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यमन में हूती विद्रोही लगातार आगे बढ़ रहे हैं और सऊदी अरब पर हमले कर रहे हैं. इन हमलों के तेज़ होने के साथ ही ये सवाल उठने लगा है कि क्या तुर्की मक्का समझौते का पालन करते हुए सऊदी अरब का साथ देने के लिए उतरेगा.
मक्का समझौता तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ था. इसमें ये प्रावधान है कि किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा.
लेकिन तुर्की सरकार,मीडिया और तुर्की के विश्लेषकों के बीच इसे लेकर संदेह हैं.
इससे पता चलता है कि तुर्की फ़िलहाल यमन युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं होना चाहता. वो इस संघर्ष में घसीटे जाने से डर रहा है.
तुर्की ने अभी तक इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप करने के अपने इरादे का कोई संकेत नहीं दिया है. 8 सितंबर को उसने केवल हालिया तनाव की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया.
तुर्की मीडिया ने हूतियों के ख़िलाफ़ सऊदी अरब की रक्षा के लिए तुर्की के हस्तक्षेप की संभावना को कम करके आंका है.
एक विश्लेषक ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के हमले "इस समझौते को लेकर तुर्की की प्रतिबद्धता की परीक्षा लेने की कोशिश" हो सकते हैं.
जबकि दूसरे ने चेतावनी दी कि "इस संघर्ष में तुर्की का घुसना एक रणनीतिक गलती होगी.''
विपक्ष के करीबी एक मीडिया आउटलेट ने यमन युद्ध को "मक्का गठबंधन की पहली ख़ूनी कीमत" बताया है.
उसने चेतावनी दी है कि तुर्की को किसी विदेशी युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए.
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सामान्य तौर पर तुर्की का मीडिया मक्का गठबंधन के तहत समझौते को सक्रिय करने की संभावना को संदेह की निगाह से देखता है.
हालांकि सरकार के करीबी मीडिया संस्थानों ने सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष की कवरेज में रक्षा समझौता या तुर्की की भागीदारी की संभावना पर ध्यान केंद्रित नहीं किया.
रूढ़िवादी, सरकार समर्थक अख़बार येनी अकित ने "क्या यमन को लेकर मक्का का समझौता हो सक्रिय हो सकेगा?"
अख़बार ने इस मुद्दे को उठाते हुए लिखा कि उसने मुख्य रूप से सऊदी अरब की रक्षा में पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर फ़ोकस रखा. तुर्की के लिए संभावित नतीजों पर कोई चर्चा नहीं की.
वहीं तुर्की के एडमिरल सैम गुर्डेनिज ने हूतियों के ख़िलाफ़ मक्का समझौते के इस्तेमाल करने की अमेरिकी सीनेटर की अपील पर कहा, ''तुर्की को इस जाल में नहीं फंसना चाहिए.उसे यमन के दलदल नहीं घसीटा जाना चाहिए.''
उन्होंने लिखा,"तुर्की को हूतियों के साथ दुश्मनी में घसीटना और उसके साथ सैन्य टकराव एक रणनीतिक गलती होगी.अंकारा को डिप्लोमेसी और समुद्री व्यापार को बचाने की कोशिश करनी चाहिए न कि हूतियों के साथ टकराव लेना चाहिए.''
एक इस्लामी गैर-सरकारी संगठन के एक्टिविस्ट बेकिर सिदकी शाहिन ने भी चेतावनी दी कि मक्का समझौते में संयुक्त रक्षा प्रावधान तुर्की को इस संघर्ष में घसीट सकता है.
उन्होंने तर्क दिया कि यदि सऊदी अरब भविष्य में अब्राहम समझौते में शामिल हो जाता है, तुर्की अनजाने में खुद को इसराइल के साथ गठबंधन वाले क्षेत्रीय गुट का एक हिस्से में पा सकता है.
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तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मक्का समझौते पर दस्तख़त करते हुए कहा था कि संयुक्त रक्षा प्रावधान नेटो को आर्टिकल 5 के बराबर है लेकिन उन्होंने इस बात की पुष्टि नहीं कि ये ऑटोमैटिक लागू हो जाएगा.
समझ हस्ताक्षर करने के बाद कहा कि समझौते में संयुक्त रक्षा खंड तकनीकी रूप से उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के अनुच्छेद 5 के समान है, लेकिन उन्होंने यह पुष्टि नहीं की कि यह स्वचालित रूप से सक्रिय हो जाएगा.
उन्होंने कहा, "समझौते के टेक्स्ट में सामान्य दायित्व हैं.इन सामान्य दायित्वों को कैसे और किस रूप में लागू किया जाएगा.यह संबंधित पक्षों के बीच विचार-विमर्श और फ़ैसले के बाद लागू होगा.'
ईरान युद्ध और क्षेत्रीय संघर्ष के शुरू होने के कुछ महीनों बाद मक्का रक्षा समझौता हुआ था, जिसमें ईरान ने ईंधन निर्यात करने वाले खाड़ी देशों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे थे.
इस समझौते का मकसद किसी ग्रुप के ख़िलाफ़ सामूहिक बचाव को मजबूत करना है.
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