कानपुर में स्वास्थ्य विभाग की टीम हाथ में आयुष्मान की लिस्ट लेकर घर-घर पहुंची। दरवाजा खुला तो सामने परिवार खड़ा था। टीम ने लाभार्थी का नाम पूछा तो जवाब मिला। इन्हें तो गुजरे कई साल हो गए। दूसरी जगह टीम पहुंची तो पता चला कि जिसे कार्ड देने आए हैं, वह घर ही नहीं, मोहल्ला तक छोड़ चुका है। किसी ने पांच साल पहले ठिकाना बदला, तो किसी ने दस साल पहले। कुछ नाम ऐसे भी निकले, जिनके बारे में मोहल्ले वालों ने साफ कह दिया कि इस नाम का आदमी यहां कभी रहा ही नहीं। आयुष्मान योजना की पात्र सूची का जमीनी सत्यापन शुरू हुआ तो स्वास्थ्य विभाग के सामने ऐसा ही अजब-गजब सच सामने आया है। सूची में करीब 50 हजार मृतकों के नाम अब भी दर्ज हैं। वहीं लगभग एक लाख लोग ऐसे हैं, जो दर्ज पते पर रहते ही नहीं। यानी कार्ड बनाने निकली टीम की कई जगह लाभार्थी की जगह उसकी यादें, बंद दरवाजा या किसी दूसरे परिवार से मुलाकात हो रही है।
कानपुर जिले में करीब 13 लाख तीन हजार 237 लोगों के आयुष्मान कार्ड बनाए जाने हैं। अब तक करीब 9 लाख 50 हजार 211 लोगों को योजना का लाभ मिल चुका है। लक्ष्य पूरा करने को कोशिश हो रही है, लेकिन सूची में दर्ज मृतक और ठिकाना बदल चुके लोगों ने विभाग की राह मुश्किल कर दी है। इस वजह से शत प्रतिशत लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जा रहा है।
आयुष्मान योजना की सूची को साफ-सुथरा करने के लिए शासन ने पहली बार नाम काटने की व्यवस्था की है। योजना के नोडल अधिकारी को सत्यापन के बाद मृतक, अपात्र और गलत पते पर दर्ज लोगों के नाम सूची से हटाने का अधिकार दिया गया है। सीएचसी और अर्बन स्वास्थ्य केंद्र ऐसे नामों की सूची तैयार कर सीएमओ कार्यालय भेजेंगे, जहां जांच के बाद नाम हटाने की कार्रवाई होगी। बताया कि सीएचसी और अर्बन स्वास्थ्य केंद्र एल वन आईडी के माध्यम से मृतकों और पते पर नहीं मिलने वालों के नाम नोडल अफसर को भेजेंगे। नोडल अफसर एल टू आईडी से ये नाम सांची कार्यालय लखनऊ को भेज देंगे।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जो पात्र होने के बावजूद अपना पुराना पता छोड़ चुके हैं। यदि सत्यापन में उनका नाम सूची से काट दिया गया तो भविष्य में वे दोबारा उसी सूची के आधार पर आयुष्मान योजना का लाभ नहीं ले सकेंगे। यानी घर बदलना उनके लिए सिर्फ पता बदलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि योजना के लाभ से भी बाहर कर सकता है।
मछरिया में टीम सूची में दर्ज पते पर आयुष्मान कार्ड बनाने पहुंची। नाम पुकारा गया तो सामने परिवार के दूसरे सदस्य आए। पूछताछ में पता चला कि संबंधित व्यक्ति की कई साल पहले मौत हो चुकी है। परिवार को भी हैरानी थी कि उसका नाम अब तक पात्रों की सूची में कैसे बना हुआ है। वहीं ग्वालटोली में टीम एक लाभार्थी के पते पर पहुंची तो वहां दूसरा परिवार मिला। पड़ोसियों से पता चला कि संबंधित व्यक्ति करीब 10 साल पहले ही मकान छोड़ चुका है। वर्तमान पता किसी को मालूम नहीं था। टीम को बिना कार्ड बनाए लौटना पड़ा।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!