राम मनोहर लोहिया की ‘जिंदा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं’ और जय प्रकाश नारायण की ‘सिंहासन खाली करो, जनता आती है’ जैसी नारे भारतीय लोकतंत्र में जनआक्रोश और बदलाव की पुकार रहे हैं। इन नारों की स्वीकृति है, पर अंग्रेज़ी शब्द ‘Regime Change’ सुनते ही कई लोगों के कान खड़े हो जाते हैं।
‘Regime Change’ का शाब्दिक अनुवाद ‘सत्ता परिवर्तन’ है, पर Cambridge Dictionary के अनुसार इसका अर्थ ‘एक पूरी सरकार का परिवर्तन, विशेषकर जब वह किसी अन्य शक्ति द्वारा बलपूर्वक लाया जाए’ है। यानी यह केवल चुनाव‑आधारित सत्ता बदलने से अलग, एक बलपूर्वक बदलाव है।
इसलिए जब भारत में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ‘हमें रिजीम चेंज चाहिए’ कहा, AISA की नेहा बोरा ने बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही, और कांग्रेस के पवन खेड़ा ने ‘चुनाव के जरिए रिजीम चेंज चाहते हैं’ कहा, तो यह बयान पूरे राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा गया। विपक्ष ने चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आंदोलन किया, जबकि भाजपा ने इसे नरेंद्र मोदी सरकार को हटाने की साजिश के रूप में पेश किया।
‘Regime Change’ का अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग अक्सर तब होता है, जब किसी देश की सरकार को हटाने या उसकी राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए बाहरी ताकतें दबाव, हस्तक्षेप या सैन्य कार्रवाई करती हैं। चुनाव के बाद यदि सत्ता परिवर्तन संविधान, संसद और न्यायिक प्रक्रिया के तहत होता है, तो वह ‘रिजीम चेंज’ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन है।
दूसरी ओर, सैन्य तख्तापलट, संविधान को निलंबित करना या मौजूदा शासन प्रणाली को पूरी तरह बदलना ‘रिजीम चेंज’ माना जाता है। ऐसे बदलाव में अक्सर आंदोलन, हिंसा और कभी‑कभी विदेशी फंडिंग शामिल रहती है।
भूतकाल के कुछ उदाहरण इस बात को स्पष्ट करते हैं:
श्रीलंका (2022): आर्थिक संकट के कारण ‘अराजलया’ आंदोलन उभरा, राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे इस्तीफा देकर देश छोड़ गए।
बांग्लादेश (जुलाई‑अगस्त 2024): सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विरोध में छात्र आंदोलन शुरू हुआ, जो भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन में बदल गया और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया।
नेपाल (सितंबर 2025): सोशल‑मीडिया प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ Gen‑Z आंदोलन में पुलिस ने गोलीबारी की, 20 से अधिक मौतें हुईं और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पदत्याग किया।
इन तीन मामलों में सत्ता का बदलाव लोकतांत्रिक चुनाव से नहीं, बल्कि जनआक्रोश के कारण हुआ, इसलिए इन्हें ‘रिजीम चेंज’ कहा जा सकता है।
वेनेजुएला (जनवरी 2026): अमेरिकी सेना ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ कर अमेरिका ले गई, और उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने अंतरिम राष्ट्रपति पद संभाला। यहाँ विदेशी शक्ति ने सीधे हस्तक्षेप किया।
ईरान (2025‑2026): अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान में ‘रिजीम चेंज’ की पैरवी की, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन अंततः सरकार नहीं गिरी। बाद में अमेरिकी‑इज़रायली सैन्य हमले हुए, पर ईरान की शासन व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
भारत में इस शब्द पर विवाद का मुख्य कारण हालिया SIR और CEC के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन है। कांग्रेस के साथ कई संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की, और राहुल गांधी ने ‘इस सरकार को जाना होगा’ कहा। इस बीच, भाजपा के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘रिजीम चेंज’ जैसे नारे लोकतंत्र को कमजोर करते हैं, ऐसा कहा।
क़ानूनी दृष्टिकोण से देखे तो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, उसकी नीतियों की आलोचना और चुनाव में उसे हराने की अपील संविधान द्वारा संरक्षित है। अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता का अधिकार है, जबकि हिंसा, आपराधिक साजिश या गैर‑क़ानूनी सत्ता हथियाने की कोशिश अलग कानूनी सवाल बनते हैं। इसलिए केवल ‘रिजीम चेंज’ शब्द कहने से यह नहीं सिद्ध होता कि कोई असंवैधानिक कार्रवाई करेगा।
लोकतंत्र में सत्ता बदलने का संवैधानिक तरीका चुनाव ही है। जनआंदोलनों की आवाज़ें चुनावी बदलाव को प्रेरित कर सकती हैं, पर किसी भी तरह की बलपूर्वक या अराजक कार्रवाई को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नहीं माना जाएगा।
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