चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का एक बुनियादी सिद्धांत है- पार्टी कंट्रोल्स द गन (The Party commands the gun). इस थ्योरी को देने वाले हैं चीन के सर्वोच्च नेता रहे माओ जेदांग. ये थ्योरी माओ जेदांग से लेकर मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शासन प्रणाली का आधार रही है. इस थ्योरी का साफ साफ मतलब यह है कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी सारे प्रतिष्ठानों में सबसे ज्यादा शक्तिशाली है और सेना को कंट्रोल कम्युनिस्ट पार्टी करेगी. न कि सेना कम्युनिस्ट पार्टी को कंट्रोल करेगी.
आधुनिक चीन के नेता माओ जेदांग का प्रसिद्ध कथन है- 'राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है, लेकिन बंदूक को पार्टी नियंत्रित करती है.' (Political power grows out of the barrel of a gun, but the Party must control the gun.) इसका सीधा मतलब है. चीन की सेना यानी कि पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी हमेशा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर रहेगी. सेना पार्टी के राजनीतिक लक्ष्यों की सेवा करेगी, अपनी मर्जी से नहीं चलेगी.
माओ जेदांग ने अपने अनुभवों से पाया कि चीन में पहले कई बार सेना के जनरल तानाशाह बन गए थे या गृहयुद्ध छेड़ दिए थे. माओ नहीं चाहते थे कि PLA भी वही करे. इसलिए उन्होंने साफ नियम बना दिया कि सेना पार्टी की 'टूल' है. पार्टी सेना को कमांड करेगी, सेना पार्टी को नहीं.
चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सिद्धांत को अपने शासन का आधार मानते हैं. इसके तहत उन्होंने हर एक वैसे जनरल के पर कतर दिए हैं जिनकी वफादारी पर उन्हें तनिक भी संदेह हुआ है. यही नहीं जिनपिंग ऐसे जनरलों के मातहत को भी नहीं बख्शते हैं. दरअसल चीन में सत्ता और सिस्टम बहुत बेदर्दी से काम करता है.
टॉप जनरलों-नेताओं को वहां फांसी पर चढ़ा देना आम बात है.
अब बात चीन के उस महात्वाकांक्षी जनरल की जिसने दो-दो बार भारत से टकराव लेने की कोशिश की. पहले डोकलाम (2017) बाद में गलवान (2020) के दौरान. नाम था- झाओ जोंगकी. तब ये जनरल चीन के वेस्टर्न थिएटर कमांड का चीफ थे.झाओ दिसंबर 2020 तक वेस्टर्न थिएटर के कमांडर रहे. इसलिए जब 2017 में डोकलाम में चीनी और भारतीय सैनिक आमने-सामने आए और जब जून 2020 में लद्दाख संकट गलवान झड़प में बदल गया, तब वे ही कमान संभाल रहे थे. उस समय चीनी सेना की रिपोर्टिंग में वेस्टर्न थिएटर को देश की पश्चिमी रणनीतिक दिशा के लिए ज़िम्मेदार और झाओ को उसका मुख्य कमांडर बताया गया था.
चीन में हुए एक बेहद राजनीतिक घटनाक्रम में चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस जनरल की सारी ताकतों को छीन लिया है. राजनीतिक भाषा में इसे पर्ज (Purge) करना कहते हैं.
झाओ जोंग की दिसंबर 2020 में ही वेस्टर्न थिएटर कमांड के प्रमुख पद से हट चुके थे, अब जिनपिंग ने उनके राजनीतिक अधिकारों में कटौती की है. जिनपिंग ने झाओ को चीन की शीर्ष राजनीतिक सलाहकार संस्था चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस यानी CPPCC से हटा दिया गया है. उनके दो अन्य राजनीतिक पद भी छीन लिए गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि बीजिंग ने उनकी बर्खास्तगी या पद से हटाए जाने की कोई वजह सार्वजनिक नहीं की है. अति गोपनीयता, बगैर जवाबदेही चीन की शासन प्रणाली का अंग है.
शी जिनपिंग पिछले कई वर्षों से PLA के शीर्ष नेतृत्व में बड़े पैमाने पर बदलाव कर रहे हैं. भ्रष्टाचार, सैन्य खरीद में गड़बड़ी और पार्टी के प्रति वफादारी को लेकर दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी कार्रवाई के घेरे में आ चुके हैं.
पार्टी के प्रति निष्ठा ज्यादा अहम?
अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट ने झाओ को चीन-भारत सीमा संघर्ष के दौरान चीन की सेना के शीर्ष कमांडरों में से एक और उन गिने-चुने चीनी जनरलों में बताया है जिनके पास वास्तविक युद्ध का अनुभव था. बता दें कि चीन भले ही लंबी चौड़ी सेना रखता है लेकिन लेकिन उसके जनरलों के पास जंग का प्रैक्टिकल अनुभव नहीं है.
CIA के चीन मामलों के पूर्व सीनियर एनालिस्ट डेनिस वाइल्डर के हवाले से वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा है कि शी जिनपिंग के एक्शन में वैसे नाम भी शामिल हैं जो कभी न कभी किसी बड़े जनरल से जुड़े रहे हैं. अखबार डेनिस वाइल्डर के हवाले से लिखा है, "शी न सिर्फ़ उन बड़े जनरलों को हटाते हैं जिन्हें वे वफादार नहीं मानते, बल्कि उनके मातहत काम करने वाले अधिकारियों को भी हटा देते हैं. यह सिलसिला तब तक जारी रहने की संभावना है जब तक शी को यह न लग जाए कि उन्होंने सेना के भीतर ज़ैंग यूक्सिया का असर पूरी तरह खत्म कर दिया है."
पिछले साल ऐसी अफवाहों के बीच झोंग लोगों की नज़रों से ओझल हो गए कि शी की नज़र में उनकी अहमियत कम हो गई है.
वाइल्डर ने कहा कि झोंग को हटाना "हैरान करने वाला" था. लेकिन "यह शी के उस तौर-तरीके से मेल खाता है जिसके तहत वे ऐसे मातहतों को हटा देते हैं जिनकी वफादारी कही और होती है."
झांग यूशिया और झाओ जोंग का कनेक्शन
राष्ट्रपति जिनपिंग ने चीन के प्रभावशाली एक्शन की इस कड़ी में एक और ताकतवर नेता पर एक्शन लिया है. इनका नाम है झांग यूशिया. यूशिया और झाओ जोंग का कनेक्शन मजेदार है.
झाओ जोंगकी ने अपने लंबे सैन्य करियर में झांग यूशिया के अधीन काम किया था. हाल की चीनी-भाषी रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि झाओ कभी झांग यूशिया के स्टाफ ऑफिसर रहे थे.
इससे यह जरूर पता चलता है कि दोनों का सैन्य करियर एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि झाओ किसी 'झांग गुट' के सदस्य थे. गौरतलब है कि चीन में ये सूचनाएं कभी सार्वजनिक नहीं हो पाती हैं.
झांग यूशिया चीन की सेना में बेहद प्रभावशाली व्यक्ति थे. वे शी जिनपिंग के शुरुआती दौर में उनके करीबी सैन्य सहयोगियों में गिने जाते थे और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के वाइस चेयरमैन तक पहुंचे. लेकिन 2026 में खुद झांग पर गंभीर अनुशासनात्मक और कानूनी उल्लंघनों की जांच हुई और 28 अगस्त को उन्हें CMC से हटा दिया गया.
इसके दो दिन पहले 26 अगस्त को झाओ जोंगकी को CPPCC से हटा दिया गया. इन घटना की टाइमिंग ने अटकलों को जन्म दिया कि कहीं झाओ पर कार्रवाई झांग से जुड़े पुराने सैन्य नेटवर्क तक पहुंचने का हिस्सा तो नहीं है. लेकिन बीजिंग ने झाओ को हटाने का कारण सार्वजनिक नहीं किया है.
डेनिस वाइल्डर ने इसी ओर इशारा किया है कि शी न सिर्फ़ उन बड़े जनरलों को हटाते हैं जिन्हें वे वफादार नहीं मानते, बल्कि उनके मातहत काम करने वाले अधिकारियों को भी हटा देते हैं.
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों जैसे काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस और स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट्स के अनुसार सीमा पर आक्रामक कार्रवाइयों के बाद भी अगर जनरलों को स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दी जाए तो यह शी की सत्ता को चुनौती दे सकता है. इसलिए गलवान और डोकलाम में लीड रोल में रहने वाले जनरल को किनारे लगाकर शी ने संदेश दिया कि सैन्य सफलता या विफलता से अधिक महत्वपूर्ण पार्टी के प्रति निष्ठा है.
जिनपिंग के एक्शन की अहम वजहों में चीनी सेना में भ्रष्टाचार भी है.
सैन डिएगो में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में चीनी राजनीति के प्रोफ़ेसर विक्टर शिह का कहना है कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई से हाल ही में हुई कुछ बर्खास्तगियों की वजह समझी जा सकती है. उन्होंने बताया कि हर साल CMC के ज़रिए "अरबों डॉलर" की खरीद-फ़रोख्त होती है जिससे भ्रष्टाचार के काफ़ी मौके बनते हैं. हालांकि जिनपिंग ने झोंग को हटाने की वजह नहीं बताई है.
दरअसल गलवान वाले जनरल को किनारे लगाना केवल एक सैन्य घटना का परिणाम नहीं था. यह शी जिनपिंग की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सेना को पूरी तरह पार्टी के अधीन रखना, भ्रष्टाचार के नाम पर विरोधियों को हटाना और सीमा विवादों में नियंत्रण बनाए रखना शामिल है.
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