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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को 'फेल्ड प्रोडक्ट' कहा है.
एक निजी चैनल के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा, "पार्टी के नेता की साल भर में जितनी बार लॉन्चिंग होती है, उतनी श्रीहरिकोटा से भी नहीं होती."
नरेंद्र मोदी ने ये भी कहा कि जब दुनिया 'नई व्यवस्था' की तलाश कर रही है, तब कुछ लोग 'अव्यवस्था' का सपना देख रहे हैं और भारत की वैश्विक छवि को ख़राब करना चाहते हैं.
गुरुवार को ही गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गांधी पर तंज कसा. उन्होंने नई दिल्ली में यमुना से जुड़ी योजनाओं का उद्घाटन करते हुए राहुल गांधी के विदेश दौरों पर तंज़ करते हुए कहा, "मैं जनता के बीच रहता हूं, इसलिए हर छह माह में मुझे विदेश नहीं जाना पड़ता."
नरेंद्र मोदी और अमित शाह का एक ही दिन यानी गुरुवार को राहुल गांधी पर ये 'डबल अटैक' था. इस डबल अटैक की पृष्ठभूमि में कथित वोट चोरी के मुद्दे को लेकर हाल ही में हुआ प्रोटेस्ट है.
लेकिन इस साल हुए दो प्रमुख प्रोटेस्ट का चेहरा अभिजीत दीपके और नेहा बोरा भी रहे हैं.
ऐसे में ये सवाल अहम है कि मोदी और शाह सिर्फ़ राहुल गांधी को ही निशाना क्यों बना रहे हैं? क्या ये उनकी 'कांग्रेस मुक्त भारत' मुहिम का हिस्सा है और क्या इन बयानों के ज़रिए भारतीय डायस्पोरा (प्रवासी समुदाय) को भी कोई संकेत दिया जा रहा है?
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी लगातार राहुल गांधी पर आरोप लगाती रही है कि वो विदेश में भारत की छवि ख़राब कर रहे हैं.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को एक निजी टीवी के कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे.
उन्होंने इस कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा, "पता नहीं कांग्रेस कब तक अपने फेल्ड प्रोडक्ट की लॉन्चिंग के लिए देश को दांव पर लगाती रहेगी. कांग्रेस का ये परिवार उनकी पार्टी के लिए बोझ बन चुका है. कांग्रेस को लाइमलाइट में सिर्फ़ एक नेता को रखना है और ऐसा करके कांग्रेस अपने युवा सांसदों के साथ अन्याय कर रही है."
अपने इस संबोधन में नरेंद्र मोदी ने ये भी जताने की कोशिश की कि उनकी सरकार किसी तरह के आंदोलन के ख़िलाफ़ नहीं है.
मोदी ने कहा, "कांग्रेस के चलते सरकार के ईमानदार आलोचकों का भी नुकसान हो रहा है. ये लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. जो लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं, उनकी बात भी कांग्रेस के शोर में दब जा रही है. कांग्रेस वो परजीवी बन गई है, जो किसी और को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती. कांग्रेस पर दिमागी नक्सल का दबदबा है. पहले ये लोग जंगल का विनाश करते थे, अब देश का सर्वनाश कर रहे हैं."
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गुरुवार को ही गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा.
उन्होंने कहा, "बीजेपी की सरकार लगातार चुनकर आ रही है, तो इन लोगों के पेट में दर्द हो रहा है. ये लोग वोट चोरी का बहाना बनाकर घुसपैठियों का वोट बचाना चाहते हैं. ये लोग कभी ईवीएम तो कभी वोट चोरी का बहाना बनाते हैं, लेकिन अगले 30 साल तक हमारी सरकार बनेगी."
अमित शाह ने केरल, तेलंगाना, हिमाचल और तमिलनाडु का ज़िक्र करते हुए कहा, "जहां कांग्रेस या उसके सहयोग से सरकार बन जाती है, वहां चुनाव आयोग अच्छा हो जाता है, लेकिन जहां हार जाते हैं, वहां आयोग ख़राब हो जाता है. ये लोग आस-पास के प्रदेशों से कैडर इकट्ठा करके जनता के जनादेश को झुठला नहीं सकते."
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नरेंद्र मोदी और अमित शाह आख़िर हाल के दिनों में हुए आंदोलनों को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस पर इतने हमलावर क्यों हैं? और मोदी सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ राहुल गांधी जितने ही मुखर अभिजीत दीपके, नेहा बोरा और दूसरे युवा नेताओं पर क्यों चुप हैं.
इस सवाल के जवाब अलग-अलग विश्लेषकों से राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष होने से लेकर जेन-ज़ी की हाल के दिनों में दिखाई गई एकजुट ताकत तक में मिलते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं, वो चुनावी राजनीति में हैं. जबकि अभिजीत दीपके अभी सिर्फ़ एक इंफ्लुएंसर जैसी भूमिका में हैं. उन्होंने कहा है कि वो अभी चुनाव नहीं लड़ेंगे. नेहा की बात करें, तो उनका जुड़ाव एक पॉलिटिकल पार्टी से है, लेकिन वो स्टूडेंट पॉलिटिक्स में हैं."
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी भी कहते हैं, "ज़ाहिर तौर पर राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के पॉलिटिकल राइवल हैं, सीजेपी या नेहा नहीं. इसलिए राजनीतिक ताकत में इज़ाफ़ा या कमी अपने पॉलिटिकल राइवल पर निशाना साधकर ही होगी. अभिजीत दीपके और नेहा पर चुप रहकर बीजेपी किसी भी तरह के नुकसान से बचना चाहती है."
विजय कहते हैं, "अभी जेन-ज़ी का माहौल है. जेन-ज़ी के साथ विवाद में गए, तो हो सकता है कि भविष्य में वैचारिक स्तर पर सीजेपी कांग्रेस के ज़्यादा करीब आ सकती है. बीजेपी अभी सीजेपी को उसके हनीमून पीरियड में ही ख़ुश रखना चाहती है, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से शुरू हुआ है. नेहा बोरा पर हमला करके सरकार जेन-ज़ी की नाराज़गी मोल नहीं लेगी."
वहीं अख़बार दमें सहायक संपादक अरविंद शर्मा कहते हैं, "अपने प्रतिद्वंद्वी को इग्नोर करना, कभी-कभी रणनीति का हिस्सा होता है. मोदी जी भी वही कर रहे हैं, दीपके और नेहा पर साइलेंट रहकर. उनको इग्नोर किया जा रहा है, ताकि उनका भाव न बढ़े."
नेहा बोरा छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. ये छात्र संगठन सीपीआई (माले) से जुड़ा हुआ है.
पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य बीबीसी से कहते हैं कि सरकार स्ट्रैटिजी के तहत ऐसा कर रही है. वो कहते हैं, "मोदी और शाह जनता के आंदोलन से डरे हुए हैं. ये लोग जेन-ज़ी की ताकत से डरते हैं. अभी मोहन भागवत का पूरा भाषण भी नौजवानों के ख़िलाफ़ था. डरी सरकार की यही स्ट्रैटजी है."
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लेकिन क्या ये सिर्फ़ पॉलिटिकल राइवलरी है या कांग्रेस मुक्त भारत के बीजेपी के घोषित उद्देश्य की तरफ़ बढ़ाया गया एक रूटीन कदम है?
समाजशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कहते हैं, "कांग्रेस कमज़ोर ही सही, लेकिन उसकी पूरे भारत में उपस्थिति है. एसआईआर के मुद्दे पर सबसे ज़्यादा मोबिलाइज़ेशन कांग्रेस का रहा है. ऐसे में आंदोलनों का सबसे ज़्यादा फ़ायदा अगर किसी को मिलेगा, तो कांग्रेस को मिलेगा. वहां अभी एक ही नेता है, राहुल गांधी. इसलिए राहुल पर आक्रामक होकर और अभिजीत-नेहा पर एक कदम पीछे हटकर बीजेपी अपने बड़े एजेंडे पर काम कर रही है. यानी कांग्रेस मुक्त के ज़रिए विपक्ष मुक्त भारत बनाना."
लेकिन गुरुवार को नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में 'ईमानदार आलोचकों' शब्द का इस्तेमाल करते हुए आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति भी दिखाई. इसको कैसे देखा जाना चाहिए?
इस सवाल पर विजय त्रिवेदी कहते हैं, "सरकार दबाव में दिखती है. सरकार की कोशिश है कि आंदोलन का कोई बड़ा संगठित स्वरूप तैयार न हो. लेकिन छिटपुट आंदोलनों से सरकार को कोई दिक्कत नहीं है."
वहीं समाजशास्त्री पुष्पेंद्र कहते हैं कि सरकार लगातार आंदोलन को नकार रही है, लेकिन मोदी सरकार तीन आंदोलनों में बैकफुट पर भी आई.
वो कहते हैं, "सरकार बौखलाई हुई है. एक आंदोलन ख़त्म होता है, दूसरा शुरू हो जाता है. सीएए, किसान और स्टूडेंट पेपर लीक प्रोटेस्ट में सरकार को पीछे हटना पड़ा. सच्चाई ये है कि कोई आंदोलन सफल हो या असफल, वो नए आंदोलन के लिए स्पेस तैयार करता है और किसी भी सरकार को जन आंदोलन पसंद नहीं है."
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कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए नरेंद्र मोदी ने 'भारत की छवि ख़राब करने का आरोप' लगाया. वहीं अमित शाह ने राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर टिप्पणी की.
आम लोगों में भी राहुल गांधी की विदेश यात्राएं चर्चा में रहती हैं.
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "जैसे अभी सरकार दबाव में थी, उसी वक़्त जब राहुल गांधी विदेश जाते हैं, तो आंदोलनों को झटका लगता है. वहीं दूसरी तरफ़ सरकार को राहुल गांधी के मूवमेंट के बारे में जानकारी होती है, लेकिन वो इस तरह का राजनीतिक माहौल तैयार करती है कि राहुल गांधी एक नॉन-सीरियस नेता हैं. राहुल गांधी और उनकी टीम को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए."
लेकिन इस पूरी बहस में पुष्पेंद्र भारतीय डायस्पोरा का ज़िक्र लाते हैं.
वो कहते हैं, "मोदी को ये क्रेडिट जाता है कि उन्होंने ये साबित कर दिया कि कैसे डायस्पोरा भारत की अंदरूनी राजनीति को प्रभावित कर सकता है. उन्होंने इसको चैनलाइज़ किया और फंडिंग को नया उछाल दिया. चाइनीज़ डायस्पोरा के बाद इंडियन डायस्पोरा सबसे बड़ा है, ऐसे में मोदी को उसका बड़ा फ़ायदा भी हुआ. लेकिन बीते कुछ सालों में राहुल ने इस डायस्पोरा को पंक्चर भी किया है."
पुष्पेंद्र कहते हैं, "राहुल गांधी की विदेश यात्राएं बुरी नहीं हैं. ख़ामी इस बात में है कि उनकी टीम उनकी यात्राओं के बारे में ठीक से कम्युनिकेट नहीं कर पा रही है, जैसा मोदी की यात्राओं का कम्युनिकेशन होता है. कम्युनिकेशन में गैप के चलते कंफ्यूज़न होता है और राहुल गांधी की एक नॉन-सीरियस नेता की छवि बनती है, जो बीजेपी संगठन की 24 घंटे काम करने वाली छवि के बरक्स कहीं स्टैंड नहीं करती."
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