क्रिकेट में कुछ मुकाबले स्कोरबोर्ड से याद नहीं रहते. उन्हें याद रखा जाता है उन पलों के लिए, जब खेल की गर्मी अचानक मैदान के बीच उतर आती है. दलीप ट्रॉफी ने ऐसा मंजर 35 साल पहले जमशेदपुर में देखा था. 1991 के फाइनल में गुस्सा इतना बढ़ा कि स्टंप हथियार बन गया था. और अब 2026 में चेन्नई के फाइनल में फिर एक ऐसा पल आया, जब 15 साल के वैभव सूर्यवंशी और साउथ जोन के कप्तान तिलक वर्मा के बीच मैदान पर तनातनी जैसी तस्वीर ने सबका ध्यान खींच लिया.
दोनों घटनाओं के बीच 35 साल का फासला है. एक तरफ भारतीय क्रिकेट के इतिहास का सबसे बदनाम घरेलू क्रिकेट विवाद, दूसरी तरफ नई पीढ़ी के दो चर्चित खिलाड़ियों के बीच कुछ पल की गरमागरमी. फर्क बहुत बड़ा है, लेकिन एक सवाल दोनों घटनाओं को जोड़ देता है- जब दलीप ट्रॉफी के फाइनल में मुकाबला सिर्फ बल्ले और गेंद का नहीं रह जाता, तब मैदान का तापमान कितना ऊपर जा सकता है?
चेन्नई में पहले बल्ला बोला, फिर तेवर
चेन्नई के चेपॉक में ईस्ट जोन की पारी शुरू हुई तो सबसे ज्यादा निगाहें वैभव सूर्यवंशी पर थीं. उम्र सिर्फ 15 साल, लेकिन अंदाज ऐसा जैसे सालों से बड़े मंच पर खेल रहे हों.
सामने थे मोहम्मद सिराज. भारतीय क्रिकेट के स्थापित तेज गेंदबाज.लेकिन वैभव ने उम्र नहीं देखी, गेंद देखी. उन्होंने सिराज के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाजी की और एक ही ओवर में चौका-छक्का-चौका जड़कर फाइनल की शुरुआत में ही बता दिया कि वह यहां सिर्फ अनुभव लेने नहीं आए हैं.
इसके बाद मैदान पर एक और दिलचस्प तस्वीर बनी. साउथ जोन के कप्तान तिलक वर्मा वैभव के करीब पहुंचे. दोनों के बीच कुछ बातचीत हुई. कैमरों ने उस पल को पकड़ लिया और देखते ही देखते यह फाइनल के सबसे चर्चित दृश्यों में शामिल हो गया. कुछ रिपोर्टों ने इसे गरमागरम एक्सचेंज बताया, जबकि दूसरी व्याख्या में इसे हल्की-फुल्की स्लेजिंग या मजाकिया बातचीत भी माना गया.
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लेकिन इस पूरे दृश्य की असली दिलचस्पी शब्दों में नहीं, पात्रों की उम्र और कद के अंतर में थी. एक तरफ 15 साल का वैभव. दूसरी तरफ भारतीय क्रिकेट में अपनी पहचान बना चुका तिलक वर्मा. और यही वह तस्वीर है, जिसने 35 साल पुरानी दलीप ट्रॉफी की एक दूसरी कहानी याद दिला दी.
दिलीप ट्रॉफी फाइनल: 25-29 जनवरी 1991
वेन्यू - कीनन स्टेडियम, जमशेदपुर
नॉर्थ जोन और वेस्ट जोन के बीच जमशेदपुर के कीनन स्टेडियम में खेला गया पांच दिवसीय फाइनल का आखिरी दिन भारतीय घरेलू क्रिकेट के इतिहास के लिए काला दिन साबित हुआ. दरअसल, वेस्ट जोन से खेल रहे राशिद पटेल नॉर्थ जोन के सलामी बल्लेबाज रमण लांबा पर स्टंप्स से हमला करने के लिए आगे बढ़े. लांबा खुद को बचाते रहे. स्टेडियम में बैठा हर कोई हैरान था कि आखिर ये क्या हो गया...?
मैच के आखिरी दिन राशिद पटेल ने आपा खोया
मैच का पांचवां और आखिरी दिन था. पहली पारी के आधार पर नॉर्थ जोन का विजेता होना तय था. कपिल देव की कप्तानी वाली नॉर्थ जोन की टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 729/9 रनों का पहाड़ खड़ा कर अपनी पारी घोषित की थी. जवाब में रवि शास्त्री की कप्तानी वाली वेस्ट जोन की टीम 561 रनों पर ऑल आउट हो गई थी. यानी बड़े स्कोर वाले इस मैच में चार दिन बीत गए. आखिरी दिन नॉर्थ जोन ने बचे हुए समय में अपनी दूसरी पारी शुरू की. लेकिन 10वें ओवर में जो हुआ, वो अच्छा नहीं हुआ.
बीमर फेंकी... लांबा का सिर बाल-बाल बचा
नॉर्थ जोन की दूसरी पारी की शुरुआत एक बार फिर अजय जडेजा और पहली पारी में 180 रन बनाने वाले रमण लांबा ने की. दोनों जोरदार बल्लेबाजी कर रहे थे. स्कोर 59/0 (9.5 ओवर) तक पहुंच गया था. राशिद पटेल गुस्से में राउंड द विकेट गेंदें डाल रहे थे. वह लांबा को डेंजर एरिया के पास गेंद फेंक रहे थे. लांबा ने इस बीच बैट का हैंडल दिखा अपनी नाराजगी जताई.
फिर क्या था, राशिद ने अपना आपा खो दिया और लगभग आधी पिच पर आकर लांबा पर बीमर फेंकी. लांबा का सिर बाल-बाल बचा.
स्टंप उखाड़ा और लांबा को दौड़ाया...
राशिद यहीं नहीं रुके. वह घूमकर आए, स्टंप उखाड़ा और लांबा पर वार करने की कोशिश में उन्हें बाउंड्री लाइन तक दौड़ाया. इस बीच लांबा खुद को बचाते रहे. आखिरकार किसी तरह यह लड़ाई रुकी.
मैदान पर यह वाकया देख दर्शक भी उत्तेजित हो गए और पत्थर फेंकने शुरू कर दिए. विनोद कांबली बाउंड्री के पास फील्डिंग कर रहे थे. उन्हें चोट लगी. इसके बाद सारे खिलाड़ी पवेलियन में कैद हो गए. अंदर ही विजेता कप्तान को ट्रॉफी दे दी गई.
आखिरकार राशिद पटेल पर 13 महीने का प्रतिबंध लगाया गया. लांबा भी इस लपेटे में आए, उन्हें भी 10 महीने के लिए बैन कर दिया गया.
रमण लांबा के दौर में क्रिकेट का मैदान कई बार खिलाड़ियों के गुस्से का गवाह बना. आज क्रिकेट कहीं ज्यादा पेशेवर है, लेकिन प्रतिस्पर्धा की गर्मी अब भी वही है. फर्क सिर्फ इतना है कि वैभव के सामने अभी पूरा करियर पड़ा है.
लांबा की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि क्रिकेट में हुनर और आक्रामकता के साथ संयम की अहमियत भी कम नहीं होती. वैभव जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, उनके लिए चुनौती सिर्फ गेंदबाजों को छक्के लगाना या सीनियर्स के सामने टिकना नहीं है. असली चुनौती है- इस बढ़ते कद, बढ़ती चर्चा और मैदान के बढ़ते दबाव को संभालना.
दुर्भाग्य से रमण लांबा की कहानी का अंत बेहद दर्दनाक रहा. 1998 में बांग्लादेश में क्लब क्रिकेट खेलते हुए शॉर्ट लेग पर फील्डिंग के दौरान उनके सिर पर गेंद लगी. लांबा उस वक्त बिना हेलमेट के फील्डिंग कर रहे थे. बल्लेबाज मेहराब हुसैन के जोरदार शॉट से निकली गेंद सीधे उनके सिर पर जा लगी. हालत गंभीर होने पर दिल्ली से न्यूरोसर्जन को बुलाया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. महज 38 साल की उम्र में लांबा का निधन हो गया.
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