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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने उज़्बेकिस्तान और भारत की यात्रा से पहले कहा है कि भारत के लिए रूस से एक दिन में (अचानक) ऊर्जा का आयात बंद कर देना मुश्किल होगा.
उन्होंने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इसके आयात में काफ़ी डाइवर्सिफ़ाई किया है.
अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत अमेरिका के लिए एक "महत्वपूर्ण सहयोगी" है, लेकिन फिर भी वह रूस से काफी मात्रा में ऊर्जा आयात कर रहा है.
उज़्बेकिस्तान के समरकंद जाने के बाद 19 से 22 अक्तूबर तक रुबियो भारत के दौरे पर रहेंगे.
इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ ऐसे प्रतिबंधों को कुछ समय के लिए टाल दिया है, जिनके तहत रूस से तेल और गैस ख़रीदने के लिए भारत और चार अन्य देशों पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाए जा सकते थे.
इन प्रतिबंधों को हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के युद्ध के लिए उसे दंडित करने के मक़सद से मंज़ूरी दी थी.
इस क़ानून के तहत ट्रंप को रूस से कच्चा तेल ख़रीदने वाले पाँच सबसे बड़े देशों से आने वाले सभी सामान पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था.
इसमें रूस की कई संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने और अमेरिका में रूस के ऊर्जा उत्पादों के सभी आयात पर 500 फ़ीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान भी था. इन प्रावधानों को लागू करने की एक महीने की समय सीमा 18 अक्तूबर को समाप्त होने वाली थी.
शुक्रवार को ट्रंप ने कानून के उन सभी प्रावधानों पर फ़िलहाल रोक लगा दी, जिनके तहत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले या मॉस्को को प्रतिबंधों से बचने में किसी अन्य तरह की मदद करने वाले कुछ देशों पर भारी शुल्क लगाया जा सकता था.
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विदेश मंत्री रविवार रात उज़्बेकिस्तान की राजधानी समरकंद पहुंचे, जहां वह सी5+1 समूह के शीर्ष अधिकारियों से मुलाक़ात करेंगे. इस समूह में अमेरिका और सोवियत संघ से अलग हुए पांच मुस्लिम बहुल देश उज़्बेकिस्तान, कज़ाखस्तान, किर्गिस्तान, ताज़िकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान शामिल हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, अमेरिकी अधिकारियों ने मध्य एशिया को ऐसा इलाक़ा बताया है जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है. यह इलाक़ा चीन, रूस और ईरान के बीच स्थित संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है."
रुबियो समरकंद से भारत के लिए आज (19 अक्तूबर) ही रवाना होंगे. उज़्बेकिस्तान के बाद रुबियो भारत के मुंबई और जामनगर शहरों का दौरा करेंगे. वहां वह रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष मुकेश अंबानी समेत कारोबारी नेताओं से मुलाकात करेंगे.
अंबानी ने इस साल की शुरुआत में टेक्सस में एक नई रिफ़ाइनरी का समर्थन करके ट्रंप प्रशासन का समर्थन हासिल किया था. रुबियो ने इससे पांच महीने पहले भारत का दौरा किया था.
रुबियो की यह यात्रा गुरुवार को समाप्त होने वाली है.
अमेरिकी विदेश मंत्री ने अपनी यात्रा शुरू करने से पहले वॉशिंगटन में कहा, "समस्या" यह है कि प्रतिबंध केवल रूस को ही नहीं, बल्कि भारत सहित अन्य देशों को भी निशाना बनाते हैं."
रुबियो ने कहा, "इसलिए मुझे लगता है कि राष्ट्रपति (ट्रंप) 60 दिनों की अवधि का उपयोग यह विश्लेषण करने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंध और टैरिफ़ लगाने का वैश्विक अर्थव्यवस्था और यहां तक कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा."
रुबियो ने कहा कि भारत जैसे देश "स्वेच्छा से अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाए हैं. लेकिन फिर भी भारत रूस से काफी मात्रा में एनर्जी हासिल कर रहा है क्योंकि एक दिन से दूसरे दिन तक पूरी तरह से बदलाव करना मुश्किल है."
चीन के बाद भारत दुनिया में रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है.
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ट्रंप ने पिछले महीने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 पर हस्ताक्षर किए थे. इस क़ानून का मक़सद यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर दबाव बढ़ाना था. इसके तहत बड़ी मात्रा में रूसी ऊर्जा ख़रीदने वाले देशों पर जु़र्माना लगाने का प्रावधान था.
भारत के विदेश मंत्रालय ने बिल पास होने के बाद तुरंत बयान जारी किया था. मंत्रालय ने कहा कि उसने अमेरिका के समक्ष इस मुद्दे को उठाया है और इस बात पर ज़ोर दिया है कि इसका असर न केवल द्विपक्षीय संबंधों, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है.
भारत के लिए इस क़ानून को एक धमकी के तौर पर देखा जा रहा था. इससे ट्रंप का दबाव बनाने का प्रभाव बढ़ा था, ख़ासकर ऐसे समय में जब वह रूस के साथ व्यापारिक समझौतों की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं.
पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति बाधित होने के बीच इसका महत्व और बढ़ गया था. भारत ने कई मौक़ों पर अमेरिका के सामने इस कानून को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं.
लेकिन ट्रंप के ताज़ा फ़ैसले से फिलहाल भारत को प्रस्तावित सख्त टैरिफ़ कार्रवाई से राहत मिली है. हालांकि इस मामले में अनिश्चितता अभी बनी हुई है क्योंकि 60 दिन की समीक्षा के बाद अमेरिका अपनी नीति बदल सकता है.
लेकिन भारत के पास अमेरिका के साथ बातचीत में अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और आर्थिक हितों को रखने का वक़्त मिल गया है.
कहा जा रहा है कि इस क़ानून को लागू करने से छूट देकर ट्रंप ने रूस के ऊर्जा उत्पादों के सबसे बड़े ख़रीदारों चीन, भारत और तुर्की के साथ संभावित टकराव से भी बचने की कोशिश की है.
अगस्त 2026 तक भारत, चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार था. ऐसे में संभावित अमेरिकी टैरिफ़ का सबसे ज़्यादा असर इन दोनों एशियाई देशों पर पड़ सकता है.
दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी जबकि भारत की हिस्सेदारी 37 फ़ीसदी थी.
जुलाई 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 फ़ीसदी से अधिक थी. ऐसे समय में जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर तेल की आवाजाही बाधित है, 30 दिनों के भीतर रूसी तेल पर निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम करना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है.
शुक्रवार रात जारी एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने कहा कि कुछ प्रतिबंधों को टालना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. ट्रंप ने सितंबर में प्रतिबंधों से जुड़े बिल पर हस्ताक्षर कर उसे क़ानून बनाया था और ये प्रतिबंध रविवार से लागू होने वाले थे.
यह घटनाक्रम ट्रंप के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नवंबर में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन से पहले अमेरिका में ऊर्जा की क़ीमतें कम करने के लिए अमेरिका रूस से डीज़ल आयात करेगा.
इन चुनावों से तय होगा कि अमेरिकी कांग्रेस में किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा. इस योजना ने सांसदों को चौंका दिया है और इसके ख़िलाफ़ दोनों प्रमुख पार्टियों के सांसदों ने विरोध जताया है.
भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी ज़रूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है.
रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत का रूसी तेल आयात तेजी से बढ़ा. फ़रवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिमी देशों के बड़े हिस्से ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बना ली थी.
इसके बाद रूस ने अपने तेल ख़रीदारों को अपने तेल पर छूट देना शुरू कर दिया. भारतीय रिफाइनरियों ने इस मौक़े का तेजी से फ़ायदा उठाया. इससे रूस, जो पहले भारत को तेल की सीमित आपूर्ति करने वाला देश था, पश्चिम एशियाई पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की जगह भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया.
इस व्यवस्था से दोनों पक्षों को फ़ायदा हुआ. रूस को कच्चे तेल के लिए एक बड़ा बाज़ार मिला, जिसे दूसरे देशों में बेचना मुश्किल हो सकता था. वहीं भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए आयात किए जाने वाले तेल की कीमत में मामूली कमी भी देश के कुल तेल आयात बिल पर बड़ा असर डाल सकता है.
इसके अलावा, ज्यादातर भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल को रिफ़ाइन करने के लिए तकनीकी रूप से अनुकूल हैं, जिसे भारत मुख्य रूप से आयात करता है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ पश्चिम एशिया संकट के दौरान रूसी तेल ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक मजबूत सहारा साबित हुआ, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई थी. युद्ध से पहले भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 40% हिस्सा आमतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता था.
इस जलमार्ग से ऊर्जा की आपूर्ति गंभीर रूप से सीमित होने के कारण इस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा प्रभावी रूप से बाधित हो गया है.
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