नए नियमों के तहत सभी ड्रोन पर एक जैसा शुल्क नहीं लगाया गया है। 25 किलोग्राम से ज्यादा वजन वाले ड्रोन, थर्मल इमेजिंग क्षमता वाले ड्रोन और ड्रोन के लिए इस्तेमाल होने वाले डॉकिंग स्टेशन पर सबसे ज्यादा 100 फीसदी टैरिफ लगाया गया है। वहीं, छोटे ड्रोन पर 25 फीसदी शुल्क लागू होगा। इसके अलावा कुछ ऐसे ड्रोन कंपोनेंट्स, जिन्हें सरकार ने फिलहाल ज्यादा संवेदनशील नहीं माना है, उन पर भी शुल्क लगाया जाएगा। हालांकि, इन कंपोनेंट्स पर नया टैरिफ तुरंत लागू नहीं हुआ है और इन पर शुल्क अगले साल 9 फरवरी से प्रभावी होगा। इस तरह अमेरिका ने ड्रोन बाजार के अलग-अलग हिस्सों पर उनकी क्षमता और संवेदनशीलता के आधार पर अलग-अलग शुल्क तय किए हैं।
अमेरिका के इस फैसले का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, क्योंकि ड्रोन निर्माण और सप्लाई के मामले में चीन दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है। खासतौर पर चीनी कंपनी DJI ने वैश्विक ड्रोन बाजार में बेहद मजबूत स्थिति बनाई हुई है। कई अध्ययनों के मुताबिक, हाल के सालों में DJI की वैश्विक ड्रोन मार्केट में हिस्सेदारी दो-तिहाई से ज्यादा रही है।
कंपनी की स्थापना 2006 में हुई थी और इसने कैमरा ड्रोन से लेकर प्रोफेशनल और इंडस्ट्रियल ड्रोन तक के बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। ऐसे में अमेरिकी टैरिफ से चीन से आने वाले ड्रोन महंगे हो सकते हैं और अमेरिकी ग्राहकों तथा कंपनियों के लिए घरेलू या दूसरे देशों के विकल्प अधिक आकर्षक हो सकते हैं।
चीन ने अमेरिका के इस कदम का कड़ा विरोध किया है। बीजिंग ने वॉशिंगटन से नए शुल्क वापस लेने की मांग करते हुए कहा है कि इस तरह के टैरिफ वैश्विक ड्रोन सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकते हैं और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा वाले बाजार को नुकसान पहुंचा सकते हैं। चीन का कहना है कि वह अमेरिकी फैसले का मजबूती से विरोध करता है। यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है, जब अमेरिका और चीन के बीच तकनीक, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पहले से तनाव बना हुआ है।
DJI को लेकर अमेरिका की चिंताएं भी नई नहीं हैं। 2022 से DJI अमेरिकी प्रतिबंधों और निगरानी के दायरे में है, क्योंकि अमेरिकी अधिकारियों ने कंपनी को चीन की सेना से जुड़े होने के आरोपों वाले संगठनों की सूची में शामिल किया था। DJI ने इस सूची में शामिल किए जाने का विरोध किया है। अब ड्रोन पर भारी टैरिफ लगाए जाने से अमेरिका में ड्रोन कारोबार का भविष्य और अधिक बदल सकता है।
अगर घरेलू कंपनियां तेजी से उत्पादन बढ़ाती हैं, तो इससे अमेरिकी ड्रोन इंडस्ट्री को फायदा हो सकता है, लेकिन दूसरी तरफ आयातित ड्रोन और कुछ उपकरण महंगे होने से ग्राहकों की लागत बढ़ने की संभावना भी है। ऐसे में अमेरिका का यह कदम सिर्फ व्यापार नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता और चीन पर निर्भरता कम करने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
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