Retirement Planning: जिंदगी भर नौकरी और कमाई के बाद ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अपना घर और कुछ प्रॉपर्टी बच्चों के लिए छोड़कर जाएं। लेकिन अब परिवार का स्ट्रक्चर बदल रहा है। बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे शहरों या विदेश चले जाते हैं और माता-पिता उम्र बढ़ने के साथ बड़े घर और दूसरी प्रॉपर्टी की देखभाल में परेशान होने लगते हैं। ऐसे में कई रिटायर्ड लोग अब सवाल पूछ रहे हैं कि क्या रिटायरमेंट में करोड़ों की प्रॉपर्टी रखना जरूरी है? या उसे बेचकर पैसा सेफ और आसानी से संभालने वाले निवेश में लगाना बेहतर है?
भोपाल के 83 वर्षीय एस जगन्नाथ राव का मामला इसका अच्छा उदाहरण है। पत्नी के निधन के बाद वह तीन बेडरूम वाले घर में अकेले रह रहे थे, जबकि उनके दोनों बेटे बेंगलुरु में रहते थे। घर की देखभाल मुश्किल होती जा रही थी और बच्चों से दूर रहने का भी कोई खास मतलब नहीं था।
उन्होंने बेंगलुरु में नया घर खरीदने के बजाय भोपाल का घर बेचकर किराए पर रहने का फैसला किया। बिक्री से मिले पैसे को उन्होंने 54EC कैपिटल गेन बॉन्ड, सरकारी सिक्योरिटीज और एफडी में लगाया। उन्होंने आंध्र प्रदेश की पुश्तैनी संपत्ति भी बेच दी, जिससे वह भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे।
राव के मुताबिक, संपत्ति बेचने से उनकी जिंदगी आसान हुई। अब उनकी संपत्ति ऐसे निवेशों में है जिन्हें संभालना और जरूरत पड़ने पर बेचना आसान है। सबसे बड़ी बात यह कि भविष्य में उनके बच्चों को दूर बैठकर प्रॉपर्टी बेचने और उससे जुड़े कागजी काम की परेशानी नहीं होगी।
सिर्फ प्रॉपर्टी बेचने का चलन ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि कई बुजुर्ग डाउनसाइजिंग यानी बड़े घर को बेचकर छोटा और कंफर्टेबल घर खरीदने का विकल्प भी चुन रहे हैं।
नोएडा के 67 साल के एक व्यक्ति ने अपना दो मंजिला बड़ा बंगला बेचकर गेटेड सोसायटी में अपार्टमेंट खरीद लिया। उनका पुराना घर छह कमरों, दो किचन और पांच बाथरूम वाला था। कभी यही घर पूरे परिवार के लिए जरूरी था, लेकिन बच्चों के बाहर चले जाने के बाद वहां सिर्फ तीन बुजुर्ग रह गए।
घर की मरम्मत, सुरक्षा और लंबे समय तक खाली रहने की चिंता बढ़ने लगी। आखिरकार उन्होंने घर बेच दिया। नए अपार्टमेंट पर उन्होंने सेल से मिली रकम का करीब एक चौथाई हिस्सा ही खर्च किया और बाकी पैसा एफडी में लगा दिया। अब उन्हें सिक्योरिटी, बिजली का बैकअप, पानी और घर की मेंटेनेंस जैसी सुविधाएं मिलती हैं। यानी घर छोटा हुआ, लेकिन जिंदगी आसान हो गई।
रिटायरमेंट में एक्स्ट्रा घर को किराए पर देकर आमदनी करने का विचार अच्छा लगता है, लेकिन इसके साथ झंझट भी हैं। फाइनेंशियल एक्सपर्ट के मुताबिक रिहायशी प्रॉपर्टी का किराया आमतौर पर उसकी कीमत का करीब 2-3% सालाना होता है। इसमें मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स और मरम्मत का खर्च अलग है।
उम्र बढ़ने के बाद किरायेदार ढूंढना, किराया लेना या खाली घर की निगरानी करना भी मुश्किल हो सकता है। इसलिए रिटायरमेंट में आम सलाह यही है कि जिस घर में आप रहते हैं, उसे रखें। लेकिन अतिरिक्त प्रॉपर्टी सिर्फ इसलिए न रखें कि उसकी कीमत आगे बढ़ सकती है।
अगर किसी बुजुर्ग को अपनी पुरानी जगह छोड़ना नहीं है, लेकिन बड़े घर की देखभाल मुश्किल हो रही है, तो रीडेवलपमेंट एक विकल्प हो सकता है।
चेन्नई में पद्मा महादेवन के माता-पिता के परिवार ने ऐसा ही किया। पुरानी पुश्तैनी जमीन पर बने घरों को डेवलपर को देकर परिवार को बदले में फ्लैट और कैश रकम मिली। इससे उनके माता-पिता उसी इलाके में रह सके, लेकिन बड़े स्वतंत्र घर की देखभाल का बोझ खत्म हो गया। एक्स्ट्रा पैसे ने उनकी रिटायरमेंट लाइफ भी बदल दी। वे छुट्टियों पर जाने लगे और उनकी आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हो गई। साथ ही, संपत्ति को बच्चों के बीच बांटना भी आसान हो गया।
प्रॉपर्टी बेचकर मिला पैसा एक साथ किसी एक एफडी में डाल देना भी सही रणनीति नहीं है। पहले कैपिटल गेन टैक्स, मेडिकल जरूरतों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए रकम अलग रखें। इसके बाद बाकी पैसे को अलग-अलग जरूरत और समय के हिसाब से बांटा जा सकता है।
कुछ पैसा नियमित इनकम के लिए एफडी, सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम या पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम जैसे विकल्पों में रखा जा सकता है। वहीं, जो पैसा कई साल तक नहीं चाहिए, उसे व्यक्ति की जोखिम क्षमता के हिसाब से ग्रोथ वाले निवेश में रखा जा सकता है। सबसे जरूरी बात बच्चों को पैसा या प्रॉपर्टी देने की जल्दबाजी न करें। विरासत आसान बनाने के चक्कर में अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खत्म करना समझदारी नहीं है।
रिटायरमेंट में सवाल सिर्फ यह नहीं कि आपके पास कितनी प्रॉपर्टी है असली सवाल यह है कि उस प्रॉपर्टी से आपकी जिंदगी कितनी आसान हो रही है। अगर कई करोड़ की जमीन-जायदाद है लेकिन इलाज, रोजमर्रा के खर्च या देखभाल के लिए पैसा आसानी से उपलब्ध नहीं है, तो आप संपत्ति में अमीर लेकिन कैश के मामले में गरीब हैं।
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