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जानिये सुभाष चंद्रा कैसे दीवालिया होने तक फंसते चले गए

Ajay Tiwari
01 September 2026 0 28
जानिये सुभाष चंद्रा कैसे दीवालिया होने तक फंसते चले गए

भारत में टेलीविजन मनोरंजन की बुनियाद रखने वाले सुभाष चंद्रा की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. 1990 के दशक में जब देश में केबल टीवी का दौर शुरू भी नहीं हुआ था, तब उन्होंने निजी सैटेलाइट चैनल 'Zee टीवी' की शुरुआत करके भारतीय घरों के मनोरंजन का कैनवास हमेशा के लिए बदल दिया. लेकिन जिस सुभाष चंद्रा ने मीडिया जगत में अपनी सूझबूझ का लोहा मनवाया, वही बाद में बिजनेस लोन के ऐसे भंवर में उलझ गए कि जिसने उनके तीन दशकों के बनाए साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया.

सुभाष चंद्रा के बिजनेस साम्राज्य में दरार तब पड़नी शुरू हुई जब उन्होंने अपने मूल और सबसे सफल कारोबार यानी मीडिया से हटकर बिल्कुल अनजाने सेक्टर्स में दांव लगाना शुरू किया. मीडिया से मिलने वाले भारी मुनाफे के भरोसे उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर, हाईवे निर्माण, पावर ट्रांसमिशन और सोलर एनर्जी जैसे क्षेत्रों में उतरने का फैसला किया.

इन सभी क्षेत्रों के लिए भारी-भरकम पूंजी और प्रॉफिट के लिए लंबा इंतजार एक अनिवार्य शर्त है. इन प्रोजेक्ट्स को खड़ा करने के लिए सुभाष चंद्रा को बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी. इसके लिए उन्होंने अपनी सबसे मजबूत और मूल्यवान संपत्ति Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) में अपनी प्रमोटर हिस्सेदारी और शेयरों को गिरवी रखना शुरू कर दिया. जब तक शेयर बाजार में Zee का परफॉर्मेंस मजबूत रहा, तब तक सब कुछ ठीक चलता दिख रहा था, लेकिन जैसे ही इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी हुई और घाटा बढ़ा, Zee ग्रुप का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया.

कर्जों का दुष्चक्र और शेयरों का पतन

वर्ष 2019 की शुरुआत में यह बात खुलकर सामने आ गई कि सुभाष चंद्रा का ग्रुप करीब 45,000 करोड़ रुपये के भारी कर्ज के नीचे दबा हुआ है. संकट तब और गहरा गया जब जनवरी 2019 में एक संदिग्ध कंपनी से ग्रुप के जुड़ाव की खबरें आईं. इस खबर से शेयर बाजार में भारी डर फैला और उनकी कंपनियों के शेयरों में अचानक भारी गिरावट आ गई. Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) का शेयर देखते ही देखते 26% से ज्यादा टूट गया. डिश टीवी (Dish TV) का शेयर करीब 33% तक नीचे आ गिरा.

शेयरों की कीमतें गिरते ही कर्ज देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थाओं (लेंडर्स) में अफरा-तफरी मच गई. नियम के मुताबिक, गिरवी रखे शेयरों का मूल्य कम होते ही बैंकों ने सुभाष चंद्रा से अतिरिक्त रकम या एसेट्स की मांग की. जब सुभाष चंद्रा गिरवी रकम का संतुलन नहीं बना पाए, तो बैंकों ने अपना पैसा वसूलने के लिए उनके गिरवी रखे शेयरों को बाजार में बेचना शुरू कर दिया. शेयरों की इस बिकवाली ने बाजार में कीमतों को और नीचे गिरा दिया, जिससे कर्ज का संकट एक कभी न खत्म होने वाले दुष्चक्र में बदल गया.

पर्सनल गारंटी देकर कैसे फंसे सुभाष चंद्रा

कारोबार में भारी घाटा और शेयरों की बिकवाली अपनी जगह थी, लेकिन सुभाष चंद्रा के लिए सबसे बड़ा संकट बनी उनकी 'पर्सनल गारंटी'. आमतौर पर किसी कंपनी का कर्ज कंपनी की अपनी संपत्तियों तक सीमित होता है. लेकिन जब उनकी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को बाजार से आसानी से कर्ज नहीं मिल रहा था, तब सुभाष चंद्रा ने खुद आगे आकर अपनी व्यक्तिगत गारंटी दी.

लिखित में दी गई इस गारंटी का सीधा अर्थ यह था कि यदि कंपनियां बैंकों का पैसा नहीं लौटा पाती हैं, तो सुभाष चंद्रा अपनी निजी संपत्ति और व्यक्तिगत हैसियत से उस कर्ज की भरपाई करेंगे. उनके इस फैसले ने कंपनियों के घाटे को सीधे उनकी अपनी जेब और निजी पहचान से जोड़ दिया. जब कंपनियां डिफ़ॉल्ट हुईं, तो लेनदारों ने कंपनियों के साथ-साथ सीधे सुभाष चंद्रा पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया. जिससे आज सुभाष चंद्रा यह कहकर बचना चाह रहे हैं कि मेरा लोन तो सिर्फ चार हजार करोड़ रुपए के करीब का था, बाकी तो गारंटी वाले मामले हैं.

कर्ज चुकाने से लेकर कर्जमाफी तक का सफर

संकट गहराने पर सुभाष चंद्रा ने अपने कर्ज को कम करने की कोशिशें शुरू कीं. उन्होंने अपने सोलर पॉवर प्लांट, हाईवे प्रोजेक्ट्स और अन्य संपत्तियां बेचीं. यहां तक कि Zee एंटरटेनमेंट में अपनी बड़ी हिस्सेदारी भी बेचनी पड़ी, जिससे Zee पर से उनका खुद का मालिकाना हक खत्म हो गया. सुभाष चंद्रा का दावा है कि उन्होंने और उनके ग्रुप ने अलग-अलग संपत्तियां बेचकर मूल 45,000 करोड़ रुपये में से लगभग 43,000 करोड़ रुपये लेंडर्स को लौटा दिए हैं.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. वर्ष 2022 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने उनकी पर्सनल गारंटी के आधार पर उनके खिलाफ व्यक्तिगत दिवालियापन (Personal Insolvency) की अदालती प्रक्रिया शुरू कर दी. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में मामला पहुंचने पर एक चौंकाने वाला मोड़ आया.

NCLT के सामने लेनदारों का कुल दावा लगभग ₹22,006 करोड़ का था. जिसमें सुभाष चंद्रा की पर्सनल गारंटी वाली देनदारियां शामिल थीं. लेकिन, ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्रा को उनकी व्यक्तिगत आर्थिक हैसियत के मुताबिक मात्र 6.25 करोड़ रुपए का भुगतान और 25 लाख रुपए अतिरिक्त प्रोसेस फीस चुकाकर तमाम देनदारियों से मुक्त कर दिया.

क्यों विवादों में आई ‘देनदारों’ की वोटिंग

सुभाष चंद्रा को मिली कर्जमाफी में सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला मामला रहा बड़े ‘देनदारों’ का उनके पक्ष में वोटिंग करना. इस पहलू को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि कॉर्पोरेट लेंडिंग सिस्टम में कर्ज देने वाली संस्थाओं और इकाइयों के पास वोटिंग का अधिकार होता है. जितना बड़ा कर्ज, वोटिंग में उतना हिस्सा. सुभाष चंद्रा को कर्ज देने वालों की फेहरिस्त में 23 देनदारों की सूची है. जिसमें HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, IDBI बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस, यूनियन बैंक जैसी बैंकिंग और फाइनेंस इकाइयां थीं. लेकिन, कर्ज के आकार के मुताबिक इनकी वोटिंग में हिस्सेदारी उतनी बड़ी नहीं थी. इसे ऐसे समझिए कि सबसे बड़ा वोट LIC हाउसिंग फाइनेंस का था, वो भी सिर्फ 6 प्रतिशत. और इन सभी इकाइयों ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ वोट किया.

जबकि, अंजान नामों वाले देनदारों ने सुभाष चंद्रा के हक में वोट करके फैसले का रुख बदल दिया. इनमें वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर का ही वोट 28.49 प्रतिशत था. जो कि सभी बैंकों और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस की देनदारियों पर भारी पड़ गया. इसके अलावा 16.85 प्रतिशत वोट वाले लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स, 11.85 प्रतिशत वोट वाले कैटेलिस्ट ट्रस्टीशिप, और 10.30 प्रतिशत वोटिंग अधिकार वाले कॉर्पकॉल एडवाइजर्स ने सुभाष चंद्रा की इनसॉल्वेंसी के हक में वोट किया. और वोटिंग में महज 20 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बैंक अपना पैसा डूबते देखते रह गए. कुलमिलाकर, बड़े ‘देनदारों’ ने सुभाष चंद्रा के फेवर में वोट करके अपना कर्ज डूब जाने दिया, जबकि वोटिंग में छोटी हिस्सेदारी होने के बावजूद बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस अपने कर्ज की वसूली पर अडिग रहे और सुभाष चंद्रा के प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया.

दीवालिया होना भी ‘माफी’ के काबिल नहीं रहा

NCLT से 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान पर पर्सनल गारंटी से राहत मिलने के बावजूद सुभाष चंद्रा की मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं. कर्ज देने वाले बैंक और वित्तीय संस्थान इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत यानी NCLAT (National Company Law Appellate Tribunal) में चुनौती दे रहे हैं. बैंकों का साफ कहना है कि यदि देश का इतना बड़ा प्रमोटर अपनी पर्सनल गारंटी से 99.97% की माफी लेकर निकल जाएगा, तो भविष्य में पर्सनल गारंटी शब्द का कोई मूल्य ही नहीं रह जाएगा.

NCLAT में मामला पहुंचता, उससे पहले NCLT ने खुद अपने पुराने फैसले पर विवाद को देखते हुए पांच सदस्यीय बैंच का गठन कर दिया. मंगलवार को इस मामले में फिर कार्यवाही शुरू हुई और नई बेंच ने सबसे पहले NCLT के पिछले आदेश पर रोक लगा दी. साथ ही सुभाष चंद्रा को आदेश दिया कि गारंटर के तौर पर वे अपनी संपत्तियों को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तौर पर ट्रांसफर ना करें.

सुभाष चंद्रा की यह पूरी दास्तान दिखाती है कि कैसे एक कारोबारी की अत्यधिक महत्वाकांक्षा, अनजान क्षेत्रों में दांव लगाने की जिद और पर्सनल गारंटी देने का फैसला, उनके 30 सालों के बने-बनाये साम्राज्य को लील गया. आज Zee पर उनका नियंत्रण खत्म हो चुका है और 99.97% कर्जमाफी का फैसला भी अदालती लड़ाइयों में उलझा हुआ है.

About Ajay Tiwari

Senior Editorial writer covering tech innovations, space exploration, and emerging digital trends. Delivering deep analytical insights for premium global readers.

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