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मैं बुलेट चलाना सीख रही थी..
महानगरों में किसी प्लान्ड कॉलोनी के कन्स्ट्रक्शन से आप वाक़िफ ही होंगे, उनके रोड मैप से भी.
एक रोड, जिस पर पूरे दिनभर में दस-बारह दोपहिया और चार पहिया गाड़ियाँ ही गुज़रती थीं, सड़क चौड़ी होने के कारण बहुत सारी गाड़ियाँ वहाँ आराम फ़रमाया करती थीं.
ड्राइवर और गार्ड चादर बिछाकर ताश-लूडो खेलते रहते थे. यही पूरा वातावरण होता था और मैं वहाँ बुलेट चलाना सीख रही थी.
सीखते-सीखते चलाने की स्थिति आने लगी थी. मुझे भी अच्छा लगने लगा था...
गाड़ी भारी थी, तो जब बिना स्टार्ट किए गाड़ी आगे करनी या हल्का घुमाना या मोड़ना होता, तो बुलेट के साथ-साथ वहाँ बैठे-खेलते, पैदल चलते, स्कूटी-बाइक सवारों की भी आँखें घूमतीं और घूरतीं.
फिर भी मैं फ़ोकस रहकर बुलेट चलाना सीख रही थी.
ऐसे में एक दिन एक आदमी एक महिला को स्कूटी पर बैठाकर आ रहा था. वह मेरे सामने से आया. वह जिस तरह से आया, मुझे गाड़ी रोकनी पड़ी.
मेरे हेलमेट हटाने के बाद, जब उसने मुझे देखा और जिस तरह से मुझे इज्ज़त दी- वो शब्द मेरी खुशी और आत्मविश्वास को छेद गए.
किसी भी सूरत में कोई घटना उनके साथ घटती, ऐसी कोई संभावना नहीं बनी थी.
बस उनके बगल से तेज़ी से गुज़रना, मेरा आगे होकर रुकना- यहाँ तक उनकी हल्की-सी खीज होगी. लेकिन मेरे चेहरे से हेलमेट हटाते ही उनकी खीज गुस्से में बदल गई.
उन दस-बारह शब्दों को अगर छोड़ दें, तो मुझे बस यही याद है कि औरत हो और 'तुम' बुलेट चला रही हो.
चेहरे का वह भाव और घृणा मुझे अभी भी याद है.
यह लाइन लिखने के बाद मुझे उनके साथ बैठी महिला का चेहरा भी याद आया कि किस तरह से उसने तिरस्कार का भाव रखा था.
उनका ग़ुस्सा यह नहीं था कि मैं गाड़ी सीख रही थी. उनके ग़ुस्से की वजह में दो ही कारण मुझे समझ में आए थे- "मेरा औरत होना और बुलेट सीखना."
उन्होंने स्कूटी सीखने की 'सलाह' भी दी थी!
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ख़ैर, ये सब यादें इसलिए ताज़ा हो गईं कि अभी हाल में गुरुग्राम में हिट एंड रन की घटना वायरल हुई. मैंने भी वो वीडियो देखा.
घसीटती-घूमती चालक दिखी. अगर कैमरा नहीं लगा होता, तो यह नहीं पता चलता कि कौन-सी गाड़ी कितनी दूरी से, किस लेन से, किस एंगल से आई है.
कितने भद्दे एक्सप्रेशन दिए गए.
ख़ैर, इसमें एक वायरल क्लिप को देखने के बाद का अनुभव था.
लेकिन यह भी उतना ही आम जीवन में देखा जा सकता है कि अगर आप अपने सहकर्मी, पड़ोसी, रिश्तेदार के साथ कहीं जा रहे हैं, तो आपने यह ज़रूर सुना होगा- "देखा न! आंटी है, आंटी! तब न ऐसे गाड़ी चला रही..."
जाम लगने या किसी कारण से गाड़ी स्लो करने के बाद अगर सामने, आगे या बगल में कोई महिला चालक हुई, तो एक अजीब-सा रिएक्शन अपने बगल से या ड्राइविंग सीट पर बैठे पुरुष चालक से सुना और देखा है.
मैंने छोटी-बड़ी गाली के बिना कभी भी ग़ुस्से-खीजते नहीं सुना, न देखा.
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एक बार तो ऐसा हुआ कि एक सीनियर सहकर्मी ने महिला के गाड़ी चलाने के सामाजिक नुकसान के ब्यौरे सुनाते हुए लगभग घंटे भर की यात्रा पूरी कर दी.
हमारे एक सीनियर कर्मचारी से उनके पति यह कहते रहे कि "गाड़ी बहुत कंसन्ट्रेशन माँगती है, तुम्हारा दिमाग़ तो बहुत उलझा रहता है."
उन्हें गाड़ी चलाते हुए चौदह साल हो गए, पर उनके आर्किटेक्ट पति आज तक उनकी ड्राइविंग में कोई भी यात्रा सहज महसूस नहीं कर पाए.
अपनी शादी को वो सफल कहती हैं पर "गाड़ी चला सकती हूँ" यह उनसे सुनने में मुझे सफलता नहीं मिल सकी है.
वहीं, फोटोग्राफ़्री और फ़िल्म की अच्छी समझ रखने वाली एक एकेडमिशियन को उनकी सास ने मेडिकल इमरजेंसी में भी उनके साथ जाने के लिए भयंकर आनाकानी की.
वह बताती हैं कि उनकी सास ने उसी वक्त अपने बेटे को कॉल किया और उन्हें कहा कि "मैं बस से जाना चाहूँगी, पर इसके साथ नहीं."
उस वाक़ये को वह आज तक नहीं भूल पाई हैं.
किसी तरह बेटे ने समझा कर, क़सम देकर गाड़ी में बैठाया. तब सीट बेल्ट लगाने के लिए वे आई तो उनकी सास ने कहा कि "तू मार कर ही मानेगी".
इस क्रम में उन्हें यह भी बुरा लगा कि एक व्यक्ति जो बेटा भी है पति भी है, उसने बेटा बन कर माँ को संभाला लेकिन पति बनकर उन्होंने अपनी पत्नी की क्षमता के प्रति विश्वास दिलाने की कोशिश नहीं की.
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देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
ख़ैर, समाचार में जो कुछ सामने आया है, वह अचानक पैदा हुआ कोई विकार नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक विचारों में जमा वही मवाद है, जो मौका मिलते ही बाहर निकल आता है.
असली समस्या गाड़ी चलाने की नहीं है; समस्या यह है कि गाड़ी जैसी भारी मशीन को पुरुष सत्ता ने वर्षों से अपने अधिकार-क्षेत्र की वस्तु मान रखा है.
सड़क हो, मशीन हो या निर्णय लेने का अधिकार, जहाँ भी स्त्री बराबरी से दिखाई देती है, पितृसत्ता को अपनी जमीन खिसकती महसूस होने लगती है.
छोटे गाँव-कस्बों में जब स्कूली लड़कियाँ साइकिल चलाकर निकलती थीं, तो जवान लड़कों के लिए वह उनकी शिक्षा या स्वतंत्रता का दृश्य नहीं, मज़ाक और छेड़छाड़ का अवसर बन जाता था.
शहरों में वही मानसिकता थोड़ी सभ्य भाषा और बड़े वाहन के भीतर बैठकर सामने आती है.
स्त्री जब भारी मशीन चलाती है, सड़क पर अपना रास्ता खुद चुनती है, तो कुछ पुरुषों को ऐसा लगता है मानो उनकी सत्ता को ही कोई पहियों तले रौंद रहा हो.
दरअसल, उन्हें सड़क पर चलती स्त्री से नहीं, अपने भीतर बैठे उस पुरुष-अधिकार के ढहने से डर लगता है, जिसे उन्होंने पीढ़ियों से स्वाभाविक मान रखा है.
(डॉ. तेजी ईशा एसजीटी यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)
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