बलि को अपना भाई बताया। माता लक्ष्मी की बात जानकर राजा बलि ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस कथा को श्रावण पूर्णिमा पर राखी बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है। यमराज और यमुना की कहानी रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा मृत्यु के देवता यमराज और यमुना से जुड़ी है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, यमराज और यमुना भाई-बहन थे। एक बार यमुना ने अपने भाई यमराज को रक्षा सूत्र बांधा और उनकी लंबी उम्र की कामना की। इसी कथा को रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है। इंद्र और शुचि की कहानी एक अन्य पौराणिक कथा राजा इंद्र और राक्षसों के बीच हुए भयंकर युद्ध से जुड़ी है। कथा के अनुसार, युद्ध में इंद्र हारने लगे थे। तब इंद्र की पत्नी शुचि ने गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। इसके बाद इंद्र राक्षसों को पराजित करने में सफल हुए। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
सिकंदर और राजा पुरु की कहानी रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रचलित ऐतिहासिक कथा सिकंदर की पत्नी और हिंदू शासक राजा पुरु से जुड़ी है। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया था। बाद में सिकंदर और राजा पुरु के बीच युद्ध हुआ। प्रचलित कथा के अनुसार, युद्ध के दौरान राजा पुरु ने राखी के रिश्ते और अपनी बहन से किए वादे का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दे दिया। रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहानी मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं से जुड़ी है। मान्यता है कि रानी कर्णावती ने अपने पति की रक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी थी। कहा जाता है कि हुमायूं ने राखी की लाज रखी और रानी की मदद के लिए आगे बढ़ा। इसी कहानी को राखी के रिश्ते और उसकी लाज रखने की परंपरा से जोड़ा जाता है। राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक रक्षाबंधन के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग बंगाल विभाजन का है। जब ब्रिटिश सरकार बंगाल के विभाजन की योजना बना रही थी, तब प्रसिद्ध कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में राखी का इस्तेमाल किया। टैगोर ने हिंदुओं और मुसलमानों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने का आह्वान किया। इसके बाद ढाका, कोलकाता और चटगांव में लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर एकता का संदेश दिया। इस तरह राखी का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक भी बनी।
रक्षाबंधन से पहले बाजारों में अलग-अलग तरह की राखियां दिखाई देने लगती हैं। रंग-बिरंगे धागों से लेकर चांदी और सोने जैसी कीमती धातुओं से बनी राखियां भी बाजार में मिलती हैं। लोग राखी के साथ कार्ड और भाई-बहनों के लिए उपहार भी खरीदते हैं। रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी, सिंदूर या कुमकुम, अक्षत यानी बिना टूटे चावल के दाने, मिठाई, दीपक और अगरबत्ती रखी जाती है। सुबह की रस्मों में बहन भाई को तिलक लगाती है, उसकी आरती करती है और फिर उसकी कलाई पर राखी बांधती है।
रक्षाबंधन के अलावा श्रावण पूर्णिमा का दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग क्षेत्रीय परंपराओं और त्योहारों से भी जुड़ा है। नारली पूर्णिमा: श्रावण पूर्णिमा के दिन महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में नारली पूर्णिमा मनाई जाती है। मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है। यह दिन मछली पकड़ने के नए मौसम की शुरुआत से भी जुड़ा है। अवनि अवित्तम: अवनि अवित्तम दक्षिण भारत में श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। इसे खासतौर पर तमिल, केरल और कर्नाटक के ब्राह्मण समुदाय से जोड़ा जाता है। इस दिन पुराना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलकर नया धारण किया जाता है। इसे उपाकर्म भी कहा जाता है। इस दौरान वैदिक मंत्रों का पाठ और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। कजरी पूर्णिमा: कजरी पूर्णिमा उत्तर भारत में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जो श्रावण पूर्णिमा के आसपास मनाया जाता है। खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसकी परंपरा मिलती है। इस अवसर पर महिलाएं कजरी गीत गाती हैं, पूजा करती हैं और अच्छी फसल व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। झूलन पूर्णिमा: झूलन पूर्णिमा भगवान कृष्ण और राधा को समर्पित पर्व है। यह खासतौर पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मनाया जाता है। इस दौरान राधा-कृष्ण की मूर्तियों को फूलों से सजे झूले पर विराजमान कर झुलाया जाता है। संस्कृत दिवस: केंद्र सरकार ने श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में भी घोषित किया था। 1969 में इसे संस्कृत दिवस घोषित किया गया और 2001 से संस्कृत सप्ताह मनाने का निर्णय लिया गया।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुमान के मुताबिक, इस साल देश में राखी का कारोबार करीब 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। वहीं मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, गिफ्ट, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स समेत रक्षाबंधन से जुड़े पूरे बाजार का कारोबार 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रहने का अनुमान है। राजधानी दिल्ली की बात करें तो इस पूरे त्योहारी कारोबार में करीब 4,000 करोड़ रुपये का योगदान रहने की उम्मीद है। इस साल बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ विकसित भारत, नारी वंदन, आत्मनिर्भर भारत, लखपति दीदी, अमृत काल, ब्रह्मोस और राष्ट्र रक्षा सूत्र जैसे थीम वाली राखियां भी देखने को मिल रही हैं। साथ ही क्षेत्रीय कला और स्थानीय उत्पादों से बनी राखियां भी बाजार में हैं जैसे नागपुर की खादी राखी, जयपुर की सांगानेरी कला राखी, पुणे की बीज राखी, असम की चाय-पत्ती राखी, कोलकाता की जूट राखी और बिहार की मधुबनी कला राखी। इससे महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को भी त्योहार के कारोबार से जोड़ने का अवसर मिल रहा है।
भारत के अलावा कुछ देशों में भी धागे से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। नेपाल में जनै पूर्णिमा नेपाल में सावन की पूर्णिमा को जनै पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन पुरोहित लोगों की कलाई पर पवित्र धागा बांधते हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र में इसी अवसर पर रक्षाबंधन भी मनाया जाता है। बुल्गारिया, रोमानिया, मोल्दोवा और उत्तर मैसेडोनिया इन देशों में 1 मार्च को लाल और सफेद धागे से जुड़ी परंपरा मनाई जाती है। इसे बुल्गारिया में मार्तेनित्सा, रोमानिया और मोल्दोवा में मर्तिशोर और अलग-अलग क्षेत्रों में दूसरे स्थानीय नामों से जाना जाता है। लोग लाल-सफेद धागे से बनी छोटी वस्तु या कपड़े कलाई या शरीर पर पहनते हैं। यूनेस्को के अनुसार, यह परंपरा वसंत के आगमन, स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभकामनाओं से जुड़ी है। 2017 में यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
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