BRICS का दायरा लगातार विस्तृत हो रहा है और भारत इसे वैश्विक व्यापार व आर्थिक सहयोग का प्रमुख मंच मानता है। लेकिन नवीनतम आंकड़े दोहरी तस्वीर पेश करते हैं: आयात में रिकॉर्ड वृद्धि के साथ-साथ व्यापार घाटा भी तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण चीन से बढ़ता आयात है।
2025‑26 में भारत ने BRICS के 10 साझेदार देशों से लगभग 321.8 बिलियन डॉलर का सामान आयात किया, जबकि निर्यात मात्र 95.7 बिलियन डॉलर रहा। इससे कुल व्यापार घाटा 226.1 बिलियन डॉलर (लगभग 19 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया। इस घाटे में सबसे बड़ा योगदान चीन का रहा – भारत‑चीन व्यापार घाटा 112.2 बिलियन डॉलर, जबकि दोनों देशों के बीच कुल कारोबार 155 बिलियन डॉलर तक पहुंचा। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर इक्विपमेंट और बैटरी जैसे प्रमुख सेक्टरों में भारत अभी भी चीन पर काफी हद तक निर्भर है।
बढ़ते घाटे के बीच BRICS देशों ने अपनी‑अपनी स्थानीय मुद्राओं में ट्रेड बढ़ाने की पहल तेज़ कर दी है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय लेन‑देनों में डॉलर पर निर्भरता घटाना और भुगतान व्यवस्था को अधिक लचीला बनाना है। अभी तक कोई नई साझा मुद्रा या सिस्टम लागू नहीं हुआ है, पर सदस्य देशों के बीच लोकल करेंसी में ट्रेड और क्रॉस‑बॉर्डर पेमेंट को आसान बनाने पर चर्चा जारी है।
डिजिटल पेमेंट को सहज बनाने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। भारत के UPI और ब्राज़ील के Pix जैसे प्लेटफ़ॉर्म के बीच इंटर‑ऑपरेबिलिटी की संभावना पर विचार किया जा रहा है। साथ ही सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) के माध्यम से सीमा‑पार भुगतान को तेज़ और कम लागत वाला बनाने के विकल्पों की भी तलाश चल रही है। हालांकि अभी तक कोई साझा "BRICS Pay" सिस्टम लागू नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा प्रयासों का फोकस विभिन्न देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच तालमेल बनाना है।
BRICS ने MSME सेक्टर के लिए ट्रेड फाइनेंस को आसान बनाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। सदस्य देशों ने एक्सपोर्ट‑ओरिएंटेड MSME के लिए नए क्रेडिट असेसमेंट फ्रेमवर्क और इनवॉइस डिस्काउंटिंग जैसे विकल्पों पर काम शुरू किया है, ताकि छोटे व्यापारियों को भारी कोलैटरल के बजाय उनके कैश फ्लो और व्यापार के आधार पर फाइनेंस मिल सके। यह पहल अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है।
सप्लाई‑चेन सहयोग को मजबूत करने के लिए भारत BRICS के भीतर फार्मा, कृषि और फूड सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ा रहा है, जिससे किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता का जोखिम कम हो सके। साथ ही सीमा‑पार डिजिटल सर्विसेज को आसान बनाने की दिशा में भी काम चल रहा है, जिससे भारतीय IT और डिजिटल सर्विस कंपनियों के लिए अन्य BRICS देशों में नए व्यापारिक अवसर उत्पन्न हो सकते हैं।
संक्षेप में, BRICS अब सिर्फ वस्तु‑व्यापार का मंच नहीं रहा; ट्रेड, पेमेंट, सप्लाई‑चेन और डिजिटल सर्विसेज जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर सदस्य देशों के आर्थिक रिश्तों को नई दिशा दी जा रही है। भारत के लिए अब चुनौती यह है कि बढ़ते व्यापार के साथ साथ बढ़ते घाटे को कैसे संतुलित किया जाए।
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